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एहसास:

अगर भूक एक एहसास है तो ये खाने से क्यों मर जाती है क्यों ना महज़ खाने के तसव्वुर से ही पेट भर जाता है, क्यों ना सिर्फ पानी को देखकर ही प्यास की शिद्दत ख़त्म हो जाती है। अगर दर्द सिर्फ एक एहसास का नाम है तो लोग इसकी दवा क्यों करते हैं, अगर मोहब्बत एक एहसास है तो दिवानों को मिलन की ख्याहिश क्यों है, क्यों किसी ने किसी की यादों का नाम बेवफ़ा रखा है। ये एहसास कभी दिल की तड़प है तो कभी दिल का सुकून, ये कभी कोई हंसी ख्वाब है तो कभी दर्दनाक हक़ीक़त, ये किसी की ख़ुशी है तो किसी का ग़ म, ये किसी के लिए अकेलापन है तो किसी के लिए भीड़, किसी के लिए मिलन है तो किसी के लिए जुदाई। किसी को अपने छोटे होने का एहसास है तो कोई ये एहसास करता है के वो बड़ा बन सकता है। कोई किसी की बात का एहसास करता है तो कोई बेबात पे ही एहसास कर रहा है, किसी को अपने होने का एहसास है तो किसी को यह एहसास के शायद वह है ही नहीं, किसी को कुछ पाने का एहसास है तो किसी को कुछ खो जाने का एहसास। कोई किसी को ये एहसास दिलाता है के वो उसको कितना चाहता है तो किसी को ये एहसास ही नहीं के चाहत भी कोई चीज़ है। कोई बस्तियां जलाकर खुश है तो कोई इनक...
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तब्दीली

यहाँ हर कोई तब्दीली की बात करता है लेकिन यह तब्दीली होगी क्या, क्यों होगी और कैसे होगी यह बात क्यों नहीं होती। कोई कहता है के हर चीज़ नयी होनी चाहिए तो कोई कहता है के पुरानी चीज़ें फिर से वापस आनी चाहिएं, किसी का यह ख्याल है के कुछ बदलना ही नहीं चाहिए तो कोई कहता है के सब कुछ बदल जाना चाहिए। किसी को चीज़ों के बदलने का इंतेज़ार है तो कोई उन चीज़ों का इंतेज़ार कर रहा है जो बदल चुकी हैं, कोई इन बदलावों से परेशान है तो कोई इनसे बहुत खुश है। तब्दीली कभी नए क़ानून हैं तो कभी नयी  रस्में, कभी नए रासते तो कभी नयी मंज़िलें, कभी नयी उम्मीदें तो कभी नए ख्वाब। कोई कहता है के तबदीली आ तो गयी है लेकिन दिखाई नहीं देती, इसको दिखाई देने में थोड़ा वक़्त लगेगा, कहीं ऐसा ना हो के यह तब्दीली दिखाई देने से पहले ही ख़त्म हो जाए और जिस तब्दीली का हमें ख्वाब दिखाया गया था वो इक झूठा ख्वाब बनकर रह जाए। क्या वो सारे वादे झूठे थे, क्या ख्वाब दिखाने वाला जानता था के ये दिन नहीं बदलेंगे, क्या वह जानता था के वह खुद ही बदल जाएगा, क्या उसकी इन बदली हुई बातों से फिर से कोई तब्दीली आएगी या लोग फिर किसी नए धोके से दो-चार ह...

