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Showing posts from 2019

रिश्ते:

कहते हैं के रिश्ते रेशम की डोर की मानिन्द होते हैं जिनको बड़ी संभाल कर रखना पड़ता है के ज़रा सा झटका लगा और टूट गए। रेशम की डोर और रिश्तों में एक फर्क है-रिश्तो की डोर के सिरे दो अलग अलग लोगो के हाथ में होते हैं अगर एक से भी भूल हुई तो डोरी टूट जाती है और वो फिर कभी नहीं जुड़ती और जुड़ भी जाये तो उसमें गांठ पड़ जाती है। मैं अक्सर ये सोचता हूँ के पता नहीं कैसे लोग रिश्ते टूटने के बाद उनको जोड़ लेटे हैं और एक हम हैं के खींचा तानी में कोई रिश्ता कमज़ोर भी हो गया तो उसको निभाना मुश्किल हो जाता है। ज़िन्दगी में कभी कभी कोई मोड़ ऐसा आता है के कोई कहता है के क्यों ना फिर से वही टूटा हुआ रिश्ता जोड़ लिया जाए, भले से ही मैं कह ना पाऊँ लेकिन सोचता यही हूँ के मैं टूटे हुए रिश्ते जोड़ता नहीं हाँ कोई नया रिश्ता ज़रूर बनाया जा सकता है, उस रिश्ते के किरदार ज़रूर वही होंगे लेकिन नाम अलग होगा, अगर नाम वही होगा तो फिर किरदार अलग होंगे। कभी कभी दो दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और कभी दो दोस्त दुश्मन, यहाँ किरदार तो वही रहते हैं लेकिन रिश्ता बदल जाता है। वैसे तो हर रिश्ते का कोई नाम होता है लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे भी होते...

डर:

गर्मिओं की दोपहर थी, निशा घर के आंगन में लेटी हुई किसी सोच में गुम थी। यह उस दौर की बात है जब एक आम से घर का आंगन भी आजकल के मकान के बराबर होता था, घरो में भी खूब जगह होती थी और दिलो में भी। घर के सभी लोग कहीं गए हुए थे और निशा चारपाई पे लेटे हुए अमरुद के पेड़ को इतने गौर से देख रही थी मनो इसके पत्ते गिन रही हो। घर के आंगन में अमरुद,अनार के पेड़ों साथ-साथ फूलों के भी कई पौधे थे। हरा-भरा आंगन गरम हवा की शिद्दत को कुछ कम कर देता था। आंगन ख़त्म होते ही एक बरामदा था और बरामदे के अंदर एक कमरा और उस कमरे के अंदर एक और कमरा था जिसे घर के सब लोग कोठरी कहते थे और उसमें दिन के वक़्त भी अँधेरा रहता था। उस कोठरी में सिर्फ घर का सामान ही रखा जाता था और सामान भी ऐसा जिसकी शायद ही कभी किसी को ज़रुरत पड़ती थी। उस कोठरी में जाने से घर के बच्चे तो बच्चे बड़े भी डरते थे। बस घर में एक ही शख्स था जिसे उस कोठरी से रगवत थी,सभी उसे चाचा कहते थे ,चाचा का उस कमरे में आना-जाना मामूल की बात थी। उस दौर में घरो में लाइट तो क्या चराग भी मुश्किल से जले हुए मिलते थेऔर ऐसे में चाचा का उस अँधेरे कमरे में बेबात पे ही दिन भर मे...

दर्द:

किसी ने कहा था के मर्द को दर्द नहीं होता, मर्द को दर्द तो होता है लेकिन वो उसको बर्दाश्त कर लेता है, दर्द बर्दाश्त तो औरत को भी करना पड़ता है चाहें रो-कर करे या ख़ामोशी से। दर्द जब हद से गुज़र-जाता है तो उसका एहसास ही ख़त्म हो जाता है और दर्द जब बहुत पुराना हो जाता है तो फिर वो दर्द दर्द-नहीं रहता वो ज़िन्दगी का साथी बन जाता है और वो दर्द जीने की एक वजह बन जाता है, फिर ऐसे दर्द की कोई क्यों दवा करे जो जीने की एक वजह बन चूका हो। मैं नहीं जनता के दर्द को नापने का कोई पैमाना है  या नहीं लेकिन किसी के दर्द की शिद्दत का एहसास उसकी आवाज़ से हो ही जाता है, दर्द को कभी बातें बयान कर देतीं हैं तो कभी ख़ामोशी बयान कर देती है, कभी ऑंखें बयान कर देतीं हैं तो कभी लरज़ते हुए क़दम बता देते हैं के कोई किसी उलझन मैं है। किसी दर्दमंद इंसान की आवाज़ सुनकर लगता है के अगर ज़िन्दगी में दर्द का एहसास ना हो तो ना-जाने कितने गीत संगीत जो किसी के दर्द की पहचान बन चुके हैं, कहीं खो कर रह जाते। वही अलफ़ाज़ होते हैं लेकिन बस किसी का दर्द है जो इनमें जान डाल देता है, गीत वही होता है बस किसी की दर्द भरी आवाज़ इसमें कशि...

