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Showing posts from 2020

एहसास:

अगर भूक एक एहसास है तो ये खाने से क्यों मर जाती है क्यों ना महज़ खाने के तसव्वुर से ही पेट भर जाता है, क्यों ना सिर्फ पानी को देखकर ही प्यास की शिद्दत ख़त्म हो जाती है। अगर दर्द सिर्फ एक एहसास का नाम है तो लोग इसकी दवा क्यों करते हैं, अगर मोहब्बत एक एहसास है तो दिवानों को मिलन की ख्याहिश क्यों है, क्यों किसी ने किसी की यादों का नाम बेवफ़ा रखा है। ये एहसास कभी दिल की तड़प है तो कभी दिल का सुकून, ये कभी कोई हंसी ख्वाब है तो कभी दर्दनाक हक़ीक़त, ये किसी की ख़ुशी है तो किसी का ग़ म, ये किसी के लिए अकेलापन है तो किसी के लिए भीड़, किसी के लिए मिलन है तो किसी के लिए जुदाई। किसी को अपने छोटे होने का एहसास है तो कोई ये एहसास करता है के वो बड़ा बन सकता है। कोई किसी की बात का एहसास करता है तो कोई बेबात पे ही एहसास कर रहा है, किसी को अपने होने का एहसास है तो किसी को यह एहसास के शायद वह है ही नहीं, किसी को कुछ पाने का एहसास है तो किसी को कुछ खो जाने का एहसास। कोई किसी को ये एहसास दिलाता है के वो उसको कितना चाहता है तो किसी को ये एहसास ही नहीं के चाहत भी कोई चीज़ है। कोई बस्तियां जलाकर खुश है तो कोई इनक...

तब्दीली

यहाँ हर कोई तब्दीली की बात करता है लेकिन यह तब्दीली होगी क्या, क्यों होगी और कैसे होगी यह बात क्यों नहीं होती। कोई कहता है के हर चीज़ नयी होनी चाहिए तो कोई कहता है के पुरानी चीज़ें फिर से वापस आनी चाहिएं, किसी का यह ख्याल है के कुछ बदलना ही नहीं चाहिए तो कोई कहता है के सब कुछ बदल जाना चाहिए। किसी को चीज़ों के बदलने का इंतेज़ार है तो कोई उन चीज़ों का इंतेज़ार कर रहा है जो बदल चुकी हैं, कोई इन बदलावों से परेशान है तो कोई इनसे बहुत खुश है। तब्दीली कभी नए क़ानून हैं तो कभी नयी  रस्में, कभी नए रासते तो कभी नयी मंज़िलें, कभी नयी उम्मीदें तो कभी नए ख्वाब। कोई कहता है के तबदीली आ तो गयी है लेकिन दिखाई नहीं देती, इसको दिखाई देने में थोड़ा वक़्त लगेगा, कहीं ऐसा ना हो के यह तब्दीली दिखाई देने से पहले ही ख़त्म हो जाए और जिस तब्दीली का हमें ख्वाब दिखाया गया था वो इक झूठा ख्वाब बनकर रह जाए। क्या वो सारे वादे झूठे थे, क्या ख्वाब दिखाने वाला जानता था के ये दिन नहीं बदलेंगे, क्या वह जानता था के वह खुद ही बदल जाएगा, क्या उसकी इन बदली हुई बातों से फिर से कोई तब्दीली आएगी या लोग फिर किसी नए धोके से दो-चार ह...

