क्या अकेलेपन का नाम तन्हाई है या फिर अकेलेपन का एहसास तन्हाई है। अगर अकेलेपन का एहसास ही तन्हाई है तो फिर जिसे अकेले में भी अकेलापन ना लगे तो वो तन्हा नहीं या जो भीड़ में भी अकेला महसूस करे वो तन्हा है।
यह तन्हाई जहाँ अकेला कर देती है तो वहीं खुद के साथ वक़्त गुज़ारने का मौका भी देती है, यह तन्हाई कभी दिल का सुकून बन जाती है तो कभी दिल की तड़प।
हर एक की तन्हाई की अपनी अलग वजह है, कोई तन्हाई में बैठकर अफ़साने लिखता है तो कोई उनको तन्हाई में पड़ता, कोई तन्हाइयों में किसी के मिलन का इंतेज़ार करता है तो कोई किसी मिलन के बाद बिछड़ कर तन्हा हो गया है, किसी की तन्हाई की वजह कोई हादसा है तो किसी की वजह कोई धोखा। यह तन्हाई किसी की आदत है तो किसी की मज़बूरी,किसी का शोक है तो किसी की बेबसी, किसी के लिए यह महज़ एक पहेली है तो किसी के लिए दर्दनाक हक़ीक़त, यह किसी के लिए यादों का एक सुहाना सफर है तो किसी के लिए एक लम्बे सफर के बाद की मंज़िल, कोई मोहब्बत की वजह से तन्हा है तो कोई इबादत में तन्हा है, यह किसी के लिए क़ैद है तो किसी के लिए आज़ादी, किसी के लिए इम्तिहान है तो किसी के लिए कामयाबी, यह किसी का सुकून है तो किसी की उदासी, तन्हाई किसी के लिए अकेलापन है तो किसी के लिए यादों की सुनहरी महफ़िल।
यह तन्हाई जहाँ अकेला कर देती है तो वहीं खुद के साथ वक़्त गुज़ारने का मौका भी देती है, यह तन्हाई कभी दिल का सुकून बन जाती है तो कभी दिल की तड़प।
हर एक की तन्हाई की अपनी अलग वजह है, कोई तन्हाई में बैठकर अफ़साने लिखता है तो कोई उनको तन्हाई में पड़ता, कोई तन्हाइयों में किसी के मिलन का इंतेज़ार करता है तो कोई किसी मिलन के बाद बिछड़ कर तन्हा हो गया है, किसी की तन्हाई की वजह कोई हादसा है तो किसी की वजह कोई धोखा। यह तन्हाई किसी की आदत है तो किसी की मज़बूरी,किसी का शोक है तो किसी की बेबसी, किसी के लिए यह महज़ एक पहेली है तो किसी के लिए दर्दनाक हक़ीक़त, यह किसी के लिए यादों का एक सुहाना सफर है तो किसी के लिए एक लम्बे सफर के बाद की मंज़िल, कोई मोहब्बत की वजह से तन्हा है तो कोई इबादत में तन्हा है, यह किसी के लिए क़ैद है तो किसी के लिए आज़ादी, किसी के लिए इम्तिहान है तो किसी के लिए कामयाबी, यह किसी का सुकून है तो किसी की उदासी, तन्हाई किसी के लिए अकेलापन है तो किसी के लिए यादों की सुनहरी महफ़िल।
कहते हैं के दुनिया में क़ुदरत ने हर चीज़ का जोड़ा बनाया है तो फिर कोई तन्हा कैसे रह सकता है, इस क़ायनात का तो हर ज़र्रा एक दूसरे से बात करता है, क्या कोई कह सकता है के यह मुस्कुराता हुआ चाँद तन्हा है, क्या कोई यह साबित कर सकता है के यह सूरज तन्हाई की आग में जल रहा है, क्या यह ज़मीन अकेले यूँ ही घूम रही है, क्या ये आसमान जिसमे अनगिनत शय मौजूद हैं तन्हा है। यह चलती हुई हवा किस्से बातें करती है, यह समंदर की मौजें किसके लिए बेताब हैं, सेहरा के वीराने को किसका इंतेज़ार है।
तो क्या हर एक की तन्हाई उसके लिए किसी मिलन का इंतेज़ार है, लेकिन फिर भी लोग यहाँ अक्सर मिलन के बाद बिछड़ क्यों जाते हैं, तो क्या यह मिलन सिर्फ आरज़ी है, तो क्या यह महज़ जिस्मों का ही मिलन है रूहों का नहीं, तो क्या रूह को उस दिन का इंतेज़ार है जब यह जिस्म मिट्टी में मिल जाएगा और फिर रूह रूह-से मिलेगी और वह ऐसा मिलन होगा जसिके बाद ना कोई जुदाई होगी ना तन्हाई।
Ishrat Alig
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