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Showing posts from July, 2019

सवाल-जवाब:

 ~  मैं यह सोचता हूँ कि ये सवाल-जवाब क्या हैं? क्या हर सवाल का जवाब मिल सकता है? क्या हर सवाल का जवाब दे देना चाहिए? क्या किसी को हर सवाल पूछ लेना चाहिए? क्या किसी का सवाल दूसरे का जवाब नहीं हो सकता? क्या किसी के जवाब से सवाल पैदा नहीं होते? क्या कभी किसी सवाल का जवाब न देने में ही उसका जवाब छुपा होता है? क्या कोई जवाब सवाल से भी अच्छा हो सकता है? या ये सवाल ही है जो जवाब को अच्छा बना देता है? अगर सवाल इतना अच्छा है तो इसका जवाब ही क्यों दया जाए? क्यूँ न ऐसे सवाल को ला-जवाब रखा जाए? क्या जवाब के मिल जाने से सवाल की एहमियत कम हो जाती है? या फिर जवाब न देने पर सवाल की क़दर ख़त्म हो जाती है? क्या कोई सवाल ऐसा हो सकता है जिसका कोई जवाब ना हो? क्या कोई जवाब ऐसा दे सकता है जिसपे कोई सवाल न हो? क्या हमारी ज़िंदगी सवालों और जवाबों के सिवा कुछ भी नहीं? क्या यह ज़िंदगी खुद एक सवाल है? क्या मौत ही इस ज़िंदगी का जवाब ह? जब ये ज़िन्दगी-मौत ही सवाल-जवाब हैं तो हम इसे लेकर इतने परेशान क्यों हैं? कोई किसी जवाब की तलाश में है तो कोई किसी सवाल से दूर हो जाना चाहता है, किसी के पास सवाल करने का हुन...

क़मरे की किताब:

आज क़मरे में खिड़की से हवा का एक झोका अंदर आया और क़मरे में रखी हुई किताबों में से एक किताब के पन्नों को उड़ाने लगा। किताब के पन्ने जब पलटने लगे तो ऐसा लगा के जैसे किताब ने बोलना शुरू कर दिया हो, किताब के क़िरदार तस्वीर बनकर सामने आने लगे और अपनी-अपनी कहानी दोहराने लगे और यह खामोश किताब बात करने लगी। इस किताब का कोई क़िरदार हँसता हुआ नज़र आया तो कोई उदास, कोई मुस्कुरा रहा था तो कोई परेशान था, कोई किसी की मोहब्बत में दीवाना था तो कोई किसी की किसी की नफरत में बरहम था। वैसे तो ये किताबें हमेशा खामोश रहती हैं लेकिन कोई इनसे बात करने वाला हो तो ये बोलना भी खूब जानती हैं। ये बात करना भी सिखाती हैं और खामोश रहना भी सिखाती हैं, कभी गुज़रे हुए वक़्त के क़िस्से सुनाती हैं तो कभी किसी की दास्तान बयान करती हैं, हँसते हुओं को रुला देती हैं तो रोते हुओं को हंसा देती हैं, जब सब साथ छोड़ जाएँ तो भी साथ निभाती हैं। कभी आज की तस्वीर दिखाती हैं तो कभी आने वाले कल की और इशारा करती हैं। इन किताबों के साथ रहते-रहते ज़िन्दगी खुद एक किताब सी लगने लगी है, एक अधूरी सी किताब जिसके बहुत से पन्ने अभी लिखे आने बाकी हैं। ज़ि...