गुफ़्तगू:

~ क्या लफ्ज़ो की बारिश का नाम ही गुफ़्तगू है या फिर बरसते हुए लफ्ज़ो को पकड़ना गुफ़्तगू है। वैसे तो अक्सर गुफ़्तगू में आवाज़ का होना लाज़िम समझा जाता है लेकिन कभी-कभी कोई आवाज़ किसी गिफ्तगु को खराब भी कर देती है, कभी आवाज़ के ना होने पर कोई गुफ़्तगू समझ में नहीं आती तो कभी कोई आवाज़ किसी गुफ़्तगू में खलल पैदा कर देती है। वैसे तो बोल-चाल का नाम ही गुफ़्तगू है लेकिन कभी यह बोल-चाल ही किसी खामोश गुफ़्तगू को तोड़ देती है। यह गुफ़्तगू किसी के लिए कोई पैग़ाम है तो किसी के लिए इनाम। कभी कोई गुफ़्तगू किसी का दिल बहलाती है तो कभी किसी की दिलाज़ारी करती है, कहीं दिलों को जोड़ती है तो कहीं दिलों को तोड़ देती है, यह कभी मोहब्बत है तो कभी नफ़रत है। अगर कोई पूछे के गुफ़्तगू क्या है तो कहूं-चेहरे की मुस्कुराहट गुफ़्तगू है, हाथ का इशारा गुफ़्तगू है, नज़र का शर्माना गुफ़्तगू है, कभी आँख के आंसू गुफ़्तगू हैं तो कभी खामोश रहना गुफ़्तगू है, कभी किसी के नज़दीक बैठना गुफ़्तगू है तो कभी किसी से दूर हो जाना गुफ़्तगू है, कभी ख़त लिखना गुफ़्तगू तो कभी ख़त पड़ना गुफ़्तगू, कभी किसी से बात करना गुफ़्तगू है तो कभी कोई बात ना करना ही गुफ़्तगू है, कभी क...

मैं कौन हूँ:

यह सवाल कितना आसान होता है जब कोई अजनबी यह पूछे के मैं कौन हूँ लेकिन जब कोई अपना यह कहता है के तुम हो कौन तो थोड़ी तकलीफ होती है लेकिन जब यही सवाल मैं खुद अपने आप से पूछता हूँ के मैं कौन हूँ तो यह आसान सा सवाल मुझे परेशान कर देता है। किसी अजनबी को बताने के लिए कितना कुछ था मेरे पास के मैं कौन हूँ और क्या हूँ और किसी अपने से भी कुछ कह ही सका था के मैं उसका कौन हूँ या वो मेरा कौन है लेकिन जब यही सवाल मैंने अपने आप से पूछा तो मैं कुछ कह ही नहीं पाया जैसे मैं कुछ हूँ  ही नहीं, जैसे जो दुनिया को बताता आया था वो सब एक धोका था एक झूट था। आज यूँ लगा जैसे मेरा कुछ वजूद ही नहीं, या तो मैं कुछ हूँ ही नहीं या मैं अपने बारे मैं कुछ जानता ही नहीं। यह अब तक मैंने क्या किया, दुनिया के बारे मैं जानने की कोशिश करता रहा लेकिन कभी खुद को जानना ही नहीं चाहा, बस वही सबको बताता रहा जो दूसरे मुझे मेरे बारे में बताते रहे, जैसे मैं कोई लिखी हुई किताब था और जो मुझको याद करा दी गयी हो फिर सबको वही पढ़कर सुनाता रहा। कभी अपने-आप से कहता हूँ के मैं कुछ भी नहीं तो कभी यह ग़ुमान होता है के मैं ही सब कुछ हूँ, क...

इरादा:

एक तरफ तो कुछ करने का इरादा और दूसरी तरफ यह उलझन के करें तो करें क्या? एक तरफ तो अपनी यह ख़ामोशी और दूसरी तरफ दुनिया का यह शोर। कुछ करने का इरादा भी है और अभी यह इरादा भी बनाना है के करना क्या है? कुछ लिखने का इरादा भी है कोई उन्वान भी नहीं, इस दिल को सुहाने मौसम की तलाश है और यह क़लम किसी उन्वान की तलाश कर रहा है। पहले यह सोचा के यह इरादा ही तर्क कर दिया जाए लेकिन फिर यह ख्याल आया के क्यों ना आज बेइरादा ही कुछ लिखा जाए, क्यों ना अपने मज़मून का उन्वान ही बदल दिया जाए। इरादा ही तो है अगर पूरा ना भी हुआ तो कोई वादा-खिलाफी तो होगी नहीं। कभी इरादा कुछ करने का होता है तो कभी कुछ ना करने का, कभी यह दिल बहुत कुछ करना चाहता है तो कभी यह तबियत कुछ भी नहीं करना चाहती, कोई अपना इरादा बदल लेता है तो कोई अपना इरादा ही छोड़ देता है, कोई किसी के इरादों को देखकर अपने इरादे बदल लेता है तो कोई किसी को देखकर अपने इरादे को वादे में बदल देता है, किसी के इरादे बहुत मज़बूत हैं तो किसी के बहुत कमज़ोर, कोई किसी के नापाक इरादों से नाराज़ है तो किसी के इरादों को नेक कहता है, कभी किसी की नज़र किसी के इरादों ...

