इस दुनिया के ये कैसे क़ानून हैं, के यहाँ जब एक मर्द धोका खाता है तो वो मिलता है किसी मैख़ाने में, वीराने में, किसी मंदिर या किसी मस्जिद में, या फिर किसी आश्रम में। लेकिन जब एक औरत धोखा खाती है तो वो मिलती है किसी तवायफ के कोठे पे, ज़माने की ठोकरों में, या फिर जीतेजी एक जहन्नुम में।
कहते हैं सब कुछ बदल गया, दुनिया बदल गयी, ज़माना बदल गया, इंसान के तौर-तरीके बदल गए, इंसानी साज़-ओ-सामान बदल गया। हाँ बदला तो बहुत कुछ है लेकिन क्या इन्साफ बदल सकता है, क्या क़ातिल मज़लूम बन सकता है, क्या राक्षस को देवता कह सकते हैं, क्या जान लेने वाला जान बचाने वाले से बड़ा बन सकता है।
ये इंसान के बनाये हुए कानून हैं, जो बदलते रहते हैं। ऐसा हर कानून ख़त्म हो जायेगा जो क़ानून-ए-क़ुदरत के खिलाफ बनेगा। और ऐसे कानून को एक दिन खत्म होना ही होगा।
इंसानी तारीख ने न जाने कितने ऐसे क़ानून देखे हैं। कभी चिताओं में जलती हुई ज़िंदा औरतें, सरे-बाज़ार बिकते हुए लोग, पैदा होते ही दफ़न होती हुई मासूम बच्चियाँ,सफ़ेद कपड़ों में लिपटी हुईं ज़िंदा देवियां, इंसान की कमर से बंधी हुई झाड़ूएं, एक ख़ास तबके के लिए इबादतगाह के बंद दरवाजे। ये सब यहीं के तो कानून थे। पता नहीं कब ख़त्म हो गए, लोगों को याद भी नहीं। ये तारीख के कूड़ेदान का हिस्सा बन चके हैं। बस इतना याद है के किन महान इंसानों ने इनको ख़त्म कराया। क्यों इस एक पल की ज़िन्दगी के लिए इंसान ऐसे गलीज़ कानून बनाता है।
लेकिन क्या क़ुदरत के कानून बदले हैं। आज भी अमीर लोग मरते हैं, बीमार भी होते हैं। सूरज हमेशा की तरह पूरब से ही निकलता है और पस्चिम में छुपता है। हमेशा की तरह सुबह से शाम होती है, रात से दिन होता है। सितारे दिन में दिखाई नहीं देते, वैसे सूरज ही काफी है इंसान को रास्ता बताने के लिए।
हकूमत बदली है और क्या बदला है। ठीक उसी तरह जैसे नए साल पे तारिख बदल जाती है। ये हुक्मरां भी अवाम को उसी तरह बेच रहे हैं, कभी देशी सौदागरों के हाथ तो कभी बिदेशी। ना बदले तो खाने की शक्ल में बिकता हुआ ज़हर, दवाओं की जगह बीमारी के नए सामान। दफ्तरों में चलने वाली रिश्वतें बढ़ गईं हैं, अवाम के पासवान ही लुटेरे बन गए हैं। अदालतों में इन्साफ के लियें जाने वाले लोग आज भी मायूस लोट रहे हैं। तालीम का ऐसा व्यापार तो तारीख़ ने पहले कभी देखा ही नहीं। तोहफों के रूप में बटने वाली ये नैमत इंसान के खून की कीमत पर मिल रही है। ऐसा लगता है जैसे नाइंसाफी कम होने के वजाए बहुत बढ़ गई हो।
हकूमत ने कुछ नहीं बदला तो लोग भी कहाँ बदले हैं। आज भी इज़्ज़त के नाम पर अपने बच्चों का गला घोंटते हैं, बेज़बान बच्चों को दुनिया में आने से पहले ही ख़त्म कर देते हैं। ये नादान यह भी नहीं समझते के ये इज़्ज़त नहीं बल्कि एक बेइज़्ज़ती भरा काम है। अगर ऐसे कामों से इज़्ज़त मिलती तो इस दुनिया का हर इज़्ज़तदार आदमी के हाथ उसकी ही औलाद के खून से सने होते। क्यों लोग दूसरों के बच्चों को अपने बच्चों जैसा नहीं समझते, क्यों उनकी छोटी सी कामयाबी से हसद करते हैं, उनसे नफरत करते हैं। एक बात जान लो जब तक तुम दूसरे बच्चों को अपनों की तरह नहीं समझोगे, तुम्हारे बच्चे भी महफूज़ नहीं रहेंगे।
