आज क़मरे में खिड़की से हवा का एक झोका अंदर आया और क़मरे में रखी हुई किताबों में से एक किताब के पन्नों को उड़ाने लगा। किताब के पन्ने जब पलटने लगे तो ऐसा लगा के जैसे किताब ने बोलना शुरू कर दिया हो, किताब के क़िरदार तस्वीर बनकर सामने आने लगे और अपनी-अपनी कहानी दोहराने लगे और यह खामोश किताब बात करने लगी। इस किताब का कोई क़िरदार हँसता हुआ नज़र आया तो कोई उदास, कोई मुस्कुरा रहा था तो कोई परेशान था, कोई किसी की मोहब्बत में दीवाना था तो कोई किसी की किसी की नफरत में बरहम था।
वैसे तो ये किताबें हमेशा खामोश रहती हैं लेकिन कोई इनसे बात करने वाला हो तो ये बोलना भी खूब जानती हैं। ये बात करना भी सिखाती हैं और खामोश रहना भी सिखाती हैं, कभी गुज़रे हुए वक़्त के क़िस्से सुनाती हैं तो कभी किसी की दास्तान बयान करती हैं, हँसते हुओं को रुला देती हैं तो रोते हुओं को हंसा देती हैं, जब सब साथ छोड़ जाएँ तो भी साथ निभाती हैं। कभी आज की तस्वीर दिखाती हैं तो कभी आने वाले कल की और इशारा करती हैं।
इन किताबों के साथ रहते-रहते ज़िन्दगी खुद एक किताब सी लगने लगी है, एक अधूरी सी किताब जिसके बहुत से पन्ने अभी लिखे आने बाकी हैं। ज़िन्दगी की इस किताब में क़िरदारों की कोई कमी तो नहीं फिर भी सब क़िरदार दूर-दूर से नज़र आते हैं, जैसे किताब का हिस्सा ही न हों, जैसे गलत जगह रख दिए गए हों। शायद इस किताब में कुछ और क़िरदार आने बाकी हैं, कुछ मोड़ और आने हैं, कुछ कहानियां और जुड़नी हैं। इब्तेदा तो लिखी जा चुकी है, इंतेहा अभी बाक़ी है। आगाज़ तो पता है, अंजाम अभी बाक़ी है।
किताब मुस्कुरा-कर पूछती है के मेरी कहानी तो पड़ चुके हो, तुम कौन सी कहानी लिख आहे हो। मैंने कहा यह कहानी नहीं एक-कहानी सी है, जिसमें क़िरदार तो हैं लेकिन उनके नाम नहीं, लेकिन ये बेनाम क़िरदार भी आवाज़ बहुत करते हैं ओर देखना जब इन क़िरदारों को नाम मिलेंगे तो इनकी गूंज हर जगह सुनाई देगी।
फिर यह कहती है के क्यों इतना खामोश रहते हो, एक तो हम पहले से ही खामोश थे तुमने हमें ओर खामोश कर दिया है, वैसे हमने भीड़ के साथ रहने की कोशिश तो बहुत की लेकिन भीड़ में अक्सर तनहा महसूस किया, यह तो तुम हो जिसने रफ़ाक़त के लुत्फ़ दिए, अब तो ख़ामोशी भी ख़ामोशी सी नहीं लगती। फिर यह कहती है के क्यों इतनी गहरी-गहरी बातें करते हो, मैं कहता हूँ के जब समन्दर की सैर करनी हो तो गहराई की परवाह क्या, गहराई तो समन्दर की खूबसूरती होती है। कल जो समन्दर को बरसात का पानी समझ बैठे थे ,आज थोड़ी सी लहरों से ही हैरान हैं, ओर जब इसमें सुनामी आएंगी तो आलम क्या होगा। समन्दर कभी किसी को डराने की कोशिश नहीं करता बस इसके मिजाज़ को समझना चाहिए, कभी कोई-हैरानी कोई-परेशानी नहीं होगी। समन्दर ने खुद क्यों नहीं बताया? क्या बताता, समन्दर को भी कोई समन्दर नहीं मानता जब तक इसके तूफ़ान का सामना ना करे।
तुम लिखने वाले क्यों ख्याबों की दुनिया में रहते हो? इस दुनिया में तो कोई मुकम्मल मिलता नहीं बस ख्याबों की दुनिया को ही अपना बना लेते हैं।
फिर कहती है के यह शोक कितना पुराना है, मैं कहता हूँ के याद नहीं कब ये शोक लग गया, हाँ कभी कम तो कभी ज़्यादा होता रहा, लेकिन यह अब शोक शोक-नहीं रहा अब तो यह मोहब्बत बन चूका है और यह मोहब्बत एक जुनून बनती जा रही है और यह जुनून सारी हदें पार कर देना चाहता है, उन रास्तों से गुज़र जाना चाहता है जहाँ से कोई नहीं गुज़रा, नयी मंज़िलें क़ायम करना चाहता है, खुद को मिटा देना चाहता है ओर सब कुछ बदल देना चाहता है।