फ़लसफ़ा:

अगर चीज़ों को समझने का नाम ही फ़लसफ़ा है तो दुनिया का हर वह इन्सान जो चीज़ों को समझने की थोड़ी बहुत समझ रखता है फ़लसफ़ी होगा, अगर ऐसा नहीं तो फिर फ़लसफ़ा क्या है? हर किसी की अपनी एक फिलोसॉफी होती है-ज़िन्दगी जीने की,चीज़ों को देखने की, सोचने समझने की लेकिन क्या इतने भर से कोई फिलॉस्फर बन जाता है? या फिर फिलॉस्फर बनने के लिए बहुत सी नॉलेज और ढेर सारी डिग्रियां होनी चाहियें जैसे मास्टर, पीएचडी बगैरह-बगैरह। लेकिन देश के जाने माने इतिहाकार शशि थरूर, जिनकी नॉलेज पर किसी को कोई शक नही ं और न डिग्रीयों में कोई कमी है, वह खुद एक किताब में लिखते हैं के वह फिलॉस्फर नहीं बस घटनाओं को सिलसिलेवार तरीक़े से लिखते हैं। तो क्या फिलॉस्फर कोई ऐसा शख्स हो सकता है जो पड़ा लिखा ना हो, जिसने कोई किताब लिखना तो दूर एक किताब पड़ी भी ना हो? यक़ीनन ऐसा हो सकता है, और ना होने को कोई चाहे फिलोसॉफी में कितनी भी डिग्री क्यों ना ले ले अगर वह फिलॉस्फर नहीं तो नहीं। ये फ़लसफ़ी अजीब से लोग होते हैं अक्सर लोग इनको बात करते हुए बेवक़ूफ़ समझ लेते हैं लेकिन कुछ देर बात करने के बाद सोचते हैं के यह बेवक़ूफ़ बना रहा है , बहुत पेचीदा सी बात...

तलब:

अगर किसी को कुछ खाने की तलब हुई है तो ज़रूरी नहीं के उसे भूख लगी है, हो सकता है के खाना तो उसने वक़्त पे खा लिया हो लेकिन बस बेवक़्त कुछ खाने को दिल चा-रहा हो। भूख लगे और कुछ न मिले तो इंसान बर्दाश्त कर सकता है लेकिन अगर खाने की तलब हो तब कुछ ना मिले तो बर्दाश्त करना मुश्किल होता है। वैसे तो अक्सर कुछ खाने की ही तलब होती है लेकिन कभी-कभी खाने को तो बहुत कुछ होता है लेकिन भूख नहीं होती तो ऐसे में भूख की तलब होती है। कभी कोई किसी को तलब कर लेता है तो कभी खुद तलब हो जाता, कभ ी हमें तलब तो कभी हम-तलब तो कभी गौर-तलब। क्या तलब का कोई पैमाना है, अगर तलब सिर्फ एहसास है तो क्या लफ्ज़ एहसास को बयान कर सकते हैं या फिर लफ्ज़ एहसास पैदा करते हैं। अब तो यह पीने वाला ही बता सकता है के वह जाम देखता है या पैमाना देखता है या साक़ी को देखता है या फिर मैयखाना देखकर पीता है या फिर बस पीने की तलब होने पे सब कुछ भूल जाता है। Ishrat Alig