गुफ़्तगू:

~ क्या लफ्ज़ो की बारिश का नाम ही गुफ़्तगू है या फिर बरसते हुए लफ्ज़ो को पकड़ना गुफ़्तगू है। वैसे तो अक्सर गुफ़्तगू में आवाज़ का होना लाज़िम समझा जाता है लेकिन कभी-कभी कोई आवाज़ किसी गिफ्तगु को खराब भी कर देती है, कभी आवाज़ के ना होने पर कोई गुफ़्तगू समझ में नहीं आती तो कभी कोई आवाज़ किसी गुफ़्तगू में खलल पैदा कर देती है। वैसे तो बोल-चाल का नाम ही गुफ़्तगू है लेकिन कभी यह बोल-चाल ही किसी खामोश गुफ़्तगू को तोड़ देती है। यह गुफ़्तगू किसी के लिए कोई पैग़ाम है तो किसी के लिए इनाम। कभी कोई गुफ़्तगू किसी का दिल बहलाती है तो कभी किसी की दिलाज़ारी करती है, कहीं दिलों को जोड़ती है तो कहीं दिलों को तोड़ देती है, यह कभी मोहब्बत है तो कभी नफ़रत है। अगर कोई पूछे के गुफ़्तगू क्या है तो कहूं-चेहरे की मुस्कुराहट गुफ़्तगू है, हाथ का इशारा गुफ़्तगू है, नज़र का शर्माना गुफ़्तगू है, कभी आँख के आंसू गुफ़्तगू हैं तो कभी खामोश रहना गुफ़्तगू है, कभी किसी के नज़दीक बैठना गुफ़्तगू है तो कभी किसी से दूर हो जाना गुफ़्तगू है, कभी ख़त लिखना गुफ़्तगू तो कभी ख़त पड़ना गुफ़्तगू, कभी किसी से बात करना गुफ़्तगू है तो कभी कोई बात ना करना ही गुफ़्तगू है, कभी क...

मैं कौन हूँ:

यह सवाल कितना आसान होता है जब कोई अजनबी यह पूछे के मैं कौन हूँ लेकिन जब कोई अपना यह कहता है के तुम हो कौन तो थोड़ी तकलीफ होती है लेकिन जब यही सवाल मैं खुद अपने आप से पूछता हूँ के मैं कौन हूँ तो यह आसान सा सवाल मुझे परेशान कर देता है। किसी अजनबी को बताने के लिए कितना कुछ था मेरे पास के मैं कौन हूँ और क्या हूँ और किसी अपने से भी कुछ कह ही सका था के मैं उसका कौन हूँ या वो मेरा कौन है लेकिन जब यही सवाल मैंने अपने आप से पूछा तो मैं कुछ कह ही नहीं पाया जैसे मैं कुछ हूँ  ही नहीं, जैसे जो दुनिया को बताता आया था वो सब एक धोका था एक झूट था। आज यूँ लगा जैसे मेरा कुछ वजूद ही नहीं, या तो मैं कुछ हूँ ही नहीं या मैं अपने बारे मैं कुछ जानता ही नहीं। यह अब तक मैंने क्या किया, दुनिया के बारे मैं जानने की कोशिश करता रहा लेकिन कभी खुद को जानना ही नहीं चाहा, बस वही सबको बताता रहा जो दूसरे मुझे मेरे बारे में बताते रहे, जैसे मैं कोई लिखी हुई किताब था और जो मुझको याद करा दी गयी हो फिर सबको वही पढ़कर सुनाता रहा। कभी अपने-आप से कहता हूँ के मैं कुछ भी नहीं तो कभी यह ग़ुमान होता है के मैं ही सब कुछ हूँ, क...

इरादा:

एक तरफ तो कुछ करने का इरादा और दूसरी तरफ यह उलझन के करें तो करें क्या? एक तरफ तो अपनी यह ख़ामोशी और दूसरी तरफ दुनिया का यह शोर। कुछ करने का इरादा भी है और अभी यह इरादा भी बनाना है के करना क्या है? कुछ लिखने का इरादा भी है कोई उन्वान भी नहीं, इस दिल को सुहाने मौसम की तलाश है और यह क़लम किसी उन्वान की तलाश कर रहा है। पहले यह सोचा के यह इरादा ही तर्क कर दिया जाए लेकिन फिर यह ख्याल आया के क्यों ना आज बेइरादा ही कुछ लिखा जाए, क्यों ना अपने मज़मून का उन्वान ही बदल दिया जाए। इरादा ही तो है अगर पूरा ना भी हुआ तो कोई वादा-खिलाफी तो होगी नहीं। कभी इरादा कुछ करने का होता है तो कभी कुछ ना करने का, कभी यह दिल बहुत कुछ करना चाहता है तो कभी यह तबियत कुछ भी नहीं करना चाहती, कोई अपना इरादा बदल लेता है तो कोई अपना इरादा ही छोड़ देता है, कोई किसी के इरादों को देखकर अपने इरादे बदल लेता है तो कोई किसी को देखकर अपने इरादे को वादे में बदल देता है, किसी के इरादे बहुत मज़बूत हैं तो किसी के बहुत कमज़ोर, कोई किसी के नापाक इरादों से नाराज़ है तो किसी के इरादों को नेक कहता है, कभी किसी की नज़र किसी के इरादों ...