लिखने वाले ने भी क्या ख़ूबसूरती से लिखा है इसको, एक खोई हुई कहानी को अमर कर दिया, ग़ुमशुदा क़िरदारों को सब की जुबां पर ला-दिया। यह किताब हर किताब-घर का हिस्सा बन गयी है, हर पड़ने वाले का सुकून हो गयी है। ख़बरों में रहना इसकी आदत सी बन गयी है, ऐसा लगता है यह किताब किताब नहीं एक खबर हो गयी है। पढ़ने वाले भी सोचते हैं इस किताब को पढ़ें या इसकी ख़बरों को।
हमारे यहाँ पैर छूने की रस्म तो नहीं है वार्ना इसके लिखने वाले के क़दमों पे गिर-कर उठने का नाम ना लेते, लेकिन कभी उससे मुलाक़ात हुई तो उसके हाथों का बोसा ज़रूर ले-लेंगे।
अहले-किताब को क्या हो गया है, क्यों इसने किताबों से दूरियां बना ली हैं, कोई बताए इन्हे किताबें घर में सजाने या चूमने के लिए नहीं होतीं बल्के पढ़ने के लिए होतीं हैं-समझने के लये होतीं हैं-अमल के लिए होतीं हैं। जब से ये किताबों से दूर हुए हैं इनके आम भी किताबों से ख़त्म हो गए हैं, वार्ना एक दौर था जब ये किताबों के साथ जिया करते थे और किताबें भी इनका नाम खूब पुकारा करती थीं।
यह तिलिस्मानी किताब जिसका नाम आज भी दुनिया के हर कोने में सुनाई देता है इनके सुनहरे दिनों की याद दिलाती है, जो हर दौर में पड़ी जाती है, जिसके बिना पसंदीदा किताबों की फेहरिस्त मुकम्मल नहीं होती, जिसके क़िरदार आज भी ज़िंदा हैं-जो हर बच्चे हर बूढ़े की ज़ुबाँ पर रहते हैं।
ना जाने क्यों अब इनको पढ़ने या लिखने का शोक नहीं, अब तो ये महज़ किताबों के सौदागर बनकर रह गए हैं वार्ना कभी ये नाज़िर और मुस्न्निफ़ हुआ करते थे।
दुनिया कहती है के इन्होने सिर्फ तलवारें ही चलाई हैं, काश कोई आए और बताए ज़माने को के ये भी कभी क़लम के सिपाही हुआ करते थे।
हवा का झोका खामोश हुआ, किताब की हरकत बंद हुई, ज़िन्दगी एक ख्याल से निकल कर दूसरे ख्याल में डूब गयी, एक किताब से निकल कर दूसरी किताब में खो गयी।
Ishrat Alig.
वैसे तो ये किताबें हमेशा खामोश रहती हैं लेकिन कोई इनसे बात करने वाला हो तो ये बोलना भी खूब जानती हैं। ये बात करना भी सिखाती हैं और खामोश रहना भी सिखाती हैं, कभी गुज़रे हुए वक़्त के क़िस्से सुनाती हैं तो कभी किसी की दास्तान बयान करती हैं, हँसते हुओं को रुला देती हैं तो रोते हुओं को हंसा देती हैं, जब सब साथ छोड़ जाएँ तो भी साथ निभाती हैं। कभी आज की तस्वीर दिखाती हैं तो कभी आने वाले कल की और इशारा करती हैं।
इन किताबों के साथ रहते-रहते ज़िन्दगी खुद एक किताब सी लगने लगी है, एक अधूरी सी किताब जिसके बहुत से पन्ने अभी लिखे आने बाकी हैं। ज़िन्दगी की इस किताब में क़िरदारों की कोई कमी तो नहीं फिर भी सब क़िरदार दूर-दूर से नज़र आते हैं, जैसे किताब का हिस्सा ही न हों, जैसे गलत जगह रख दिए गए हों। शायद इस किताब में कुछ और क़िरदार आने बाकी हैं, कुछ मोड़ और आने हैं, कुछ कहानियां और जुड़नी हैं। इब्तेदा तो लिखी जा चुकी है, इंतेहा अभी बाक़ी है। आगाज़ तो पता है, अंजाम अभी बाक़ी है।
किताब मुस्कुरा-कर पूछती है के मेरी कहानी तो पड़ चुके हो, तुम कौन सी कहानी लिख आहे हो। मैंने कहा यह कहानी नहीं एक-कहानी सी है, जिसमें क़िरदार तो हैं लेकिन उनके नाम नहीं, लेकिन ये बेनाम क़िरदार भी आवाज़ बहुत करते हैं ओर देखना जब इन क़िरदारों को नाम मिलेंगे तो इनकी गूंज हर जगह सुनाई देगी।