इत्तेफ़ाक़:

लोग अक्सर कहते हैं के इत्तेफ़ाक़ से ऐसा हो गया लेकिन क्या हमने कभी सोचा है के इत्तेफ़ाक़ से होने वाला कुछ भी महज़ एक इत्तेफ़ाक़ ही होता है या किसी कहानी का एक सिलसिलेवार पहलू। कोई कहानी ही इत्तेफ़ाक़ से होने वाली चीज़ों को अपने अंदर समां लेती है या ये इत्तेफ़ाक़ किसी कहानी की एहम कड़ियाँ होती हैं जो कहानी के साथ ऐसी जुड़ जाती हैं मानो इस कहानी को लिखने वाले ने इनको ख़ास तरीक़े से लिखा हो। कभी इत्तेफ़ाक़ से कोई अजनबी मिल-जाता है तो कभी इत्तेफ़ाक़ कोई अपना बिछड़ भी जाता है, कभी इत्तेफ़ाक़ स े कोई कहानी बन जाती है तो कभी कोई बिगड़ जाती है, कभी कोई इत्तेफ़ाक़ किसी की जान बचा लेता है तो कभी किसी की जान ले-लेता है। किसी से मिलना इत्तेफ़ाक़न हो सकता है लेकिन किसी से बिछड़ना तो मजबूरन या इरादातन ही होता है, तो क्या ये मुमकिन है के हमारा मिलना भी इरादातन ही हुआ हो और हमे इसका इल्म ही न हो, ऐसा भी तो हो सकता है के जिसे हम इत्तेफ़ाक़ समझ रहे हैं वो दूसरे का इरादा रहा हो या फिर दोनों के लिए होने वाला कोई इत्तेफ़ाक़ किसी तीसरे की कोई साज़िश हो। कभी-कभी किसी अजनबी जगह या अजनबी इंसान से मिलकर ऐसा लगता है जैसे ये अजनबी न हो, जै...

ख़ुशी और ग़म:

ख़ुशी और ग़म दो ऐसे लफ्ज़ हैं जो हर एक की ज़िन्दगी से जुड़े हैं-चाहें कोई कितना भी दौलतमंद हो कोई ना कोई  ग़म उसकी ज़िन्दगी में मिल ही जाएगा और गरीबो के पास भी कोई ना कोई ख़ुशी मिल जाती है। खुशियाँ किसी दूकान पर नहीं मिलतीं और ना इनको तोलने का कोई पैमाना होता है, अगर खुशियाँ बिकतीं तो महंगाई के इस दौर में इनकी क़ीमत भी खूब होती -इनके भी अपने अलग तराज़ू होते, रईसों के घर खुशियों से भरे होते और गरीबी शायद इससे महरूम ही रहती। किसी का हंसना या मुस्कुराना  ख़ुशी की दलील नहीं और ऑंख के आंसू ग़म की पहचान नहीं तो फिर ये ख़ुशी और ग़म क्या हैं। क्या ख़ुशी और ग़म महज़ एक एहसास हैं जो मिलने को किसी की एक बात से ही मिल जाते  हैं और ना मिलने को कोई दुनिया की दौलत भी क़दमों में डाल दे तो नहीं मिलते। यक़ीनन इनकी कोई तराज़ू नहीं लेकिन फिर भी किसी का चेहरा किसी की ऑंखें इनको बयान कर ही देतीं हैं। वैसे तो ऑंख के आंसू अक्सर ग़म की पहचान होते हैं लेकिन कहते हैं ऑंख में ख़ुशी के आंसू भी होते हैं। जब कोई किसी से मिलकर खुश होता है तो हंसता है-मुस्कुराता है लेकिन जब कोई किसी से मिलकर रो देता है तो समझो के उसे सच्ची...

