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तस्वीर और अल्फ़ाज़:

जब भी किसी तस्वीर को देखता हूँ तो ज़ेहन में कुछ अल्फ़ाज़ आ जाते हैं, ऐसा महसूस होता है जैसे तस्वीर ने ही कुछ कहा हो, जैसे तस्वीर बात कर रही हो। फिर ये ख्याल आता है कोई और इसको देखेगा तो कुछ और ही सोचेगा। अगर ये तस्वीर बोलती है तो कुछ और ही सुनेगा। कुछ लोग ये दावा करते हैं के वो तस्वीर को पढ़ना जानते हैं, तो हर पड़ने वाला कुछ अलग ही पड़ेगा।
कहते हैं के लिखे हुए अल्फ़ाज़ को तो सब पड़ लेते हैं लेकिन तस्वीर पे तो कुछ भी नहीं लिखा फिर लोग इसे कैसे पड़ते हैं। फिर इस बात का ख्याल आता है के लिखे हुए को पड़ तो सब लेते हैं पर ज़रूरी नहीं सब समझ भी लेते हों। तस्वीर को देखते तो सभी हैं पर ज़रूरी नहीं सब इसे पड़ भी लेते हों।
हर तस्वीर बनाने वाला यही सोचता होगा के उसकी तस्वीर यादगार बन जाए और इससे भी ज़्यादा ये सोचता होगा के कोई इसको समझे और बताये यह तस्वीर क्या कहती है, क्या दास्तान बयां करती है।
तस्वीर पे ना कुछ लिखा होता है न इसकी कोई ज़ुबाँ होती है फिर भी हर पड़ने वाला इसको पड़ लेता है।
यहाँ कोई चेहरे को तस्वीर की शक्ल देना चाहता है तो कोई तस्वीर को लफ़्ज़ों में उतारना चाहता है, कोई नयी तस्वीर बनाना चाहता है तो कोई खुद तस्वीर बन जाना चाहता है। कोई किसी के तस्वीर से निकल आने की दुआ करता है तो कोई किसी तस्वीर के साथ समाना चाहता है। किसी का ये दावा है के उसके लफ़्ज़ों को तस्वीर में नहीं ढाला जा सकता तो कोई ये कहता है कि उसकी तस्वीर को कोई बयान नहीं कर सकता। अजीब इत्तेफ़ाक़ है कोई हज़ारों-लाखों लफ्ज़ कहता है और तस्वीर के बारे में नहीं बता पाता और कोई महज़ एक लफ्ज़ में ही तस्वीर को बयां कर देता है। कभी तस्वीर चेहरों से मुख्तलिफ नज़र आती है तो कभी चेहरे तस्वीर से जुदा हो जाते हैं। चेहरे बदलते रहते हैं, कभी हँसते हैं कभी रोते हैं और तस्वीर हमेशा मुस्कुराती रहती है। चेहरे खामोश हो जाते हैं और तस्वीर बोलती रहती है। चेहरों को लोग भूल जाते हैं और तस्वीर पहचान ली जाती है। कभी कुछ अल्फ़ाज़ गुम हो जाते हैं तो कभी कोई तस्वीर खो जाती है।