फिर यह कहती है के क्यों इतना खामोश रहते हो, एक तो हम पहले से ही खामोश थे तुमने हमें ओर खामोश कर दिया है, वैसे हमने भीड़ के साथ रहने की कोशिश तो बहुत की लेकिन भीड़ में अक्सर तनहा महसूस किया, यह तो तुम हो जिसने रफ़ाक़त के लुत्फ़ दिए, अब तो ख़ामोशी भी ख़ामोशी सी नहीं लगती। फिर यह कहती है के क्यों इतनी गहरी-गहरी बातें करते हो, मैं कहता हूँ के जब समन्दर की सैर करनी हो तो गहराई की परवाह क्या, गहराई तो समन्दर की खूबसूरती होती है। कल जो समन्दर को बरसात का पानी समझ बैठे थे ,आज थोड़ी सी लहरों से ही हैरान हैं, ओर जब इसमें सुनामी आएंगी तो आलम क्या होगा। समन्दर कभी किसी को डराने की कोशिश नहीं करता बस इसके मिजाज़ को समझना चाहिए, कभी कोई-हैरानी कोई-परेशानी नहीं होगी। समन्दर ने खुद क्यों नहीं बताया? क्या बताता, समन्दर को भी कोई समन्दर नहीं मानता जब तक इसके तूफ़ान का सामना ना करे।
तुम लिखने वाले क्यों ख्याबों की दुनिया में रहते हो? इस दुनिया में तो कोई मुकम्मल मिलता नहीं बस ख्याबों की दुनिया को ही अपना बना लेते हैं।
फिर कहती है के यह शोक कितना पुराना है, मैं कहता हूँ के याद नहीं कब ये शोक लग गया, हाँ कभी कम तो कभी ज़्यादा होता रहा, लेकिन यह अब शोक शोक-नहीं रहा अब तो यह मोहब्बत बन चूका है और यह मोहब्बत एक जुनून बनती जा रही है और यह जुनून सारी हदें पार कर देना चाहता है, उन रास्तों से गुज़र जाना चाहता है जहाँ से कोई नहीं गुज़रा, नयी मंज़िलें क़ायम करना चाहता है, खुद को मिटा देना चाहता है ओर सब कुछ बदल देना चाहता है।
लिखने वाले ने भी क्या ख़ूबसूरती से लिखा है इसको, एक खोई हुई कहानी को अमर कर दिया, ग़ुमशुदा क़िरदारों को सब की जुबां पर ला-दिया। यह किताब हर किताब-घर का हिस्सा बन गयी है, हर पड़ने वाले का सुकून हो गयी है। ख़बरों में रहना इसकी आदत सी बन गयी है, ऐसा लगता है यह किताब किताब नहीं एक खबर हो गयी है। पढ़ने वाले भी सोचते हैं इस किताब को पढ़ें या इसकी ख़बरों को।
हमारे यहाँ पैर छूने की रस्म तो नहीं है वार्ना इसके लिखने वाले के क़दमों पे गिर-कर उठने का नाम ना लेते, लेकिन कभी उससे मुलाक़ात हुई तो उसके हाथों का बोसा ज़रूर ले-लेंगे।
अहले-किताब को क्या हो गया है, क्यों इसने किताबों से दूरियां बना ली हैं, कोई बताए इन्हे किताबें घर में सजाने या चूमने के लिए नहीं होतीं बल्के पढ़ने के लिए होतीं हैं-समझने के लये होतीं हैं-अमल के लिए होतीं हैं। जब से ये किताबों से दूर हुए हैं इनके आम भी किताबों से ख़त्म हो गए हैं, वार्ना एक दौर था जब ये किताबों के साथ जिया करते थे और किताबें भी इनका नाम खूब पुकारा करती थीं।
यह तिलिस्मानी किताब जिसका नाम आज भी दुनिया के हर कोने में सुनाई देता है इनके सुनहरे दिनों की याद दिलाती है, जो हर दौर में पड़ी जाती है, जिसके बिना पसंदीदा किताबों की फेहरिस्त मुकम्मल नहीं होती, जिसके क़िरदार आज भी ज़िंदा हैं-जो हर बच्चे हर बूढ़े की ज़ुबाँ पर रहते हैं।
ना जाने क्यों अब इनको पढ़ने या लिखने का शोक नहीं, अब तो ये महज़ किताबों के सौदागर बनकर रह गए हैं वार्ना कभी ये नाज़िर और मुस्न्निफ़ हुआ करते थे।
दुनिया कहती है के इन्होने सिर्फ तलवारें ही चलाई हैं, काश कोई आए और बताए ज़माने को के ये भी कभी क़लम के सिपाही हुआ करते थे।
हवा का झोका खामोश हुआ, किताब की हरकत बंद हुई, ज़िन्दगी एक ख्याल से निकल कर दूसरे ख्याल में डूब गयी, एक किताब से निकल कर दूसरी किताब में खो गयी।
Ishrat Alig.
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