गुस्सा:

जो बात-बात पे गुस्सा करता है बीमार सा लगता है और जो गलत बात पे भी गुस्सा नहीं करता बुज़दिल सा लगता है और जो अपने गुस्से पे काबू ही नहीं कर पाता वो कमज़ोर सा लगता है। किसी पे गुस्सा होना और किसी से गुस्सा होने में कितना फर्क होता है, जब कोई किसी पे गुस्सा करता है तो बहुत शोर होता लेकिन जब कोई किसी से गुस्सा हो जाता है तो कितनी ख़ामोशी होती है। किसी पे गुस्सा होने के बाद इंसान बोलता ही जाता है और किसी से गुस्सा होने के बाद कुछ बोलना ही नहीं चाहता। वैसे तो ख़ामशी अक्सर अच्छी  लगती है लेकिन जब ख़ामोशी किसी से गुस्सा हो जाने की वजह से हो तो वो ख़ामोशी भी बहुत शोर करती है। कहते हैं के गुस्से में अक्ल काम नहीं करती और जो हर वक़्त गुस्से में रहता है वो तो अक्ल से काम ही नहीं करता होगा। गुस्से में कुछ बोलने से बेहतर है के खामोश रहा जाए क्यों के मुंह से निकली हुई बात बहुत दूर चली जाती है चाहे वो गुस्से में ही क्यों न बोली गयी हो। Ishrat Alig

जुनून:

किसी से दिलचस्पी कब प्यार में बदल जाए पता ही नही चलता ओर प्यार कब मोहब्बत बन जाए कोन जाने, मोहब्बत बढ़ जाए तो दीवानगी बन जाए और दीवानगी हद से गुज़र जाए तो इश्क़ बन जाए लेकिन जब इश्क़ हद से गुजरता है तो जुनून बन जाता है। इश्क़ अपने आपमें एक बगावत है, ये रस्मों को तोड़ता है, नई कहानियां लिखता है, नए रास्ते बनाता है, नई मंज़िलें क़ायम करता है, खुद को भूल जाता है बस अपनी चाहत को याद रखता है। लोग कहते हैं जिसे इश्क़ हो जाता है वो किसी काम का नही रहता, ये तो बस कोई दीवानों से पूछे के  मोहब्बत से बड़ा काम और क्या होता है। ये कमाल तो इश्क़ का ही है वरना इतना आसान नही है किसी की चाहत में अपनी हस्ती को फना कर देना। Ishrat Alig

ज़मीन और आसमान:

~ वो दूर ज़मीन के किनारे आसमान से मिल रहे हैं जैसे इस ज़मीन को आसमान ने अपने आगोश में ले-लिया हो। कभी तो ऐसा लगता है जैसे ज़मीन और आसमान के बीच कभी न ख़त्म होने वाला एक फासला है और कभी ऐसा लगता है जैसे ये ज़मीन और आसमान एक दूसरे के लिए बनाये गए हैं, जैसे इनका जन्म-जन्म का साथ है, जैसे ये ज़मीन एक दुल्हन है और आसमान इसका हमसाया। जो भी इस मिलन को देखने के लिए आगे बढ़ता है उसकी नज़रों से यह नज़ारा दूर होता जाता है, ज़मीन करीब होती जाती है और आसमान ऊपर उठता जाता है। कभी तो ऐसा लगता है जैसे ये महज़ आँखों का एक धोका है और कभी ये लगता है के आसमान शर्मा के अलग  हो जाता है। समझ नहीं आता ये मिलन है या मिलन से पहले की जुदाई, जैसे ये मिलन शाम के ढल जाने का इंतज़ार कर रहा है, जैसे रात की तारीकी में ये फिर मिलेंगे-सबसे छुप कर बातें करेंगे। क्या इसी ख़ुशी में ये ज़मीन घूम रही है- क्या इसिलए ये आसमान झूम रहा है। आसमान अपनी दुल्हन के लिए क्या-क्या सौगात लाया है-कभी सूरज से इसको रोशन करता है तो कभी चाँद से इसका दिल बहलाता है-इसके दामन में मुस्कुराते हुए सितारे हैं-कभी इसके पास परिओ का मेला सा लगता है तो कभ...

बरसात:

बरसात का मौसम है सभी देवता सो रहे हैं, कोई पुजारी आए और किसी देवता को जगाए और पूछे ये क्या हो रहा- कहीं तो लोग प्यास से तड़प रहे हैं तो कहीं सैलाब हैं, कहीं पानी की कमी से लोग मर रहे हैं तो कहीं पानी में डूब कर मर रहे हैं। कहीं खुश्क झीलें हैं तो कहीं दरया अपने किनारों को तोड़कर आगे ही बढ़ते जा रहे हैं। एक तरफ सूखे की वजह से परिंदो ने अपना ठिकाना बदला है तो दूसरी तरफ किसी तूफ़ान ने इनको बेघर कर कर दिया है। कहीं बरसात आने से पहले ही ख़त्म हो गयी है तो कहीं ऐसी आयी है के ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही। कहीं का हर मौसम बरसात है तो कहीं बरसात का कोई मौसम ही नहीं। किसी को बरसात के थमने का इन्तेज़ार है तो कोई इसके शुरू होने की दुआ कर रहा है। कोई पहली बारिश में भीगना चाहता है तो कोई इससे बचने के लिए इंतज़ाम कर रहा है। वैसे तो बरसात खुशियां लेकर ही आती है लेकिन दुनिया के दस्तूर ने इसे भी कुछ लोगो के लिए परेशानी का सबब बना दिया है, ये किसी के लिए जीवनदान है तो किसी के लिए तबाही लेकर आती है। ये बरसात का मौसम कितनी कहानिओं की याद दिलाता है और न जाने कितनी नई कहानियां पैदा करता है। किसी लिखने वाल...

