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वक़्त क्या है:

~ कोई मुझसे अगर पूछे के सबसे क़ीमती चीज़ क्या है तो बेझिजक मैं कहूंगा के "वक़्त", और अगर कोई यह पूछे के वक़्त क्या है तो कहूंगा के कुछ नहीं, कुछ भी नहीं, महज़ एक धोका है।
ये ज़मीन, ये आसमान, क़ायनात का हर एक ज़र्रा अपने होने की दलील पेश करता है कि उसका अपना एक वजूद है लेकिन वक़्त के होने कि क्या दलील है। ये बदलती हुई चीज़ें वक़्त के होने का एहसास तो कराती हैं पर इसको साबित नहीं करतीं।
अगर वक़्त है तो कहाँ है, कैसा दीखता है, कैसे चलता है, कब गुज़रता है, कहाँ से गुज़रता है, क्या कभी किसी ने देखा है।
अगर ज़मीन अपना चक्कर पूरा करने मैं ज़रा भी देरी कर दे तो वक़्त के ये पैमाने गलत साबित होंगे, अगर सूरज ही ना निकले तो ये रात-दिन कोई चीज़ ही नहीं। सूरज की रौशनी बताती है के वक़्त भी कुछ है तो कभी ज़मीन के चक्कर की देरी घड़ी को बदल देते हैं। हम वक़्त को समझ नहीं रहे बस घड़ी के इशारे पर नाच रहे हैं।
कभी इंसान की रफ़्तार तय करती है के वक़्त की रफ़्तार क्या होगी तो कभी जगह बताती है के वक़्त को कैसे चलना है। कुछ जगहें ऐसी हैं जहाँ वक़्त बहुत आहिस्ता चलता है तो कुछ ऐसी हैं जहाँ यह तेज़ी से गुज़र जाता है, और कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहाँ वक़्त का कुछ वजूद ही नहीं।
लोग कहते हैं के यहाँ वक़्त का सब इन्तेज़ार करते है लेकिन वक़्त किसी का इंतज़ार नहीं करता, ये तो चलता ही जाता है, ना जाने क्यों ऐसा लगता है के ये दिन, महीने और साल सब एक क़तार में खड़े हैं और हमारे गुजरने का इन्तेज़ार कर रहे हैं, हम गुज़रते हैं एक घड़ी देखकर और सोचते हैं के ये वक़्त चल रहा है।
कहते हैं के वक़्त लोट के नहीं आता, ये गया ही कब था, ये तो उस क़तार में ही खड़ा था, हम ही गुज़र गए और हमने मुड़ कर ही नहीं देखा।
कोई कहता है के वक़्त बदल जाता है, ऐसा लगता है के इंसान ही बदल जाता है।
ये क़ायनात दिन-व-दिन फैलती जा रही है और एक इंसान है जो हर दिन सिकुड़ता जा रहा है, कहीं सरहदों की बंदिशों में तो कहीं ज़बान के दायरों में और इंसानियत का दायरा छोटे से और छोटा होता जा रहा है।