इन पुराने अल्फ़ाज़ों से ना जाने हर रोज़ कितनी नयी बातें कही जाती हैं, ना-जाने कितने नए अफ़साने लिखे जाते हैं और ये महदूद से अल्फ़ाज़ ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेते। कोई इनको पड़कर मुस्कुराता है तो कोई शरमाता है, कोई झूमता है तो कोई इनमें खो जाता है। कुछ अल्फ़ाज़ ऐसे हैं जो हर वक़्त ज़बाँ पे रहते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो ज़ुबाँ पे आते ही नहीं और आ भी जाएँ तो अदा ही नहीं होते। कुछ अल्फ़ाज़ दिल खुश कर देते हैं तो कुछ दिल में तीर की तरह उतर जाते हैं। कुछ में फूलों की सी खुशबु आती है तो कुछ मुरझाए हुए नज़र आते हैं। कुछ अल्फ़ाज़ किताबों में लिख दिए जाते हैं तो कुछ दीवारों पे सजाने के लिए हैं। ये अल्फ़ाज़ कभी किसी की तारीफ करते हैं तो कभी किसी की शिकायत बन जाते हैं। यहाँ कोई अल्फ़ाज़ लिखने का माहिर है तो कोई बोलने का हुनर रखता है। कुछ अल्फ़ाज़ दिल से लगा लिए जाते हैं तो कुछ मिटा दिए जाते हैं। कुछ अल्फ़ाज़ दिलों को तोड़ते हैं तो कुछ जोड़ देते हैं। कुछ ख़ामोशी कर देते हैं तो कुछ हंगामा बरपा कर देते हैं। कुछ अल्फ़ाज़ किसी मसअले का हल हैं तो कुछ खुद एक मसअला हैं। ये कभी किसी सवाल का जवाब हैं तो कभी खुद एक सवाल। कुछ अल्फ़ाज़ दिल को बहलाने के लिए हैं तो कुछ तड़पाने के लिएं। कभी अल्फ़ाज़ इक नगमा बन जाते हैं तो कभी कोई नारा बन जाते हैं। कभी ये एक साज़ हैं,कभी सुर तो कभी कोई राग। अगर कोई लिखने वाला इनको लिखने की तरतीब जानता हो तो फिर ये एक गीत भी हैं, और गाने वाले के लहजे में गर रवानी हो तो फिर संगीत भी हैं।
वैसे तो रस्मी तोर पर गुफ़्तुगू के लिए अल्फ़ाज़ की ज़रुरत पेश आती है लेकिन वो भी क्या खूब गुफ़्तुगू है जिसमें अल्फ़ाज़ बोले भी न जाएं और सुनाई भी दें, और जब बोले जाएँ तो एक तस्वीर बन जाएं, अल्फ़ाज़ गूंजने लगें और संगीत बन जाएं। एक उन्वान में लिखे जाएं तो एक नज़्म हैं और उन्वान से भटक जाएँ तो ग़ज़ल हैं।

ये मुस्कुराती हुई तस्वीर पिछली कई सदियों से लोगों के दिलों दिमाग पे छाई हुई है, हर दौर की ज़बाँ जानती है, हर एक से बात करती है और हर एक को नया पैगाम देती है। सब इसके बनाने वाले के ही बारे में बात करते हैं, कुछ ऐसे भी हैं जो उसके बारे में सोचते हैं जिसको बनाया गया है। हर एक बनाने वाले की तारीफ कर रहा है, क्या बनाया जाने वाला ज़रा सी तारीफ का भी हक़दार नहीं। क्या शख्स रहा होगा वो भी जिसने बनाने वाले को मजबूर किया और वो सालों इसमें खोया रहा और इस तस्वीर को अमर कर दिया, मानो इसमें जान ही डाल दी हो और ये तस्वीर बोलने लगी, इसकी गूंज दुनिया के हर कोने में सुनाई देने लगी। सभी इसकी मुस्कराहट पे फ़िदा हैं तो कोई ये तालाश करता है कहीं ये मुस्कुराती हुई तस्वीर कभी रोती तो नहीं है। कहीं इसको अपनी खरीद-फरोख्त का अफ़सोस तो नहीं। कहीं इसे कोई ऐसा न खरीद ले जो इससे बात ही न कर पाए, कहीं ये बोलती हुई तस्वीर खामोश ना हो जाए, कहीं फिर से ये बेजान ना बन जाए, कहीं ये फिर बेज़बान ना हो जाए।

कभी-कभी ऐसा लगता है के तस्वीर और अल्फ़ाज़ एक ही हैं। अगर लफ़्ज़ों को पड़ा न जाये बल्के उनको सिर्फ देखा जाये और पहचाना जाये तो फिर वो तस्वीर ही हैं। अगर तस्वीर को पड़ा जाए तो फिर वो अल्फ़ाज़ हैं।
कभी अल्फ़ाज़ किसी को पुकारते हैं तो कभी कोई तस्वीर सदा देती है।
ना जाने कितनी तस्वीरें और बनायी जाएँगी, ना जाने कितने अल्फ़ाज़ और लिखे जाएंगे। वो तस्वीर ही क्या जो बोलती न हो, वो अल्फ़ाज़ ही क्या जो गूंजते न हों।

Ishrat Alig

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