वो कहते हैं कुछ नहीं बदलेगा, सब ऐसे ही चलता रहेगा। मैं कहता हूँ, वक़्त बदलेगा, लोग बदलेंगे, में भी बदलूंगा, तुम भी बदलोगे, ये कानून भी बदलेंगे और इस तरह यह ज़माना बदल जायेगा।
ये इंसान के बनाये हुए कानून हैं, जो बदलते रहते हैं। ऐसा हर कानून ख़त्म हो जायेगा जो क़ानून-ए-क़ुदरत के खिलाफ बनेगा। और ऐसे कानून को एक दिन खत्म होना ही होगा।
इंसानी तारीख ने न जाने कितने ऐसे क़ानून देखे हैं। कभी चिताओं में जलती हुई ज़िंदा औरतें, सरे-बाज़ार बिकते हुए लोग, पैदा होते ही दफ़न होती हुई मासूम बच्चियाँ,सफ़ेद कपड़ों में लिपटी हुईं ज़िंदा देवियां, इंसान की कमर से बंधी हुई झाड़ूएं, एक ख़ास तबके के लिए इबादतगाह के बंद दरवाजे। ये सब यहीं के तो कानून थे। पता नहीं कब ख़त्म हो गए, लोगों को याद भी नहीं। ये तारीख के कूड़ेदान का हिस्सा बन चके हैं। बस इतना याद है के किन महान इंसानों ने इनको ख़त्म कराया। क्यों इस एक पल की ज़िन्दगी के लिए इंसान ऐसे गलीज़ कानून बनाता है।
लेकिन क्या क़ुदरत के कानून बदले हैं। आज भी अमीर लोग मरते हैं, बीमार भी होते हैं। सूरज हमेशा की तरह पूरब से ही निकलता है और पस्चिम में छुपता है। हमेशा की तरह सुबह से शाम होती है, रात से दिन होता है। सितारे दिन में दिखाई नहीं देते, वैसे सूरज ही काफी है इंसान को रास्ता बताने के लिए।
हकूमत बदली है और क्या बदला है। ठीक उसी तरह जैसे नए साल पे तारिख बदल जाती है। ये हुक्मरां भी अवाम को उसी तरह बेच रहे हैं, कभी देशी सौदागरों के हाथ तो कभी बिदेशी। ना बदले तो खाने की शक्ल में बिकता हुआ ज़हर, दवाओं की जगह बीमारी के नए सामान। दफ्तरों में चलने वाली रिश्वतें बढ़ गईं हैं, अवाम के पासवान ही लुटेरे बन गए हैं। अदालतों में इन्साफ के लियें जाने वाले लोग आज भी मायूस लोट रहे हैं। तालीम का ऐसा व्यापार तो तारीख़ ने पहले कभी देखा ही नहीं। तोहफों के रूप में बटने वाली ये नैमत इंसान के खून की कीमत पर मिल रही है। ऐसा लगता है जैसे नाइंसाफी कम होने के वजाए बहुत बढ़ गई हो।
हकूमत ने कुछ नहीं बदला तो लोग भी कहाँ बदले हैं। आज भी इज़्ज़त के नाम पर अपने बच्चों का गला घोंटते हैं, बेज़बान बच्चों को दुनिया में आने से पहले ही ख़त्म कर देते हैं। ये नादान यह भी नहीं समझते के ये इज़्ज़त नहीं बल्कि एक बेइज़्ज़ती भरा काम है। अगर ऐसे कामों से इज़्ज़त मिलती तो इस दुनिया का हर इज़्ज़तदार आदमी के हाथ उसकी ही औलाद के खून से सने होते। क्यों लोग दूसरों के बच्चों को अपने बच्चों जैसा नहीं समझते, क्यों उनकी छोटी सी कामयाबी से हसद करते हैं, उनसे नफरत करते हैं। एक बात जान लो जब तक तुम दूसरे बच्चों को अपनों की तरह नहीं समझोगे, तुम्हारे बच्चे भी महफूज़ नहीं रहेंगे।
वो कहते हैं कुछ नहीं बदलेगा, सब ऐसे ही चलता रहेगा। मैं कहता हूँ, वक़्त बदलेगा, लोग बदलेंगे, में भी बदलूंगा, तुम भी बदलोगे, ये कानून भी बदलेंगे और इस तरह यह ज़माना बदल जायेगा।
Ishrat Alig.
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