ज़िन्दगी और मौत:

~ ज़िन्दगी में अगर कभी ज़िन्दगी मिली तो ज़िन्दगी से पूछेगें.. ऐ ज़िन्दगी तूने ज़िन्दगी के साथ क्या किया? अगर ज़िन्दगी कहेगी के हर क़दम पर मौत का डर था मुझे, में क्या करती। और ऊपर से उम्र का तंग पैमाना, वैसे तो परवरदिगार ने मौत का दिन मुक़र्रर कर दिया है लेकिन ज़िन्दगी को उसका इल्म ही कहाँ। ज़िन्दगी कहती है काश वो दिन पता होता- थोड़ी तकलीफ तो होती लेकिन बहुत से गमो से बच जाती, ज़िन्दगी हर रोज़ मौत को याद करती। कभी ज़िन्दगी मौत से मिलने को बेताब रहती है तो कभी इससे दूर भागना च ाहती है और यह नहीं जानती के जितना दूर भागती है उतना ही नज़दीक होती जाती है। मौत के बादल हमेशा इसके ऊपर मंडराते रहते हैं और जब ये बादल बरसने लगते हैं तो इसे एहसास होता है के शायद वो दिन आ पहुंचा- ऐसा लगता है के बिजली कड़केगी और ये बादल फट जायेगा और ज़िन्दगी का ये खेल ख़त्म हो जाएगा। लेकिन जब बारिश रुक जाती है और ज़िन्दगी खिलती हुई धूप को देखकर उन बादलों को भूल जाती है। जब ठंडी हवा के झोके चलते हैं तो यह इतराने लगती है, इठलाती है और ज़िन्दगी ज़िन्दगी में खो जाती है, ज़मीन पर उछलने लगती है और आसमानों में उड़ने लगती है; और जब फिर उन बादल...

दिल और दिमाग़ :

~ ऐ दिल तु क्यों उदास है, किसी की याद आयी है या किसी ने याद किया है। चंद ही नाम तो हैं तेरे पास फिर क्यों इतना परेशान है, दिमाग को देख हज़ारों-लाखों नाम रखे हुए है फिर भी अराम में है, और यह एक नाम किसका है जिसे तु याद करते नहीं थकता, तुझे इतना यकीन क्यों है के कभी वह भी तुझे याद करेगा। एक ही बार तो नाम लिया है तेरा उसने और तु इसी पे फ़िदा है, हो सकता है तेरी जगह सिर्फ उसके दिमाग में ही हो, जहाँ अनगिनत नाम होंगे और कभी तेरा ज़िक्र भी ना आता होगा। यह दिल भी अजीब शय है जो दिमाग के अनगिनत नामों को देखकर भी कभी परेशान नहीं होता और एक दिमाग है जो दिल के चंद नामों से ही बेचैन रहता है, और इसके एक नाम को देखकर तो इस पर वहशत तारी हो जाती है। इस दिल की एक ही आरज़ू है और दिमाग की ख़्वाहिशें कम होने का नाम ही नहीं लेतीं। परेशान तो ये दोनों ही हो जाते हैं, जब दिमाग परेशान होता है तो यह सिर्फ जिस्म को परेशान करता है लेकिन जब दिल परेशान होता है तो रूह तक को बेचैन कर देता है, ऐसा महसूस होता है जैसे रूह का रिश्ता जिस्म से कम और दिल से ज़्यादा हो, एक परेशान हो तो दूसरे को चैन ना आए। दिल की दुनिया छोटी सी ह...

