~ मैं यह सोचता हूँ कि ये सवाल-जवाब क्या हैं? क्या हर सवाल का जवाब मिल सकता है? क्या हर सवाल का जवाब दे देना चाहिए? क्या किसी को हर सवाल पूछ लेना चाहिए? क्या किसी का सवाल दूसरे का जवाब नहीं हो सकता? क्या किसी के जवाब से सवाल पैदा नहीं होते? क्या कभी किसी सवाल का जवाब न देने में ही उसका जवाब छुपा होता है? क्या कोई जवाब सवाल से भी अच्छा हो सकता है? या ये सवाल ही है जो जवाब को अच्छा बना देता है? अगर सवाल इतना अच्छा है तो इसका जवाब ही क्यों दया जाए? क्यूँ न ऐसे सवाल को ला-जवाब रखा जाए? क्या जवाब के मिल जाने से सवाल की एहमियत कम हो जाती है? या फिर जवाब न देने पर सवाल की क़दर ख़त्म हो जाती है? क्या कोई सवाल ऐसा हो सकता है जिसका कोई जवाब ना हो? क्या कोई जवाब ऐसा दे सकता है जिसपे कोई सवाल न हो? क्या हमारी ज़िंदगी सवालों और जवाबों के सिवा कुछ भी नहीं?
क्या यह ज़िंदगी खुद एक सवाल है? क्या मौत ही इस ज़िंदगी का जवाब ह? जब ये ज़िन्दगी-मौत ही सवाल-जवाब हैं तो हम इसे लेकर इतने परेशान क्यों हैं?
कोई किसी जवाब की तलाश में है तो कोई किसी सवाल से दूर हो जाना चाहता है, किसी के पास सवाल करने का हुनर है तो कोई जवाब देने में माहिर है, कोई सवाल पूछता तो खूब है लेकिन जवाब देना नहीं चाहता, किसी के पास हर सवाल का जवाब है तो किसी के पास किसी का कोई जवाब ही नहीं, किसी के सवाल बी बहुत मीठे हैं तो किसी के जवाब भी कड़वे हैं, किसी को यह पता ही नहीं के वो सवाल कर रहा है या जवाब दे रहा है तो कोई अनकहे सवालों को भी समझ लेता है, किसी को किसी सवाल से शिकवा है तो किसी को किसी जवाब से शिकायत, किसी को जवाब मिल तो गया है पर उसको समझा नहीं तो कोई सवाल ही नहीं समझा।
इन सवालों जवाबों में ही ज़िन्दगी उलझी हुई है, चल ऐसी जगह चलते हैं जहाँ ना कोई सवाल हो और ना किसी जवाब की दरकार। हर सवाल खामोश हो, हर जवाब मौजूद हो। ज़िन्दगी ज़िन्दगी हो- ना सवाल हो-ना जवाब हो। ना वक़्त को नापने का कोई पैमाना हो, ना इंसान को तोलने की कोई तराज़ू। ना खुवाहिशों के ढेर हों, ना तमन्नाओं के आंचल, ना कोई शोर, ना कोई हंगामा, बस खामोश फ़ज़ायें हों और क़ुदरत के नज़ारे हों।
ज़िन्दगी को ऐसी जगह ले तो आए लेकिन सब कुछ ठहरा-ठहरा सा नज़र आता है, जैसे ना वक़्त चलता हो और ना ज़िन्दगी, हर रोज़ दिन निकलता है हर रोज़ रात आती है लेकिन कुछ भी नहीं बदलता। वही मंज़र वही नज़ारे मौसम बदलते हैं लेकिन चीज़ें वैसी ही रहती हैं जैसे किसी चीज़ के पास कोई रफ़्तार ही नहीं सब कुछ रुक सा गया है।
ये माजरा क्या है ये ज़िन्दगी भी तो ज़िन्दगी नहीं जो चल ही नहीं रही, चलो फिर उसी दुनिया में चलते हैं लेकिन ऐसे सवाल पूछते हैं जो किसी को परेशान ना करें, किसी के सवाल का जवाब तलाश करते हैं, अगर किसी का कोई जवाब खो गया है तो उसको ढूंडते हैं, कोई अगर किसी सवाल से नाराज़ है तो उसको बदल देते हैं, अगर किसी के पास कोई सवाल नहीं तो उसका सवाल बन जाते हैं, अगर कोई जवाब देने में शर्माता है तो उसके साथ शरमाते हैं, सिर्फ जवाब ही राहत ना हों बल्के सवाल भी खुश करें।
कुछ नए सवाल तलाश करते हैं कुछ नए जवाब ढूंडते हैं, ज़िन्दगी को भी आगे बढ़ाते हैं और ज़माने की रफ़्तार को भी।
वक़्त के साथ तबदीली तो आए लेकिन यह तबदीली किसी का नुक्सान ना करे, पानी को गन्दा ना, हवा को ख़राब ना करे, घरों को बसाए तो लेकिन किसी का उजाड़ ना करे, कोई आवाज़ तो दे लेकिन हंगामा ना करे।
सवाल-जवाब तो हों लेकिन कोई तमाशा ना हो।
Ishrat Alig
क्या यह ज़िंदगी खुद एक सवाल है? क्या मौत ही इस ज़िंदगी का जवाब ह? जब ये ज़िन्दगी-मौत ही सवाल-जवाब हैं तो हम इसे लेकर इतने परेशान क्यों हैं?