फ़लसफ़ा:

अगर चीज़ों को समझने का नाम ही फ़लसफ़ा है तो दुनिया का हर वह इन्सान जो चीज़ों को समझने की थोड़ी बहुत समझ रखता है फ़लसफ़ी होगा, अगर ऐसा नहीं तो फिर फ़लसफ़ा क्या है? हर किसी की अपनी एक फिलोसॉफी होती है-ज़िन्दगी जीने की,चीज़ों को देखने की, सोचने समझने की लेकिन क्या इतने भर से कोई फिलॉस्फर बन जाता है? या फिर फिलॉस्फर बनने के लिए बहुत सी नॉलेज और ढेर सारी डिग्रियां होनी चाहियें जैसे मास्टर, पीएचडी बगैरह-बगैरह। लेकिन देश के जाने माने इतिहाकार शशि थरूर, जिनकी नॉलेज पर किसी को कोई शक नही ं और न डिग्रीयों में कोई कमी है, वह खुद एक किताब में लिखते हैं के वह फिलॉस्फर नहीं बस घटनाओं को सिलसिलेवार तरीक़े से लिखते हैं। तो क्या फिलॉस्फर कोई ऐसा शख्स हो सकता है जो पड़ा लिखा ना हो, जिसने कोई किताब लिखना तो दूर एक किताब पड़ी भी ना हो? यक़ीनन ऐसा हो सकता है, और ना होने को कोई चाहे फिलोसॉफी में कितनी भी डिग्री क्यों ना ले ले अगर वह फिलॉस्फर नहीं तो नहीं। ये फ़लसफ़ी अजीब से लोग होते हैं अक्सर लोग इनको बात करते हुए बेवक़ूफ़ समझ लेते हैं लेकिन कुछ देर बात करने के बाद सोचते हैं के यह बेवक़ूफ़ बना रहा है , बहुत पेचीदा सी बात...

तलब:

अगर किसी को कुछ खाने की तलब हुई है तो ज़रूरी नहीं के उसे भूख लगी है, हो सकता है के खाना तो उसने वक़्त पे खा लिया हो लेकिन बस बेवक़्त कुछ खाने को दिल चा-रहा हो। भूख लगे और कुछ न मिले तो इंसान बर्दाश्त कर सकता है लेकिन अगर खाने की तलब हो तब कुछ ना मिले तो बर्दाश्त करना मुश्किल होता है। वैसे तो अक्सर कुछ खाने की ही तलब होती है लेकिन कभी-कभी खाने को तो बहुत कुछ होता है लेकिन भूख नहीं होती तो ऐसे में भूख की तलब होती है। कभी कोई किसी को तलब कर लेता है तो कभी खुद तलब हो जाता, कभ ी हमें तलब तो कभी हम-तलब तो कभी गौर-तलब। क्या तलब का कोई पैमाना है, अगर तलब सिर्फ एहसास है तो क्या लफ्ज़ एहसास को बयान कर सकते हैं या फिर लफ्ज़ एहसास पैदा करते हैं। अब तो यह पीने वाला ही बता सकता है के वह जाम देखता है या पैमाना देखता है या साक़ी को देखता है या फिर मैयखाना देखकर पीता है या फिर बस पीने की तलब होने पे सब कुछ भूल जाता है। Ishrat Alig