मोहल्ले के कल्वा भाई:

आज मोहल्ले के उसी रास्ते से गुज़र हुआ जहाँ ना-जाने कितने लोगों की दोपहरियाँ कटा करती थीं, बस्ती के रास्तों की तरह यह मकान भी पक्का हो गया है। जब ये मकान कच्चा था तो एक था, अब इसके आंगन में कई दीवारें खिच गयीं हैं, अब इस मकान में इंसानो के साथ परिंदो की भी आवा-जाई ख़त्म सी हो गयी है, अब इसमें ना कोई पेड़ बचा है ना कोई पौधा। मकान तो पक्के होते जा रहे हैं लेकिन रिश्ते कच्चे होते जा रहे हैं, मकानों की ऊंचाईयां बढ़ती जा रही हैं और इंसानो के क़द छोटे होते जा रहे हैं। इस मकान के शुरू में एक बैठक हुआ करती थी जिसमें कल्वा भाई का टेप और स्पीकर रहता था और कल्वा भाई अक्सर चारपाई पे लेटे हुए बड़ी खमोशी के साथ गाने सुना करते थे, कभी अकेले होते तो कभी यारों के साथ, कभी मोहल्ले का ही कोई रहता तो कभी कोई दूर से बैठने के लिए आता, कोई बजते हुओ गानों को ही सुनता तो कोई अपनी फरमाइश रखता, ना गानों को कोई कमी थी-ना सुनने वालों की और ना वक़्त की ही कोई कमी थी। इत्मीनान और फुर्सत से भरपूर कल्वा भाई अक्सर खामोश ही रहा करते थे लेकिन बजते हुए गाने यह एहसास कराते के यही कल्वा भाई की ज़बान है-यही इनकी बातें हैं। पता नहीं...

सवाल-जवाब:

 ~  मैं यह सोचता हूँ कि ये सवाल-जवाब क्या हैं? क्या हर सवाल का जवाब मिल सकता है? क्या हर सवाल का जवाब दे देना चाहिए? क्या किसी को हर सवाल पूछ लेना चाहिए? क्या किसी का सवाल दूसरे का जवाब नहीं हो सकता? क्या किसी के जवाब से सवाल पैदा नहीं होते? क्या कभी किसी सवाल का जवाब न देने में ही उसका जवाब छुपा होता है? क्या कोई जवाब सवाल से भी अच्छा हो सकता है? या ये सवाल ही है जो जवाब को अच्छा बना देता है? अगर सवाल इतना अच्छा है तो इसका जवाब ही क्यों दया जाए? क्यूँ न ऐसे सवाल को ला-जवाब रखा जाए? क्या जवाब के मिल जाने से सवाल की एहमियत कम हो जाती है? या फिर जवाब न देने पर सवाल की क़दर ख़त्म हो जाती है? क्या कोई सवाल ऐसा हो सकता है जिसका कोई जवाब ना हो? क्या कोई जवाब ऐसा दे सकता है जिसपे कोई सवाल न हो? क्या हमारी ज़िंदगी सवालों और जवाबों के सिवा कुछ भी नहीं? क्या यह ज़िंदगी खुद एक सवाल है? क्या मौत ही इस ज़िंदगी का जवाब ह? जब ये ज़िन्दगी-मौत ही सवाल-जवाब हैं तो हम इसे लेकर इतने परेशान क्यों हैं? कोई किसी जवाब की तलाश में है तो कोई किसी सवाल से दूर हो जाना चाहता है, किसी के पास सवाल करने का हुन...

क़मरे की किताब:

आज क़मरे में खिड़की से हवा का एक झोका अंदर आया और क़मरे में रखी हुई किताबों में से एक किताब के पन्नों को उड़ाने लगा। किताब के पन्ने जब पलटने लगे तो ऐसा लगा के जैसे किताब ने बोलना शुरू कर दिया हो, किताब के क़िरदार तस्वीर बनकर सामने आने लगे और अपनी-अपनी कहानी दोहराने लगे और यह खामोश किताब बात करने लगी। इस किताब का कोई क़िरदार हँसता हुआ नज़र आया तो कोई उदास, कोई मुस्कुरा रहा था तो कोई परेशान था, कोई किसी की मोहब्बत में दीवाना था तो कोई किसी की किसी की नफरत में बरहम था। वैसे तो ये किताबें हमेशा खामोश रहती हैं लेकिन कोई इनसे बात करने वाला हो तो ये बोलना भी खूब जानती हैं। ये बात करना भी सिखाती हैं और खामोश रहना भी सिखाती हैं, कभी गुज़रे हुए वक़्त के क़िस्से सुनाती हैं तो कभी किसी की दास्तान बयान करती हैं, हँसते हुओं को रुला देती हैं तो रोते हुओं को हंसा देती हैं, जब सब साथ छोड़ जाएँ तो भी साथ निभाती हैं। कभी आज की तस्वीर दिखाती हैं तो कभी आने वाले कल की और इशारा करती हैं। इन किताबों के साथ रहते-रहते ज़िन्दगी खुद एक किताब सी लगने लगी है, एक अधूरी सी किताब जिसके बहुत से पन्ने अभी लिखे आने बाकी हैं। ज़ि...