शाहीन_बाग़:

शाहीन बाग़… जो कल तक महज़ दिल्ली की एक छोटी सी जगह का नाम था, आज यह नाम एक तहरीक बन चूका है, शहर दर शहर शाहीन बाग़ बनते जा रहे हैं। यह तहरीक पूरे देश में जितनी तेज़ी से फ़ैल रही है के वह दिन दूर नहीं जब हर शहर में एक शाहीन बाग़ होगा। तारीकी के इस आलम में यहाँ से जो शमा रोशन हुई है उसने ना सिर्फ पूरे मुल्क बल्कि दुनिया भर को रौशन किया है। इसकी रोशनी से नफरतों के सौदागर घबराने लगे हैं और जल्द ही इसकी रौशनी नफरतो के अंधेरो को मिटा कर रख देगी। इस मुहिम की मशाल उन पर्दा नशीं औरतों ने थामी है जो कल तक सिर्फ बच्चो की परवरिश करतीं, घरो को सजातीं और हर रोज़ नए ख्वाब बुनती। लोग यह देख कर हैरत में हैं के ये घरेलु औरतें ऐसा काम कैसे कर सकती हैं तो उनको यह समझ लेना चाहिए के एक औरत जब माँ बन सकती है तो वह कुछ भी कर सकती है, क्यूंकि माँ बनने से ज़्यादा तकलीफ-दे कोईऔर काम हो ही नहीं सकता और जो औरत यह काम कर सकती है वो दुनिया का कोई भी काम कर सकती है। इन घरों की माँ-बहने और दादियों ने जब पानी सर से ऊपर होते देखा तो ये जाड़ो की सर्द रातों में ही अपने घरो के बिस्तरों को छोड़ कर सड़को पे आ गयीं। इनके एक हाथ में ...

तन्हाई:

क्या अकेलेपन का नाम तन्हाई है या फिर अकेलेपन का एहसास तन्हाई है। अगर अकेलेपन का एहसास ही तन्हाई है तो फिर जिसे अकेले में भी अकेलापन ना लगे तो वो तन्हा नहीं या जो भीड़ में भी अकेला महसूस करे वो तन्हा है। यह तन्हाई जहाँ अकेला कर देती है तो वहीं खुद के साथ वक़्त गुज़ारने का मौका भी देती है, यह तन्हाई कभी दिल का सुकून बन जाती है तो कभी दिल की तड़प। हर एक की तन्हाई की अपनी अलग वजह है, कोई तन्हाई में बैठकर अफ़साने लिखता है तो कोई उनको तन्हाई में पड़ता, कोई तन्हाइयों में किसी के म िलन का इंतेज़ार करता है तो कोई किसी मिलन के बाद बिछड़ कर तन्हा हो गया है, किसी की तन्हाई की वजह कोई हादसा है तो किसी की वजह कोई धोखा। यह तन्हाई किसी की आदत है तो किसी की मज़बूरी,किसी का शोक है तो किसी की बेबसी, किसी के लिए यह महज़ एक पहेली है तो किसी के लिए दर्दनाक हक़ीक़त, यह किसी के लिए यादों का एक सुहाना सफर है तो किसी के लिए एक लम्बे सफर के बाद की मंज़िल, कोई मोहब्बत की वजह से तन्हा है तो कोई इबादत में तन्हा है, यह किसी के लिए क़ैद है तो किसी के लिए आज़ादी, किसी के लिए इम्तिहान है तो किसी के लिए कामयाबी, यह किसी का सुकून है...

