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Showing posts from December, 2019

रिश्ते:

कहते हैं के रिश्ते रेशम की डोर की मानिन्द होते हैं जिनको बड़ी संभाल कर रखना पड़ता है के ज़रा सा झटका लगा और टूट गए। रेशम की डोर और रिश्तों में एक फर्क है-रिश्तो की डोर के सिरे दो अलग अलग लोगो के हाथ में होते हैं अगर एक से भी भूल हुई तो डोरी टूट जाती है और वो फिर कभी नहीं जुड़ती और जुड़ भी जाये तो उसमें गांठ पड़ जाती है। मैं अक्सर ये सोचता हूँ के पता नहीं कैसे लोग रिश्ते टूटने के बाद उनको जोड़ लेटे हैं और एक हम हैं के खींचा तानी में कोई रिश्ता कमज़ोर भी हो गया तो उसको निभाना मुश्किल हो जाता है। ज़िन्दगी में कभी कभी कोई मोड़ ऐसा आता है के कोई कहता है के क्यों ना फिर से वही टूटा हुआ रिश्ता जोड़ लिया जाए, भले से ही मैं कह ना पाऊँ लेकिन सोचता यही हूँ के मैं टूटे हुए रिश्ते जोड़ता नहीं हाँ कोई नया रिश्ता ज़रूर बनाया जा सकता है, उस रिश्ते के किरदार ज़रूर वही होंगे लेकिन नाम अलग होगा, अगर नाम वही होगा तो फिर किरदार अलग होंगे। कभी कभी दो दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और कभी दो दोस्त दुश्मन, यहाँ किरदार तो वही रहते हैं लेकिन रिश्ता बदल जाता है। वैसे तो हर रिश्ते का कोई नाम होता है लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे भी होते...

डर:

गर्मिओं की दोपहर थी, निशा घर के आंगन में लेटी हुई किसी सोच में गुम थी। यह उस दौर की बात है जब एक आम से घर का आंगन भी आजकल के मकान के बराबर होता था, घरो में भी खूब जगह होती थी और दिलो में भी। घर के सभी लोग कहीं गए हुए थे और निशा चारपाई पे लेटे हुए अमरुद के पेड़ को इतने गौर से देख रही थी मनो इसके पत्ते गिन रही हो। घर के आंगन में अमरुद,अनार के पेड़ों साथ-साथ फूलों के भी कई पौधे थे। हरा-भरा आंगन गरम हवा की शिद्दत को कुछ कम कर देता था। आंगन ख़त्म होते ही एक बरामदा था और बरामदे के अंदर एक कमरा और उस कमरे के अंदर एक और कमरा था जिसे घर के सब लोग कोठरी कहते थे और उसमें दिन के वक़्त भी अँधेरा रहता था। उस कोठरी में सिर्फ घर का सामान ही रखा जाता था और सामान भी ऐसा जिसकी शायद ही कभी किसी को ज़रुरत पड़ती थी। उस कोठरी में जाने से घर के बच्चे तो बच्चे बड़े भी डरते थे। बस घर में एक ही शख्स था जिसे उस कोठरी से रगवत थी,सभी उसे चाचा कहते थे ,चाचा का उस कमरे में आना-जाना मामूल की बात थी। उस दौर में घरो में लाइट तो क्या चराग भी मुश्किल से जले हुए मिलते थेऔर ऐसे में चाचा का उस अँधेरे कमरे में बेबात पे ही दिन भर मे...

दर्द:

किसी ने कहा था के मर्द को दर्द नहीं होता, मर्द को दर्द तो होता है लेकिन वो उसको बर्दाश्त कर लेता है, दर्द बर्दाश्त तो औरत को भी करना पड़ता है चाहें रो-कर करे या ख़ामोशी से। दर्द जब हद से गुज़र-जाता है तो उसका एहसास ही ख़त्म हो जाता है और दर्द जब बहुत पुराना हो जाता है तो फिर वो दर्द दर्द-नहीं रहता वो ज़िन्दगी का साथी बन जाता है और वो दर्द जीने की एक वजह बन जाता है, फिर ऐसे दर्द की कोई क्यों दवा करे जो जीने की एक वजह बन चूका हो। मैं नहीं जनता के दर्द को नापने का कोई पैमाना है  या नहीं लेकिन किसी के दर्द की शिद्दत का एहसास उसकी आवाज़ से हो ही जाता है, दर्द को कभी बातें बयान कर देतीं हैं तो कभी ख़ामोशी बयान कर देती है, कभी ऑंखें बयान कर देतीं हैं तो कभी लरज़ते हुए क़दम बता देते हैं के कोई किसी उलझन मैं है। किसी दर्दमंद इंसान की आवाज़ सुनकर लगता है के अगर ज़िन्दगी में दर्द का एहसास ना हो तो ना-जाने कितने गीत संगीत जो किसी के दर्द की पहचान बन चुके हैं, कहीं खो कर रह जाते। वही अलफ़ाज़ होते हैं लेकिन बस किसी का दर्द है जो इनमें जान डाल देता है, गीत वही होता है बस किसी की दर्द भरी आवाज़ इसमें कशि...

इत्तेफ़ाक़:

लोग अक्सर कहते हैं के इत्तेफ़ाक़ से ऐसा हो गया लेकिन क्या हमने कभी सोचा है के इत्तेफ़ाक़ से होने वाला कुछ भी महज़ एक इत्तेफ़ाक़ ही होता है या किसी कहानी का एक सिलसिलेवार पहलू। कोई कहानी ही इत्तेफ़ाक़ से होने वाली चीज़ों को अपने अंदर समां लेती है या ये इत्तेफ़ाक़ किसी कहानी की एहम कड़ियाँ होती हैं जो कहानी के साथ ऐसी जुड़ जाती हैं मानो इस कहानी को लिखने वाले ने इनको ख़ास तरीक़े से लिखा हो। कभी इत्तेफ़ाक़ से कोई अजनबी मिल-जाता है तो कभी इत्तेफ़ाक़ कोई अपना बिछड़ भी जाता है, कभी इत्तेफ़ाक़ स े कोई कहानी बन जाती है तो कभी कोई बिगड़ जाती है, कभी कोई इत्तेफ़ाक़ किसी की जान बचा लेता है तो कभी किसी की जान ले-लेता है। किसी से मिलना इत्तेफ़ाक़न हो सकता है लेकिन किसी से बिछड़ना तो मजबूरन या इरादातन ही होता है, तो क्या ये मुमकिन है के हमारा मिलना भी इरादातन ही हुआ हो और हमे इसका इल्म ही न हो, ऐसा भी तो हो सकता है के जिसे हम इत्तेफ़ाक़ समझ रहे हैं वो दूसरे का इरादा रहा हो या फिर दोनों के लिए होने वाला कोई इत्तेफ़ाक़ किसी तीसरे की कोई साज़िश हो। कभी-कभी किसी अजनबी जगह या अजनबी इंसान से मिलकर ऐसा लगता है जैसे ये अजनबी न हो, जै...