वक़्त क्या है:

~ कोई मुझसे अगर पूछे के सबसे क़ीमती चीज़ क्या है तो बेझिजक मैं कहूंगा के "वक़्त", और अगर कोई यह पूछे के वक़्त क्या है तो कहूंगा के कुछ नहीं, कुछ भी नहीं, महज़ एक धोका है। ये ज़मीन, ये आसमान, क़ायनात का हर एक ज़र्रा अपने होने की दलील पेश करता है कि उसका अपना एक वजूद है लेकिन वक़्त के होने कि क्या दलील है। ये बदलती हुई चीज़ें वक़्त के होने का एहसास तो कराती हैं पर इसको साबित नहीं करतीं। अगर वक़्त है तो कहाँ है, कैसा दीखता है, कैसे चलता है, कब गुज़रता है, कहाँ से गुज़रता है, क्या कभी किसी ने देखा है। अगर ज़मीन अपना चक्कर पूरा करने मैं ज़रा भी देरी कर दे तो वक़्त के ये पैमाने गलत साबित होंगे, अगर सूरज ही ना निकले तो ये रात-दिन कोई चीज़ ही नहीं। सूरज की रौशनी बताती है के वक़्त भी कुछ है तो कभी ज़मीन के चक्कर की देरी घड़ी को बदल देते हैं। हम वक़्त को समझ नहीं रहे बस घड़ी के इशारे पर नाच रहे हैं। कभी इंसान की रफ़्तार तय करती है के वक़्त की रफ़्तार क्या होगी तो कभी जगह बताती है के वक़्त को कैसे चलना है। कुछ जगहें ऐसी हैं जहाँ वक़्त बहुत आहिस्ता चलता है तो कुछ ऐसी हैं जहाँ यह तेज़ी से गुज़र जाता है, और कुछ जग...

मंज़िल और मुसाफिर:

कहते हैं के ज़िन्दगी एक सफर है, हर सफर की एक मंज़िल होती है, अगर ज़िन्दगी सफर है तो इसकी भी कोई मंज़िल होगी? अगर हम सब मुसाफिर हैं तो फिर हमारी मंज़िल क्या है? किसी के सामने कोई मंज़िल है तो किसी के सामने सिर्फ रस्ते ही रास्ते हैं। कोई किसी मंज़िल की तलाश में है तो कोई नया रास्ता ढूंढ़ता है l किसी रास्ते पर क़दमों के निशान मिलते हैं तो किसी रास्ते पर पहली बार चलना पड़ता है। कभी कोई पुल बनाना पड़ता है तो कभी कोई कश्ती बनानी पड़ती है। कभी रास्ते के पत्थर हटाने पड़ते हैं तो कभी कोई मकान बनाना पड़ता है तो कभी कोई दीवार गिरनी पड़ती है। कभी लहरों से झूझना तो कभी किनारों की तलाश करना। कभी किसी तूफान का सामना तो कभी रास्तों की भूलभुलैया में खो-जाना। कभी किसी काफले के साथ तो कभी अकेले ही चलना। कभी किसी रहबर की तलाश तो कभी किसी रेहज़न का डर। कभी सख्त धूप तो कभी अँधेरी रातों के सन्नाटे, कभी प्यास की शिद्दत तो कभी खाने की तलब, कभी पैरों की थकन तो कभी किसी की याद में उदासी। यहाँ कोई रास्तों से अंजान है तो कोई मंज़िल से बेख़बर। कोई रास्ते बदलता है तो कोई मंज़िल ही बदल लेता है। किसी को ठहरना अच्छा नहीं लगता तो किस...

ख़्वाब और हक़ीक़त:

यूँ तो ख़्वाब अक्सर सोने के बाद आते हैं लेकिन कुछ ख़्वाब हैं जो सोने ही नहीं देते। ख़्वाब वो भी हैं जो खुली आँखों से देखे जाते हैं और ख्वाबों वो भी हैं जो आँख लगने के बाद आते हैं। कुछ ख़्वाब याद ही नहीं रहते तो कुछ ख़्वाब हैं जो भुलाये ही नहीं जाते। कुछ ख़्वाब हक़ीक़त बन जाते हैं तो कुछ ख़्वाब ख़्वाब ही रह जाते हैं। कुछ ख़्वाब साथ चलते रहते हैं तो कुछ ख़्वाब साथ छोड़ जाते हैं। कभी ख़्वाब में कोई ख़्वाब नज़र आता है तो कभी हक़ीक़त ही ख़्वाब बन जाती है। कभी कोई हक़ीक़त ख्वाबों को ख़त्म कर देना चाहती है तो कभी कोई ख़्वाब हक़ीक़त को बदल देना चाहता है। कोई हर रोज़ नए ख़्वाब देखता है तो कोई अपने एक ही ख़्वाब के साथ ज़िन्दगी गुज़ार देना चाहता है। कभी कोई हक़ीक़त किसी से रुठ जाती है तो कभी किसी के ख्वाबों को नज़र लग जाती है। कोई आने वाले कल के ख्वाब देख रहा है तो कोई गुज़रे वक़्त के ख्वाबों में डूबा हुआ है। कोई किसी ख़्वाब से परेशान है तो कोई किसी हक़ीक़त से बेदार हो चूका है। किसी के पास कोई ख़्वाब ही नहीं हैं तो किसी से कोई हक़ीक़त बहुत दूर है। कभी कोई ख़्वाब आने वाले कल की पेशगोई करता है तो कभी कोई हक़ीक़त किसी ख़्वाब की याद दिलाती ह...

