एक तरफ तो कुछ करने का इरादा और दूसरी तरफ यह उलझन के करें तो करें क्या? एक तरफ तो अपनी यह ख़ामोशी और दूसरी तरफ दुनिया का यह शोर। कुछ करने का इरादा भी है और अभी यह इरादा भी बनाना है के करना क्या है? कुछ लिखने का इरादा भी है कोई उन्वान भी नहीं, इस दिल को सुहाने मौसम की तलाश है और यह क़लम किसी उन्वान की तलाश कर रहा है। पहले यह सोचा के यह इरादा ही तर्क कर दिया जाए लेकिन फिर यह ख्याल आया के क्यों ना आज बेइरादा ही कुछ लिखा जाए, क्यों ना अपने मज़मून का उन्वान ही बदल दिया जाए। इरादा ही तो है अगर पूरा ना भी हुआ तो कोई वादा-खिलाफी तो होगी नहीं।
कभी इरादा कुछ करने का होता है तो कभी कुछ ना करने का, कभी यह दिल बहुत कुछ करना चाहता है तो कभी यह तबियत कुछ भी नहीं करना चाहती, कोई अपना इरादा बदल लेता है तो कोई अपना इरादा ही छोड़ देता है, कोई किसी के इरादों को देखकर अपने इरादे बदल लेता है तो कोई किसी को देखकर अपने इरादे को वादे में बदल देता है, किसी के इरादे बहुत मज़बूत हैं तो किसी के बहुत कमज़ोर, कोई किसी के नापाक इरादों से नाराज़ है तो किसी के इरादों को नेक कहता है, कभी किसी की नज़र किसी के इरादों को ज़ाहिर कर देती है तो कभी किसी की पेशक़दमी उसके इरादे को बयान कर देती है, कोई अपने किसी अज़ीज़ के इरादों का पूरा होने की तमन्ना करता है तो कोई अपने हरीफ़ के इरादों पर पानी फेरना चाहता है।
अक्सर इरादा बनता है और टूट जाता है, क्यों ना अपने इरादों को कोशिशों की हवा दी जाए क्या जाने कब कोन सा नेक इरादा पूरा हो जाए।
Ishrat Alig
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