कभी किसी ने चाँद में इस ज़मीन का साया देख कर कहा था के ये ज़मीन एक गोला है और आज वो कहते हैं के यह क़ायनात इस तरह के गोलों से भरी पड़ी है, और ये सब गोले आग के एक छोटे से गोले से ही बने हैं।
ये सीधा चलने वाला वक़्त कभी कभी एक मायाजाल की तरह लगता है जिसे आज तक कोई समझ ही ना पाया, जो भी इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश करता है वो इसमें उलझता ही चला जाता है।
कभी ऐसा लगता है के वक़्त कि रेखा सीधी ना-होके गोल है, जिसमे हम घूम रहे हैं, जहाँ से चले थे फिर वहीं आ गए हैं,जिनसे बिछड़े थे फिर से मिल गए हैं।
हमने ज़िन्दगी नापने के पैमाने बना रखे हैं, दिन-महीने-साल, कोई सौ-साल कि उम्र में भी कहता है के ज़िन्दगी जी नहीं तो कोई एक लम्हे में ही ज़िन्दगी जी लेता है।
किस ने कहा था के ट्रैन का पीछा मत करो ट्रैन फिर आएगी, यह ट्रैन तो फिर आ-जाएगी लेकिन जिस वक़्त और जिस तारीख कि ट्रैन निकल गयी वो फिर कभी नहीं आएगी, इसिलए अगर कोई ट्रैन पकड़नी है तो उसे मिस मत करो। ट्रैन क्या निकलती है बस वह वक़्त निकल जाता है जो कभी लौटकर नहीं आता।
वक़्त किसी का गुलाम नहीं और वक़्त के सब गुलाम हैं, किसी को वक़्त से शिकायत है तो किसी को वक़्त कि कुछ परवाह ही नहीं, किसी के पास वक़्त ही वक़्त है तो किसी के पास बिल्कुल वक़्त नहीं, कोई वक़्त के गुज़रने का इन्तेज़ार कर रहा है तो कोई वक़्त को रोकना चाहता है, किसी का वक़्त गुज़र चूका है तो किसी का वक़्त शुरू हो रहा है, कोई गुज़रे हुए वक़्त कि यादों में खोया हुआ है तो कोई आने वाले वक़्त कि फ़िक्र में है।
मैं ठहरा हुआ हूँ और वक़्त चल रहा है, यह मुझसे आगे निकल गया था, मैंने एक छोटी सी दौड़ लगाई और इसको पकड़ लिया।

एक पेड़ कि डाल पे बैठे दो परिंदे बात करते हैं के अपना जंगल बस्ती बन चूका है, सब परिंदों की तरह हमे भी ये ठिकाना छोड़ना पड़ेगा। देखते ही देखते ये मैदान इमारतों में बदल गए हैं, इंसान ने खुद को बसाने के लिए सब कुछ उजाड़ दिया है, इंसान आसमानों में उड़ रहा है और ज़मीन को भूलता जा रहा है, इंसानों कि बस्ती में सब कुछ है बस इंसानियत नज़र नहीं आती। वो परिंदे इस इन्तेज़ार में हैं के इंसान कि शक्ल में कोई दरिंदा आएगा और इस आखरी पेड़ को भी काट देगा, फिर हम किसी नए बसेरे कि तलाश में निकलेंगे। वो सोचते हैं के इस बार किसी ऐसी जगह चलते हैं जहाँ वक़्त चारासाज़ हो, जहाँ के मौसम पे क़ुदरत मेहरबान हो, एक वीराना सा हो, जो इंसानों से बहुत दूर हो, जहाँ कोई इंसान ना आए, गर कोई आए भी तो इंसानियत के साथ आए, खुद भी बसे और साथ में हमे भी बसने दे। ये परिंदे पता नहीं कहाँ जायेंगे, शायद इस जगह से बहुत दूर होने के लिए किसी नए मुल्क ही चले जाएँ, यह भी अच्छा है के परिंदो की कोई सरहद नहीं होती, इनकी बोली का कोई नाम नहीं होता, जहाँ भी जाते हैं उसी जगह का गीत गाते हैं, वहीं कि बोली बोलते हैं।

वो भी क्या दिन थे जब वक़्त कि रफ़्तार बहुत धीमी हुआ करती थी, वक़्त काटने के लिए क्या-क्या जतन करने पड़ते थे, एक दिन दिन-सा लगता था और अब ये आलम है के वक़्त ऐसे गुज़र जाता है जैसे आया ही ना हो, एक महीना दिन कि तरह और एक साल महीने कि तरह गुज़र जाता है, हम सोचते ही रहते हैं और ना जाने ज़िन्दगी वक़्त कि कोन सी क़तार में पहुँच जाती है। वक़्त की ये घड़ियाँ अब बदलनी पड़ेंगी, वक़्त की रफ़्तार कुछ बदल सी गयी है।
शायद कभी कोई वक़्त की गुत्थी को सुलझाए और बताए के ये वक़्त कि क़तारें किसने खड़ी कीं, कैसे कोई इन क़तारों में आगे पीछे आए-जाए, और हम भी किसी क़तार के किसी एक दिन में छुप-कर बैठ जाएँ और फिर ना हम गुज़रें और ना यह वक़्त गुज़रे।

Ishrat Alig

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