खुश्की के इस मौसम में इन आँखों में ये नमी कैसी है। ये पानी बेवजह क्यों निकल रहा है। कहने को तो ये पानी है लेकिन किसी की प्यास भी नहीं बुझा सकता, शायद किसी की तलब को कुछ कम ही कर दे। खुश्क लब हैं, ज़बान प्यासी है फिर भी आँखों से बरसात हो रही है।
समंदरों की कोई कमी नहीं इस जहाँ में फिर भी पानी के लिए जंगे जारी हैं। ये दरया भी प्यासों को छोड़ कर सागर की गोद में गिर जाते हैं। ये क्या माजरा है ये सागर सारे दरियाओं को अपने ही रंग में रंग लेता है और हर एक दरया अपना वजूद खो देता है। ये दरया इस बात को भूल चुका है के अब इसके पानी की मिठास ख़त्म हो चुकी, अब इसका पानी किसी की प्यास नहीं बुझा पायेगा। लेकिन दरया को अब इस बात पर नाज़ है के अब ये दरया नहीं रहा सागर बन चूका है। इसको सागर बनने के लिए अपना वजूद तो खोना ही था। भले से ही अब इसका पानी खारा हो चूका है लेकिन अब इसके पास गहराई है, अब इसके किनारे किसी के काबू में नहीं, इसके पास ख़ामोशी है, इसके पास तूफान भी हैं, इसकी लहरें ज़िन्दगी को नयी उमंगें देती हैं।
ऐसा कोन है यहाँ जिसे प्यास नहीं लगती और ये कोन हैं जिनकी प्यास बुझती ही नहीं। सूरज की तपिश से ज़मीन फटने लगी है और कहीं बादल का नमो-निशाँ नहीं। हर रोज़ दुआएं होती हैं, कोई मोजज़ा नज़र नहीं आता, प्यास की शिद्दत बढ़ती ही जाती है।
बागवान उदास बैठा है कहीं ये फल पकने से पहले सूख न जाएँ, ये हरे पत्ते कहीं पीले न हो जाएं। परिंदे भी अमृत की तलाश में दर-बदर भटक रहे हैं शायद कोई अपने हिस्से का पानी ही इन्हें दे दे। छीना-झपटी के इस आलम में ये उम्मीद बहुत देर से पूरी होती है। राक्षसों से बस्तियां भरी पड़ी हैं और कोई मसीहा नज़र नहीं आता, प्यासे भटक रहे हैं कोई दरया नज़र नहीं आता।
ये झीलें, ये तालाब सब सुख चुके हैं। महज़ इनके निशाँ बाकी हैं जिनको देख के ये महसूस होता है जैसे गुज़रे ज़माने का कोई किला खंडर में तब्दील हो गया हो, जिसे देखकर ये कहा जाता हो के कभी ये एक खूबसूरत महल हुआ करता था जिसमें राजा-रानी की कहानियां पला करतीं थीं।
Ishrat Alig
समंदरों की कोई कमी नहीं इस जहाँ में फिर भी पानी के लिए जंगे जारी हैं। ये दरया भी प्यासों को छोड़ कर सागर की गोद में गिर जाते हैं। ये क्या माजरा है ये सागर सारे दरियाओं को अपने ही रंग में रंग लेता है और हर एक दरया अपना वजूद खो देता है। ये दरया इस बात को भूल चुका है के अब इसके पानी की मिठास ख़त्म हो चुकी, अब इसका पानी किसी की प्यास नहीं बुझा पायेगा। लेकिन दरया को अब इस बात पर नाज़ है के अब ये दरया नहीं रहा सागर बन चूका है। इसको सागर बनने के लिए अपना वजूद तो खोना ही था। भले से ही अब इसका पानी खारा हो चूका है लेकिन अब इसके पास गहराई है, अब इसके किनारे किसी के काबू में नहीं, इसके पास ख़ामोशी है, इसके पास तूफान भी हैं, इसकी लहरें ज़िन्दगी को नयी उमंगें देती हैं।
ऐसा कोन है यहाँ जिसे प्यास नहीं लगती और ये कोन हैं जिनकी प्यास बुझती ही नहीं। सूरज की तपिश से ज़मीन फटने लगी है और कहीं बादल का नमो-निशाँ नहीं। हर रोज़ दुआएं होती हैं, कोई मोजज़ा नज़र नहीं आता, प्यास की शिद्दत बढ़ती ही जाती है।
बागवान उदास बैठा है कहीं ये फल पकने से पहले सूख न जाएँ, ये हरे पत्ते कहीं पीले न हो जाएं। परिंदे भी अमृत की तलाश में दर-बदर भटक रहे हैं शायद कोई अपने हिस्से का पानी ही इन्हें दे दे। छीना-झपटी के इस आलम में ये उम्मीद बहुत देर से पूरी होती है। राक्षसों से बस्तियां भरी पड़ी हैं और कोई मसीहा नज़र नहीं आता, प्यासे भटक रहे हैं कोई दरया नज़र नहीं आता।
ये झीलें, ये तालाब सब सुख चुके हैं। महज़ इनके निशाँ बाकी हैं जिनको देख के ये महसूस होता है जैसे गुज़रे ज़माने का कोई किला खंडर में तब्दील हो गया हो, जिसे देखकर ये कहा जाता हो के कभी ये एक खूबसूरत महल हुआ करता था जिसमें राजा-रानी की कहानियां पला करतीं थीं।
Ishrat Alig
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