वक़्त क्या है:

~ कोई मुझसे अगर पूछे के सबसे क़ीमती चीज़ क्या है तो बेझिजक मैं कहूंगा के "वक़्त", और अगर कोई यह पूछे के वक़्त क्या है तो कहूंगा के कुछ नहीं, कुछ भी नहीं, महज़ एक धोका है। ये ज़मीन, ये आसमान, क़ायनात का हर एक ज़र्रा अपने होने की दलील पेश करता है कि उसका अपना एक वजूद है लेकिन वक़्त के होने कि क्या दलील है। ये बदलती हुई चीज़ें वक़्त के होने का एहसास तो कराती हैं पर इसको साबित नहीं करतीं। अगर वक़्त है तो कहाँ है, कैसा दीखता है, कैसे चलता है, कब गुज़रता है, कहाँ से गुज़रता है, क्या कभी किसी ने देखा है। अगर ज़मीन अपना चक्कर पूरा करने मैं ज़रा भी देरी कर दे तो वक़्त के ये पैमाने गलत साबित होंगे, अगर सूरज ही ना निकले तो ये रात-दिन कोई चीज़ ही नहीं। सूरज की रौशनी बताती है के वक़्त भी कुछ है तो कभी ज़मीन के चक्कर की देरी घड़ी को बदल देते हैं। हम वक़्त को समझ नहीं रहे बस घड़ी के इशारे पर नाच रहे हैं। कभी इंसान की रफ़्तार तय करती है के वक़्त की रफ़्तार क्या होगी तो कभी जगह बताती है के वक़्त को कैसे चलना है। कुछ जगहें ऐसी हैं जहाँ वक़्त बहुत आहिस्ता चलता है तो कुछ ऐसी हैं जहाँ यह तेज़ी से गुज़र जाता है, और कुछ जग...

मंज़िल और मुसाफिर:

कहते हैं के ज़िन्दगी एक सफर है, हर सफर की एक मंज़िल होती है, अगर ज़िन्दगी सफर है तो इसकी भी कोई मंज़िल होगी? अगर हम सब मुसाफिर हैं तो फिर हमारी मंज़िल क्या है? किसी के सामने कोई मंज़िल है तो किसी के सामने सिर्फ रस्ते ही रास्ते हैं। कोई किसी मंज़िल की तलाश में है तो कोई नया रास्ता ढूंढ़ता है l किसी रास्ते पर क़दमों के निशान मिलते हैं तो किसी रास्ते पर पहली बार चलना पड़ता है। कभी कोई पुल बनाना पड़ता है तो कभी कोई कश्ती बनानी पड़ती है। कभी रास्ते के पत्थर हटाने पड़ते हैं तो कभी कोई मकान बनाना पड़ता है तो कभी कोई दीवार गिरनी पड़ती है। कभी लहरों से झूझना तो कभी किनारों की तलाश करना। कभी किसी तूफान का सामना तो कभी रास्तों की भूलभुलैया में खो-जाना। कभी किसी काफले के साथ तो कभी अकेले ही चलना। कभी किसी रहबर की तलाश तो कभी किसी रेहज़न का डर। कभी सख्त धूप तो कभी अँधेरी रातों के सन्नाटे, कभी प्यास की शिद्दत तो कभी खाने की तलब, कभी पैरों की थकन तो कभी किसी की याद में उदासी। यहाँ कोई रास्तों से अंजान है तो कोई मंज़िल से बेख़बर। कोई रास्ते बदलता है तो कोई मंज़िल ही बदल लेता है। किसी को ठहरना अच्छा नहीं लगता तो किस...

ख़्वाब और हक़ीक़त:

यूँ तो ख़्वाब अक्सर सोने के बाद आते हैं लेकिन कुछ ख़्वाब हैं जो सोने ही नहीं देते। ख़्वाब वो भी हैं जो खुली आँखों से देखे जाते हैं और ख्वाबों वो भी हैं जो आँख लगने के बाद आते हैं। कुछ ख़्वाब याद ही नहीं रहते तो कुछ ख़्वाब हैं जो भुलाये ही नहीं जाते। कुछ ख़्वाब हक़ीक़त बन जाते हैं तो कुछ ख़्वाब ख़्वाब ही रह जाते हैं। कुछ ख़्वाब साथ चलते रहते हैं तो कुछ ख़्वाब साथ छोड़ जाते हैं। कभी ख़्वाब में कोई ख़्वाब नज़र आता है तो कभी हक़ीक़त ही ख़्वाब बन जाती है। कभी कोई हक़ीक़त ख्वाबों को ख़त्म कर देना चाहती है तो कभी कोई ख़्वाब हक़ीक़त को बदल देना चाहता है। कोई हर रोज़ नए ख़्वाब देखता है तो कोई अपने एक ही ख़्वाब के साथ ज़िन्दगी गुज़ार देना चाहता है। कभी कोई हक़ीक़त किसी से रुठ जाती है तो कभी किसी के ख्वाबों को नज़र लग जाती है। कोई आने वाले कल के ख्वाब देख रहा है तो कोई गुज़रे वक़्त के ख्वाबों में डूबा हुआ है। कोई किसी ख़्वाब से परेशान है तो कोई किसी हक़ीक़त से बेदार हो चूका है। किसी के पास कोई ख़्वाब ही नहीं हैं तो किसी से कोई हक़ीक़त बहुत दूर है। कभी कोई ख़्वाब आने वाले कल की पेशगोई करता है तो कभी कोई हक़ीक़त किसी ख़्वाब की याद दिलाती ह...

रौशनी और अंधेरा:

कहते हैं के रौशनी रंगों का नाम है, रंगों में एक रंग तो काला भी है, तो फिर ये अंधेरा क्या है। कोई कहता है अंधेरा हर जगह है, रौशनी आती है और अंधेरा ख़त्म कर देती है। ये रौशनी आती हुई तो दिखाई देती है लेकिन ये चली कहाँ जाती है, अगर ये अँधेरा ख़त्म हो गया था तो फिर कैसे आ गया है, अगर ये कहीं चला गया था तो गया कहाँ था। आँखों में रौशनी है फिर भी आँखें बंद करो तो अँधेरा हो जाता है, आँखों की रौशनी को भी देखने के लिए रौशनी की ज़रुरत है। कभी ये रौशनी अंधेरे के ऊपर पड़ती है तो कभी ये अंधेरा साया बनके रौशनी के ऊपर चलता है। किसी को रौशनी अच्छी लगती है तो किसी को अंधेरों से आशनाई है। कोई रौशनी में चमकना चाहता है तो कोई अंधेरों में भटकता है और इनमें खो जाना चाहता है। किसी को रौशनी में नींद नहीं आती तो किसी को अँधेरा परेशान करता है। कोई रात के अंधेरों में भी चमकता है तो कोई दिन की रौशनी में भी नज़र नहीं आता। कुछ अंधेरों में रहते हैं फिर उनकी ज़िन्दगी रोशन है और कुछ रौशनी के होते हुए भी अंधेरे में हैं। ये रौशनी अनगिनत कहानियाँ कहती है लेकिन अंधेरे के पास भी कहानिओं की कमी तो नहीं। रात की शबनम का अंधेरे क...

एक ख्याल:

इस ज़मीन से आसमान नज़र आता है मुझे। इसमें चाँद, सितारे, जुगनू सब थे, कहाँ गए। सूरज की इस रौशनी ने इनको ख़त्म कर दिया है या ये खुद ही इससे शरमा के कहीं छुप गए हैं। क्या इसी बात पे ये सूरज इतना इतरा रहा है। क्या इसको नहीं मालूम के शाम होते ही इसकी रौशनी ख़त्म हो जायेगी और लोग चाँद की तरफ मोहब्बत भरी नज़रों से देखेंगे। चाँद की रौशनी सूरज की तरह दुनिया की हर शय को तो रोशन नहीं करती लेकिन ये क्या कम है लोग चाँद का पीछा करते हैं, इसको टकटकी बांधकर देखते हैं। सितारों भरी रात भी चाँद के बिना सूनी नज़र आती है। एक सितारा जो चाँद के आस पास रहता है ये सोच कर कितना खुश होता है के लोग सब सितारों को छोड़कर इसी की तरफ देख रहे हैं और खुश भी क्यों ना हो इसको चाँद के साथ रहने का शरफ जो हासिल हुआ है। ये कितना उदास था जब चाँद नहीं निकला था और चाँद की तलाश में लोग दूसरे सितारों की तरफ देख रहे थे। ये अनोखा सितारा अनगिनत सितारों में कहीं खो-कर रह गया था और जब चाँद निकला तो ये उन लोगों से भी ज़्यादा खुश था जो चाँद को देख कर ईद मना रहे थे। सितारों भरी इस रात में दिन की कोई कमी तो महसूस नहीं होती लेकिन दिन का उजाला भी ...