रौशनी और अंधेरा:

कहते हैं के रौशनी रंगों का नाम है, रंगों में एक रंग तो काला भी है, तो फिर ये अंधेरा क्या है। कोई कहता है अंधेरा हर जगह है, रौशनी आती है और अंधेरा ख़त्म कर देती है। ये रौशनी आती हुई तो दिखाई देती है लेकिन ये चली कहाँ जाती है, अगर ये अँधेरा ख़त्म हो गया था तो फिर कैसे आ गया है, अगर ये कहीं चला गया था तो गया कहाँ था। आँखों में रौशनी है फिर भी आँखें बंद करो तो अँधेरा हो जाता है, आँखों की रौशनी को भी देखने के लिए रौशनी की ज़रुरत है। कभी ये रौशनी अंधेरे के ऊपर पड़ती है तो कभी ये अंधेरा साया बनके रौशनी के ऊपर चलता है। किसी को रौशनी अच्छी लगती है तो किसी को अंधेरों से आशनाई है। कोई रौशनी में चमकना चाहता है तो कोई अंधेरों में भटकता है और इनमें खो जाना चाहता है। किसी को रौशनी में नींद नहीं आती तो किसी को अँधेरा परेशान करता है। कोई रात के अंधेरों में भी चमकता है तो कोई दिन की रौशनी में भी नज़र नहीं आता। कुछ अंधेरों में रहते हैं फिर उनकी ज़िन्दगी रोशन है और कुछ रौशनी के होते हुए भी अंधेरे में हैं। ये रौशनी अनगिनत कहानियाँ कहती है लेकिन अंधेरे के पास भी कहानिओं की कमी तो नहीं। रात की शबनम का अंधेरे क...

एक ख्याल:

इस ज़मीन से आसमान नज़र आता है मुझे। इसमें चाँद, सितारे, जुगनू सब थे, कहाँ गए। सूरज की इस रौशनी ने इनको ख़त्म कर दिया है या ये खुद ही इससे शरमा के कहीं छुप गए हैं। क्या इसी बात पे ये सूरज इतना इतरा रहा है। क्या इसको नहीं मालूम के शाम होते ही इसकी रौशनी ख़त्म हो जायेगी और लोग चाँद की तरफ मोहब्बत भरी नज़रों से देखेंगे। चाँद की रौशनी सूरज की तरह दुनिया की हर शय को तो रोशन नहीं करती लेकिन ये क्या कम है लोग चाँद का पीछा करते हैं, इसको टकटकी बांधकर देखते हैं। सितारों भरी रात भी चाँद के बिना सूनी नज़र आती है। एक सितारा जो चाँद के आस पास रहता है ये सोच कर कितना खुश होता है के लोग सब सितारों को छोड़कर इसी की तरफ देख रहे हैं और खुश भी क्यों ना हो इसको चाँद के साथ रहने का शरफ जो हासिल हुआ है। ये कितना उदास था जब चाँद नहीं निकला था और चाँद की तलाश में लोग दूसरे सितारों की तरफ देख रहे थे। ये अनोखा सितारा अनगिनत सितारों में कहीं खो-कर रह गया था और जब चाँद निकला तो ये उन लोगों से भी ज़्यादा खुश था जो चाँद को देख कर ईद मना रहे थे। सितारों भरी इस रात में दिन की कोई कमी तो महसूस नहीं होती लेकिन दिन का उजाला भी ...