ग़लतफ़हमी:

~ क्या किसी ग़लती का नाम ही ग़लतफ़हमी है या गलत को को सही समझ लेना ग़लतफ़हमी है, लेकिन गलत को सही समझ लेना तो खुशफ़हमी है, तो फिर ग़लतफ़हमी क्या है ? क्या ग़लतफ़हमी किसी एहसास का नाम है या कोई ऐसा काम जिसे हमने सही जान लिया है और वो सही था ही नही या कोई ऐसा काम जिसे हमने गलत मान लिया लेकिन वो ग़लत नही था मसलन अगर कोई किसी की मुस्कुराहट को हाँ समझ लेता है तो मुस्कुराने वाला यही सोचेगा के ये ग़लतफ़हमी में है लेकिन कभी कोई किसी के गुस्से को ना समझ लेता है और शायद ऐसा था ही नही। तो क ्या किसी एक की ग़लतफ़हमी दूसरे की खुशफ़हमी है या फिर ऐसी कैफ़ियत जिसमें ग़लती करने वाले को ये एहसास ही नही के वो ग़लती कर रहा है या फिर सही करके भी उसे ग़लत समझ लेना ग़लतफ़हमी है। ग़लतफ़हमी कभी नज़रों का धोका है तो कभी दिल को समझाने का एक तरीक़ा, कभी खुशी का एहसास तो कभी परेशानी का सबब। अगर किसी ग़लतफ़हमी से किसी का दिल बहल जाता है तो इसमें ग़लत क्या है और अगर किसी खुशफ़हमी से किसी को ख़ुशी मिल जाती है तो इसमें बुराई भी क्या है। Ishrat Alig

नया साल:

गुज़रे हुए तमाम सालों की तरह यह साल भी तारीख का हिस्सा बन जाएगा और फिर इसमें दर्ज हुए वाक़िओं और हादसों को क़िस्से और कहानिओं की शक्ल में इसको याद किया जाएगा। जब ये साल शुरू हुआ था तो कुछ नए इरादे थे, कुछ कस्मे, कुछ वादे, कुछ कर-गुज़रने की जुस्तजू, कुछ आरज़ू और जब ये गुज़र चूका है तो इसको किताब के पन्नो की तरह पलट का देखते हैं के इसमें क्या पाया और क्या खोया, कोन आया कोन गया। किसी के लिए ये साल कुछ नया लेकर आएगा तो किस के लिए इसमें कुछ भी नया नहीं होगा- वही सुबह, वही शाम, उन्ही पुराने सांचों में ढली हुई वही पुरानी ज़िन्दगी। कोई अपनी ज़िन्दगी को बदलने में लगा हुआ है तो कोई बदली हुई ज़िन्दगी को दुबारा हासिल करना चाहता है। ना जाने कितने साल बदल जाते हैं और किसी की ज़िन्दगी के दिन हैं जो बदलते ही नहीं और वहीं कोई ये आरज़ू करता है के काश बदले हुए पुराने दिन वापस आ जाएं। किसी ने हर साल की तरह इस साल को भी डायरी के पन्नो में समेट लिया है जब भी इनकी याद आएगी तो वो इनको पलट कर देखेंगे तो किसी ने इनके लम्हों को तस्वीरों में क़ैद कर लिया है जो कभी हंसाएंगी कभी रुलाएंगी। कोई इस आने वाले ...

शिकायत:

कभी शिकायत बदली हुई चीज़ों से है तो कभी शिकायत उन चीजों से जो बदली ही नहीं। कभी कोई नया क़ानून परेशान करता है तो कभी कोई पुराना दस्तूर। कभी शिकायत मेहबूब से तो कभी मेहबूब की जुदाई से, कभी खुदा से तो कभी खुदा की ख़ुदाई से, कभी हुक्मरान से तो कभी अवाम से, कभी निकलते हुए सूरज से तो कभी घिरे हुए बादल से, कभी किसी आँख के आँसू से तो कभी किसी आँख के काजल से, कभी ऊँची-ऊँची इमारतों से तो कभी ज़मीन में धँसे हुए मकानों से, कभी हवा में उड़ते हुए इंसानो से तो कभी घुटनों के बल चलते हुए  लोगों से। कभी किसी की मुस्कुराहट परेशान करती है तो कभी किसी की उदासी, कभी किसी की आवाज़ तो कभी किसी की ख़ामोशी, कभी दिन का उजाला तो कभी रात का अँधेरा, कभी रोशनियों की चकाचोंध तो कभी कोई सन्नटा, कभी कोई भीड़ तो कभी वीराना। किस-किस की शिकायत करें ओर किस-किस से करें और क्यों करें, अब तो बस यही सोचा है के खुद की ही शिकायत करें और खुदी से करें। Ishrat Alig