तस्वीर और अल्फ़ाज़:

जब भी किसी तस्वीर को देखता हूँ तो ज़ेहन में कुछ अल्फ़ाज़ आ जाते हैं, ऐसा महसूस होता है जैसे तस्वीर ने ही कुछ कहा हो, जैसे तस्वीर बात कर रही हो। फिर ये ख्याल आता है कोई और इसको देखेगा तो कुछ और ही सोचेगा। अगर ये तस्वीर बोलती है तो कुछ और ही सुनेगा। कुछ लोग ये दावा करते हैं के वो तस्वीर को पढ़ना जानते हैं, तो हर पड़ने वाला कुछ अलग ही पड़ेगा। कहते हैं के लिखे हुए अल्फ़ाज़ को तो सब पड़ लेते हैं लेकिन तस्वीर पे तो कुछ भी नहीं लिखा फिर लोग इसे कैसे पड़ते हैं। फिर इस बात का ख्याल आता है के लिखे हुए को पड़ तो सब लेते हैं पर ज़रूरी नहीं सब समझ भी लेते हों। तस्वीर को देखते तो सभी हैं पर ज़रूरी नहीं सब इसे पड़ भी लेते हों। हर तस्वीर बनाने वाला यही सोचता होगा के उसकी तस्वीर यादगार बन जाए और इससे भी ज़्यादा ये सोचता होगा के कोई इसको समझे और बताये यह तस्वीर क्या कहती है, क्या दास्तान बयां करती है। तस्वीर पे ना कुछ लिखा होता है न इसकी कोई ज़ुबाँ होती है फिर भी हर पड़ने वाला इसको पड़ लेता है। यहाँ कोई चेहरे को तस्वीर की शक्ल देना चाहता है तो कोई तस्वीर को लफ़्ज़ों में उतारना चाहता है, कोई नयी तस्वीर बनाना चाहता है त...

तिशना लब:

खुश्की के इस मौसम में इन आँखों में ये नमी कैसी है। ये पानी बेवजह क्यों निकल रहा है। कहने को तो ये पानी है लेकिन किसी की प्यास भी नहीं बुझा सकता, शायद किसी की तलब को कुछ कम ही कर दे। खुश्क लब हैं, ज़बान प्यासी है फिर भी आँखों से बरसात हो रही है। समंदरों की कोई कमी नहीं इस जहाँ में फिर भी पानी के लिए जंगे जारी हैं। ये दरया भी प्यासों को छोड़ कर सागर की गोद में गिर जाते हैं। ये क्या माजरा है ये सागर सारे दरियाओं को अपने ही रंग में रंग लेता है और हर एक दरया अपना वजूद खो देता है। ये दरया इस बात को भूल चुका है के अब इसके पानी की मिठास ख़त्म हो चुकी, अब इसका पानी किसी की प्यास नहीं बुझा पायेगा। लेकिन दरया को अब इस बात पर नाज़ है के अब ये दरया नहीं रहा सागर बन चूका है। इसको सागर बनने के लिए अपना वजूद तो खोना ही था। भले से ही अब इसका पानी खारा हो चूका है लेकिन अब इसके पास गहराई है, अब इसके किनारे किसी के काबू में नहीं, इसके पास ख़ामोशी है, इसके पास तूफान भी हैं, इसकी लहरें ज़िन्दगी को नयी उमंगें देती हैं। ऐसा कोन है यहाँ जिसे प्यास नहीं लगती और ये कोन हैं जिनकी प्यास बुझती ही नहीं। सूरज की तपिश ...

