ख़बर वो नहीं जो अखबार में छपी है, ख़बर वो है जो नज़रों के सामने है। खबर वो नहीं जो हमें सुनाई जा रही है, खबर वो है जो हम देख रहे हैं। ख़बर रईस के घर का शोर नहीं बल्के गरीब के घर की ख़ामोशी है जहाँ भूक की शिद्दत से किसी की आवाज़ नहीं निकलती।
बोझा ढोता हुआ मजदूर जिसका चेहरा बताता है के दिनभर की मजदूरी के बाद भी उसे भरपेट खाना मिलेगा या नहीं, वो ख़बर है।
ख़बर ये नहीं के साहब ने क्या खाया क्या पहना है, ख़बर ये है के आज भी कितने लोग भूके सो जाते हैं।
ख़बर महलों की शहनाई नहीं बल्के गरीबो के घर का मातम है। ख़बर शहरों का शोर नहीं बल्के गाँव की वो ख़ामोशी है जहाँ हर रोज़ किसान क़र्ज़ के बोझ तले दबकर मर जाते हैं। ख़बर बाजार में बिकता हुआ सामान नहीं बल्के वहां से गुज़रते हुए लोगो की आँखों की बेबसी है।
ख़बर जंग का एलान ही नहीं बल्के उसके बाद के हालात भी हैं, ऐसी जंग जिसकी जीत के बाद शायद कोई जश्न भी न हो।
ख़बर सरहद पर गिरी लाशों की गिनती ही नहीं बल्के सिपाही के उजड़े हुए घरो की अधूरी कहानियां भी हैं जो शायद किसी को याद नहीं।
ख़बर नेताओं के वादे नहीं बल्के इनके फरेब हैं जो मुसलसल चले आ रहे हैं।
ख़बर एक हुकुमरान के हुकुम का एलान ही नहीं बल्के अवाम का एहतिजाज भी है जिसने न जाने कितने हुकुमरानों को बदला है।
Ishrat Alig
Ishrat Alig
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