#ज़िन्दगी:

जो ज़िन्दगी में आज है वो कल ना था लेकिन ज़िन्दगी में कल भी कुछ कमी सी लगती थी और आज भी यह ज़िन्दगी अधूरी सी लगती है। ऐसा महसूस होता है जैसे थोड़ा सा पाने की कोशिश में बहुत कुछ खो दिया है। जो रास्ते यहाँ तक लाए थे उनपे वापसी का सफ़र नज़र नहीं आता, एक भीड़ चली आ रही है, अगर कोई मुड़के जाने की कोशिश करे भी तो यह भीड़ उसे कुचल कर निकल जाए। बज़ाहिर तो यूँ लगता है के बहुत आगे निकल आए हैं लेकिन पीछे मुड़के देखने पर एहसास होता है के यह ज़िन्दगी आज भी वहीं ठहरी हुई है, बस वक़्त ही आगे नि कल गया है, जगहें वहीं हैं नक्शे बदल गए हैं, हलात वही हैं लोग बदल गए हैं, काम वही हैं तरीके बदल गए हैं, नाम वही हैं बस चेहरे बदल गए हैं, इंसान वही हैं उसूल ही बदल गए हैं। कहते हैं के ज़माना बदल गया लेकिन ऐसा लगता है जैसे कुछ भी नही बदला, वही मसले वही मसाईल और ज़िन्दगी की वही जिद्दोजहद। यह ठहरी हुई सी ज़िन्दगी कभी आगे बढ़ना चाहती है तो कभी पीछे लौट जाना चाहती है, कभी जीतना चाहती है तो कभी सब कुछ हार-जाना चाहती है, कभी ज़मीन में सोना चाहती है तो कभी आसमानो में उड़ना चाहती है, कभी बेबात पे मुस्कुराती है तो कभी हर बात पे र...

ख़बर:

ख़बर वो नहीं जो अखबार में छपी है, ख़बर वो है जो नज़रों के सामने है। खबर वो नहीं जो हमें सुनाई जा रही है, खबर वो है जो हम देख रहे हैं। ख़बर रईस के घर का शोर नहीं बल्के गरीब के घर की ख़ामोशी है जहाँ भूक की शिद्दत से किसी की आवाज़ नहीं निकलती। बोझा ढोता हुआ मजदूर जिसका चेहरा बताता है के दिनभर की मजदूरी के बाद भी उसे भरपेट खाना मिलेगा या नहीं, वो ख़बर है। ख़बर ये नहीं के साहब ने क्या खाया क्या पहना है, ख़बर ये है के आज भी कितने लोग भूके सो जाते हैं। ख़बर महलों की शहनाई नहीं बल्के गरीबो के घर का मातम है। ख़बर शहरों का शोर नहीं बल्के गाँव की वो ख़ामोशी है जहाँ हर रोज़ किसान क़र्ज़ के बोझ तले दबकर मर जाते हैं। ख़बर बाजार में बिकता हुआ सामान नहीं बल्के वहां से गुज़रते हुए लोगो की आँखों की बेबसी है। ख़बर जंग का एलान ही नहीं बल्के उसके बाद के हालात भी हैं, ऐसी जंग जिसकी जीत के बाद शायद कोई जश्‍न भी न हो। ख़बर सरहद पर गिरी लाशों की गिनती ही नहीं बल्के सिपाही के उजड़े हुए घरो की अधूरी कहानियां भी हैं जो शायद किसी को याद नहीं। ख़बर नेताओं के वादे नहीं बल्के इनके फरेब हैं जो मुसलसल चले आ रहे हैं। ख़बर एक हुकुमरान के ...