अमीरी-गरीबी:

आजकल अमीर और गरीब की पहचान बहुत आसान हो गयी है, और दोनों की एक दूसरे से दूरियाँ भी काफी बढ़ गयीं हैं। नहीं तो एक ज़माना ऐसा भी था जब अमीरी और गरीब ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा एक साथ गुज़ारा करते थे, उनके बीच फासले इतने ज़्यादा नहीं थे या ये कहा जाये के फासले थे ही नहीं। आज तो अमीरी, गरीबी के के बीच में दीवारें नज़र आती हैं और ना तो कोई इन दीवारों को गिराने की कोशिश ही करता है और ना ही कोई पुल बना रहा है। और तो और ये दीवारें दिन बा दिन ऊँची ही होती जा रही हैं। इन दीवारों को कोई लाँघ न सके इनके ऊपर कांटे भी बिछा दिए गए हैं। इंसानी जिंदगी ने वो दौर भी देखा है जब शाही घरानों के राजकुमार एक ही आश्रम में गरीबों के बीच रहकर ही परवरिश पाया करते थे, तालीम हासिल किया करते थे, गरीबी को समझा करते थे, उनके साथ सुख दुखः में शामिल हुआ करते थे। आने वाले कल में जो उनकी अवाम होगी उसके बारे में दूसरों से पूछने की ज़रुरत पेश नहीं आती थी। उनके दोस्त गरीब भी होते थे,उनकी महफिलों में गरीब बे-झिझक जाया करते थे। आज न कोई अमीर किसी गरीब से दोस्ती करता है और न किसी अमीर की महफ़िल में कोई गरीब नज़र ही आता है, अगर कोई सदा दिल ...

क़ानून-ऐ-क़ुदरत:

इस दुनिया के ये कैसे क़ानून हैं, के यहाँ जब एक मर्द धोका खाता है तो वो मिलता है किसी मैख़ाने में, वीराने में, किसी मंदिर या किसी मस्जिद में, या फिर किसी आश्रम में। लेकिन जब एक औरत धोखा खाती है तो वो मिलती है किसी तवायफ के कोठे पे, ज़माने की ठोकरों में, या फिर जीतेजी एक जहन्नुम में। कहते हैं सब कुछ बदल गया, दुनिया बदल गयी, ज़माना बदल गया, इंसान के तौर-तरीके बदल गए, इंसानी साज़-ओ-सामान बदल गया। हाँ बदला तो बहुत कुछ है लेकिन क्या इन्साफ बदल सकता है, क्या क़ातिल मज़लूम बन सकता है, क्या राक्षस को देवता कह सकते हैं, क्या जान लेने वाला जान बचाने वाले से बड़ा बन सकता है। ये इंसान के बनाये हुए कानून हैं, जो बदलते रहते हैं। ऐसा हर कानून ख़त्म हो जायेगा जो क़ानून-ए-क़ुदरत के खिलाफ बनेगा। और ऐसे कानून को एक दिन खत्म होना ही होगा। इंसानी तारीख ने न जाने कितने ऐसे क़ानून देखे हैं। कभी चिताओं में जलती हुई ज़िंदा औरतें, सरे-बाज़ार बिकते हुए लोग, पैदा होते ही दफ़न होती हुई मासूम बच्चियाँ,सफ़ेद कपड़ों में लिपटी हुईं ज़िंदा देवियां, इंसान की कमर से बंधी हुई झाड़ूएं, एक ख़ास तबके के लिए इबादतगाह के बंद दरवाजे। ये सब यह...