लोग अक्सर कहते हैं के इत्तेफ़ाक़ से ऐसा हो गया लेकिन क्या हमने कभी सोचा है के इत्तेफ़ाक़ से होने वाला कुछ भी महज़ एक इत्तेफ़ाक़ ही होता है या किसी कहानी का एक सिलसिलेवार पहलू। कोई कहानी ही इत्तेफ़ाक़ से होने वाली चीज़ों को अपने अंदर समां लेती है या ये इत्तेफ़ाक़ किसी कहानी की एहम कड़ियाँ होती हैं जो कहानी के साथ ऐसी जुड़ जाती हैं मानो इस कहानी को लिखने वाले ने इनको ख़ास तरीक़े से लिखा हो। कभी इत्तेफ़ाक़ से कोई अजनबी मिल-जाता है तो कभी इत्तेफ़ाक़ कोई अपना बिछड़ भी जाता है, कभी इत्तेफ़ाक़ से कोई कहानी बन जाती है तो कभी कोई बिगड़ जाती है, कभी कोई इत्तेफ़ाक़ किसी की जान बचा लेता है तो कभी किसी की जान ले-लेता है।
किसी से मिलना इत्तेफ़ाक़न हो सकता है लेकिन किसी से बिछड़ना तो मजबूरन या इरादातन ही होता है, तो क्या ये मुमकिन है के हमारा मिलना भी इरादातन ही हुआ हो और हमे इसका इल्म ही न हो, ऐसा भी तो हो सकता है के जिसे हम इत्तेफ़ाक़ समझ रहे हैं वो दूसरे का इरादा रहा हो या फिर दोनों के लिए होने वाला कोई इत्तेफ़ाक़ किसी तीसरे की कोई साज़िश हो।
किसी से मिलना इत्तेफ़ाक़न हो सकता है लेकिन किसी से बिछड़ना तो मजबूरन या इरादातन ही होता है, तो क्या ये मुमकिन है के हमारा मिलना भी इरादातन ही हुआ हो और हमे इसका इल्म ही न हो, ऐसा भी तो हो सकता है के जिसे हम इत्तेफ़ाक़ समझ रहे हैं वो दूसरे का इरादा रहा हो या फिर दोनों के लिए होने वाला कोई इत्तेफ़ाक़ किसी तीसरे की कोई साज़िश हो।
कभी-कभी किसी अजनबी जगह या अजनबी इंसान से मिलकर ऐसा लगता है जैसे ये अजनबी न हो, जैसे इनसे हमारा कोई पुराना रिश्ता हो, जैसे ज़िन्दगी इन रास्तों से पहले गुज़र चुकी हो, जैसे ये अजनबी लोग हमेशा से हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा थे।
न-जाने कितने काम हमारी हज़ारों कोशिशों के बाद भी नहीं हो पाते और कुछ इत्तेफ़ाक़ से ही हो जाते हैं, जब उनको होना ही नहीं था तो हमने कोशिशें क्यों कीं, कहीं ऐसा तो नहीं हमारी वो नाकाम कोशिशें हमें किसी हसीं इत्तेफ़ाक़ की तरफ ले गयीं हों और हम ये समझ ही न सके हों के जिन कोशिशों को हम नाकाम समझ रहे थे उनसे कुछ दिलचस्प इत्तेफ़ाक़ जुड़े थे।
तो क्या कोशिशों की नाकामी के डर से हमें कोशिशें छोड़ देनी चाहियें या फिर नाकाम कोशिश करते हुए किसी खूबसूरत इत्तेफ़ाक़ का इंतज़ार करना चाहिए। कोशिशें हम छोड़ नहीं सकते और इत्तेफ़ाक़ से हम बच नहीं सकते तो क्यों ना नाकाम कोशिश को एक इत्तेफ़ाक़ और किसी हंसी इत्तेफ़ाक़ को एक कामयाब कोशिश समझ कर क़ुबूल कर लिया जाए।
न-जाने कितने काम हमारी हज़ारों कोशिशों के बाद भी नहीं हो पाते और कुछ इत्तेफ़ाक़ से ही हो जाते हैं, जब उनको होना ही नहीं था तो हमने कोशिशें क्यों कीं, कहीं ऐसा तो नहीं हमारी वो नाकाम कोशिशें हमें किसी हसीं इत्तेफ़ाक़ की तरफ ले गयीं हों और हम ये समझ ही न सके हों के जिन कोशिशों को हम नाकाम समझ रहे थे उनसे कुछ दिलचस्प इत्तेफ़ाक़ जुड़े थे।
तो क्या कोशिशों की नाकामी के डर से हमें कोशिशें छोड़ देनी चाहियें या फिर नाकाम कोशिश करते हुए किसी खूबसूरत इत्तेफ़ाक़ का इंतज़ार करना चाहिए। कोशिशें हम छोड़ नहीं सकते और इत्तेफ़ाक़ से हम बच नहीं सकते तो क्यों ना नाकाम कोशिश को एक इत्तेफ़ाक़ और किसी हंसी इत्तेफ़ाक़ को एक कामयाब कोशिश समझ कर क़ुबूल कर लिया जाए।
क्या ये ज़िन्दगी एक इत्तेफ़ाक़ थी, क्या मौत इत्तेफ़ाक़ हो सकती है। जब ये ज़िन्दगी और मौत इत्तेफ़ाक़ नहीं तो फिर इनके दरमियान होने वाली चीज़ें इत्तेफ़ाक़ कैसे हो सकती हैं, कहीं ऐसा तो नहीं के हमारी ज़िन्दगी के ये इत्तेफ़ाक़ दुनिया के इस कारवां का हिस्सा हों और जिनको हम महज़ एक ख्वाब या हादसा समझ लेते हैं वो इस कारवां की ही कोई मंज़िल हो।
Ishrat Alig
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