तस्वीर और अल्फ़ाज़:

जब भी किसी तस्वीर को देखता हूँ तो ज़ेहन में कुछ अल्फ़ाज़ आ जाते हैं, ऐसा महसूस होता है जैसे तस्वीर ने ही कुछ कहा हो, जैसे तस्वीर बात कर रही हो। फिर ये ख्याल आता है कोई और इसको देखेगा तो कुछ और ही सोचेगा। अगर ये तस्वीर बोलती है तो कुछ और ही सुनेगा। कुछ लोग ये दावा करते हैं के वो तस्वीर को पढ़ना जानते हैं, तो हर पड़ने वाला कुछ अलग ही पड़ेगा। कहते हैं के लिखे हुए अल्फ़ाज़ को तो सब पड़ लेते हैं लेकिन तस्वीर पे तो कुछ भी नहीं लिखा फिर लोग इसे कैसे पड़ते हैं। फिर इस बात का ख्याल आता है के लिखे हुए को पड़ तो सब लेते हैं पर ज़रूरी नहीं सब समझ भी लेते हों। तस्वीर को देखते तो सभी हैं पर ज़रूरी नहीं सब इसे पड़ भी लेते हों। हर तस्वीर बनाने वाला यही सोचता होगा के उसकी तस्वीर यादगार बन जाए और इससे भी ज़्यादा ये सोचता होगा के कोई इसको समझे और बताये यह तस्वीर क्या कहती है, क्या दास्तान बयां करती है। तस्वीर पे ना कुछ लिखा होता है न इसकी कोई ज़ुबाँ होती है फिर भी हर पड़ने वाला इसको पड़ लेता है। यहाँ कोई चेहरे को तस्वीर की शक्ल देना चाहता है तो कोई तस्वीर को लफ़्ज़ों में उतारना चाहता है, कोई नयी तस्वीर बनाना चाहता है त...

तिशना लब:

खुश्की के इस मौसम में इन आँखों में ये नमी कैसी है। ये पानी बेवजह क्यों निकल रहा है। कहने को तो ये पानी है लेकिन किसी की प्यास भी नहीं बुझा सकता, शायद किसी की तलब को कुछ कम ही कर दे। खुश्क लब हैं, ज़बान प्यासी है फिर भी आँखों से बरसात हो रही है। समंदरों की कोई कमी नहीं इस जहाँ में फिर भी पानी के लिए जंगे जारी हैं। ये दरया भी प्यासों को छोड़ कर सागर की गोद में गिर जाते हैं। ये क्या माजरा है ये सागर सारे दरियाओं को अपने ही रंग में रंग लेता है और हर एक दरया अपना वजूद खो देता है। ये दरया इस बात को भूल चुका है के अब इसके पानी की मिठास ख़त्म हो चुकी, अब इसका पानी किसी की प्यास नहीं बुझा पायेगा। लेकिन दरया को अब इस बात पर नाज़ है के अब ये दरया नहीं रहा सागर बन चूका है। इसको सागर बनने के लिए अपना वजूद तो खोना ही था। भले से ही अब इसका पानी खारा हो चूका है लेकिन अब इसके पास गहराई है, अब इसके किनारे किसी के काबू में नहीं, इसके पास ख़ामोशी है, इसके पास तूफान भी हैं, इसकी लहरें ज़िन्दगी को नयी उमंगें देती हैं। ऐसा कोन है यहाँ जिसे प्यास नहीं लगती और ये कोन हैं जिनकी प्यास बुझती ही नहीं। सूरज की तपिश ...

अमीरी-गरीबी:

आजकल अमीर और गरीब की पहचान बहुत आसान हो गयी है, और दोनों की एक दूसरे से दूरियाँ भी काफी बढ़ गयीं हैं। नहीं तो एक ज़माना ऐसा भी था जब अमीरी और गरीब ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा एक साथ गुज़ारा करते थे, उनके बीच फासले इतने ज़्यादा नहीं थे या ये कहा जाये के फासले थे ही नहीं। आज तो अमीरी, गरीबी के के बीच में दीवारें नज़र आती हैं और ना तो कोई इन दीवारों को गिराने की कोशिश ही करता है और ना ही कोई पुल बना रहा है। और तो और ये दीवारें दिन बा दिन ऊँची ही होती जा रही हैं। इन दीवारों को कोई लाँघ न सके इनके ऊपर कांटे भी बिछा दिए गए हैं। इंसानी जिंदगी ने वो दौर भी देखा है जब शाही घरानों के राजकुमार एक ही आश्रम में गरीबों के बीच रहकर ही परवरिश पाया करते थे, तालीम हासिल किया करते थे, गरीबी को समझा करते थे, उनके साथ सुख दुखः में शामिल हुआ करते थे। आने वाले कल में जो उनकी अवाम होगी उसके बारे में दूसरों से पूछने की ज़रुरत पेश नहीं आती थी। उनके दोस्त गरीब भी होते थे,उनकी महफिलों में गरीब बे-झिझक जाया करते थे। आज न कोई अमीर किसी गरीब से दोस्ती करता है और न किसी अमीर की महफ़िल में कोई गरीब नज़र ही आता है, अगर कोई सदा दिल ...