कोई किसी जवाब की तलाश में है तो कोई किसी सवाल से दूर हो जाना चाहता है, किसी के पास सवाल करने का हुनर है तो कोई जवाब देने में माहिर है, कोई सवाल पूछता तो खूब है लेकिन जवाब देना नहीं चाहता, किसी के पास हर सवाल का जवाब है तो किसी के पास किसी का कोई जवाब ही नहीं, किसी के सवाल बी बहुत मीठे हैं तो किसी के जवाब भी कड़वे हैं, किसी को यह पता ही नहीं के वो सवाल कर रहा है या जवाब दे रहा है तो कोई अनकहे सवालों को भी समझ लेता है, किसी को किसी सवाल से शिकवा है तो किसी को किसी जवाब से शिकायत, किसी को जवाब मिल तो गया है पर उसको समझा नहीं तो कोई सवाल ही नहीं समझा।
इन सवालों जवाबों में ही ज़िन्दगी उलझी हुई है, चल ऐसी जगह चलते हैं जहाँ ना कोई सवाल हो और ना किसी जवाब की दरकार। हर सवाल खामोश हो, हर जवाब मौजूद हो। ज़िन्दगी ज़िन्दगी हो- ना सवाल हो-ना जवाब हो। ना वक़्त को नापने का कोई पैमाना हो, ना इंसान को तोलने की कोई तराज़ू। ना खुवाहिशों के ढेर हों, ना तमन्नाओं के आंचल, ना कोई शोर, ना कोई हंगामा, बस खामोश फ़ज़ायें हों और क़ुदरत के नज़ारे हों।
ज़िन्दगी को ऐसी जगह ले तो आए लेकिन सब कुछ ठहरा-ठहरा सा नज़र आता है, जैसे ना वक़्त चलता हो और ना ज़िन्दगी, हर रोज़ दिन निकलता है हर रोज़ रात आती है लेकिन कुछ भी नहीं बदलता। वही मंज़र वही नज़ारे मौसम बदलते हैं लेकिन चीज़ें वैसी ही रहती हैं जैसे किसी चीज़ के पास कोई रफ़्तार ही नहीं सब कुछ रुक सा गया है।
ये माजरा क्या है ये ज़िन्दगी भी तो ज़िन्दगी नहीं जो चल ही नहीं रही, चलो फिर उसी दुनिया में चलते हैं लेकिन ऐसे सवाल पूछते हैं जो किसी को परेशान ना करें, किसी के सवाल का जवाब तलाश करते हैं, अगर किसी का कोई जवाब खो गया है तो उसको ढूंडते हैं, कोई अगर किसी सवाल से नाराज़ है तो उसको बदल देते हैं, अगर किसी के पास कोई सवाल नहीं तो उसका सवाल बन जाते हैं, अगर कोई जवाब देने में शर्माता है तो उसके साथ शरमाते हैं, सिर्फ जवाब ही राहत ना हों बल्के सवाल भी खुश करें।
कुछ नए सवाल तलाश करते हैं कुछ नए जवाब ढूंडते हैं, ज़िन्दगी को भी आगे बढ़ाते हैं और ज़माने की रफ़्तार को भी।
वक़्त के साथ तबदीली तो आए लेकिन यह तबदीली किसी का नुक्सान ना करे, पानी को गन्दा ना, हवा को ख़राब ना करे, घरों को बसाए तो लेकिन किसी का उजाड़ ना करे, कोई आवाज़ तो दे लेकिन हंगामा ना करे।
सवाल-जवाब तो हों लेकिन कोई तमाशा ना हो।
Ishrat Alig
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