कहते हैं के रिश्ते रेशम की डोर की मानिन्द होते हैं जिनको बड़ी संभाल कर रखना पड़ता है के ज़रा सा झटका लगा और टूट गए। रेशम की डोर और रिश्तों में एक फर्क है-रिश्तो की डोर के सिरे दो अलग अलग लोगो के हाथ में होते हैं अगर एक से भी भूल हुई तो डोरी टूट जाती है और वो फिर कभी नहीं जुड़ती और जुड़ भी जाये तो उसमें गांठ पड़ जाती है।
मैं अक्सर ये सोचता हूँ के पता नहीं कैसे लोग रिश्ते टूटने के बाद उनको जोड़ लेटे हैं और एक हम हैं के खींचा तानी में कोई रिश्ता कमज़ोर भी हो गया तो उसको निभाना मुश्किल हो जाता है। ज़िन्दगी में कभी कभी कोई मोड़ ऐसा आता है के कोई कहता है के क्यों ना फिर से वही टूटा हुआ रिश्ता जोड़ लिया जाए, भले से ही मैं कह ना पाऊँ लेकिन सोचता यही हूँ के मैं टूटे हुए रिश्ते जोड़ता नहीं हाँ कोई नया रिश्ता ज़रूर बनाया जा सकता है, उस रिश्ते के किरदार ज़रूर वही होंगे लेकिन नाम अलग होगा, अगर नाम वही होगा तो फिर किरदार अलग होंगे।
कभी कभी दो दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और कभी दो दोस्त दुश्मन, यहाँ किरदार तो वही रहते हैं लेकिन रिश्ता बदल जाता है।
वैसे तो हर रिश्ते का कोई नाम होता है लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जहाँ एक ताल्लुक तो होता है लेकिन उनका कोई नाम नहीं होता, उन्हें एक नाम की तलाश होती है, शायद ताल्लुक निभाने के लिए नहीं बल्के दुनिया को दिखाने के लिए।
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें इंसान जब चाहे खत्म कर सकता है लेकिन खून के रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें चाह कर भी कोई ख़त्म नहीं कर सकता। कोई निभाए या ना निभाए खून के रिश्ते ख़त्म नहीं होते भले से कमज़ोर कितने ही क्यों ना हो जाएं। वैसे तो दोस्ती एक पाक रिश्ता है लेकिन दोस्ती टूट जाए तो कोई रिश्ता ही नहीं रहता लेकिन अगर दो भाई दुश्मन भी बन जाएँ तो वो रहते भाई ही हैं।
कभी किसी के साथ ज़िन्दगी गुज़र जाती है और कोई रिश्ता क़ायम नहीं हो पाता और कभी किसी अजनबी से एक पल में ऐसा रिश्ता बन जाता है जो हमेशा क़ायम रहता है।
यहाँ हर एक का दूसरे से एक रिश्ता है, उसका कोई नाम ना भी हो लेकिन इन्सानियत का रिश्ता तो होता ही है लेकिन जब इंसान के अंदर से इंसानियत ही ख़त्म हो जाये तो फिर कोई दूसरा रिश्ता भी क्या करे।
किसी के रिश्ते की क्या कसम खाएं हमने तो जनम-जनम के रिश्ते इसी जनम में टूटते देखे हैं।
रिश्ता आज़माने से मज़बूत नहीं होता, रिश्ता निभाने से मज़बूत होता है, जो रिश्तों को आज़माते हैं उन्हें अपने रिश्ते पे भरोसा ही नहीं होता। कोई रिश्ता कितना भी मज़बूत क्यों ना हो जाए एक छोटी सी बात पे टूट जाता है, हो सकता वो छोटी सी बात किसी दूसरे के लिए बहुत बड़ी हो।
रिश्ते जो कभी बोझ हल्का किया करते थे अब खुद एक बोझ बनते जा रहे हैं इसिलए आजकल रिश्ते इतने कमज़ोर हो गए हैं।
मैं अक्सर ये सोचता हूँ के पता नहीं कैसे लोग रिश्ते टूटने के बाद उनको जोड़ लेटे हैं और एक हम हैं के खींचा तानी में कोई रिश्ता कमज़ोर भी हो गया तो उसको निभाना मुश्किल हो जाता है। ज़िन्दगी में कभी कभी कोई मोड़ ऐसा आता है के कोई कहता है के क्यों ना फिर से वही टूटा हुआ रिश्ता जोड़ लिया जाए, भले से ही मैं कह ना पाऊँ लेकिन सोचता यही हूँ के मैं टूटे हुए रिश्ते जोड़ता नहीं हाँ कोई नया रिश्ता ज़रूर बनाया जा सकता है, उस रिश्ते के किरदार ज़रूर वही होंगे लेकिन नाम अलग होगा, अगर नाम वही होगा तो फिर किरदार अलग होंगे।
कभी कभी दो दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और कभी दो दोस्त दुश्मन, यहाँ किरदार तो वही रहते हैं लेकिन रिश्ता बदल जाता है।
वैसे तो हर रिश्ते का कोई नाम होता है लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जहाँ एक ताल्लुक तो होता है लेकिन उनका कोई नाम नहीं होता, उन्हें एक नाम की तलाश होती है, शायद ताल्लुक निभाने के लिए नहीं बल्के दुनिया को दिखाने के लिए।
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें इंसान जब चाहे खत्म कर सकता है लेकिन खून के रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें चाह कर भी कोई ख़त्म नहीं कर सकता। कोई निभाए या ना निभाए खून के रिश्ते ख़त्म नहीं होते भले से कमज़ोर कितने ही क्यों ना हो जाएं। वैसे तो दोस्ती एक पाक रिश्ता है लेकिन दोस्ती टूट जाए तो कोई रिश्ता ही नहीं रहता लेकिन अगर दो भाई दुश्मन भी बन जाएँ तो वो रहते भाई ही हैं।
कभी किसी के साथ ज़िन्दगी गुज़र जाती है और कोई रिश्ता क़ायम नहीं हो पाता और कभी किसी अजनबी से एक पल में ऐसा रिश्ता बन जाता है जो हमेशा क़ायम रहता है।
यहाँ हर एक का दूसरे से एक रिश्ता है, उसका कोई नाम ना भी हो लेकिन इन्सानियत का रिश्ता तो होता ही है लेकिन जब इंसान के अंदर से इंसानियत ही ख़त्म हो जाये तो फिर कोई दूसरा रिश्ता भी क्या करे।
किसी के रिश्ते की क्या कसम खाएं हमने तो जनम-जनम के रिश्ते इसी जनम में टूटते देखे हैं।
रिश्ता आज़माने से मज़बूत नहीं होता, रिश्ता निभाने से मज़बूत होता है, जो रिश्तों को आज़माते हैं उन्हें अपने रिश्ते पे भरोसा ही नहीं होता। कोई रिश्ता कितना भी मज़बूत क्यों ना हो जाए एक छोटी सी बात पे टूट जाता है, हो सकता वो छोटी सी बात किसी दूसरे के लिए बहुत बड़ी हो।
रिश्ते जो कभी बोझ हल्का किया करते थे अब खुद एक बोझ बनते जा रहे हैं इसिलए आजकल रिश्ते इतने कमज़ोर हो गए हैं।
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