Skip to main content

तन्हाई:

क्या अकेलेपन का नाम तन्हाई है या फिर अकेलेपन का एहसास तन्हाई है। अगर अकेलेपन का एहसास ही तन्हाई है तो फिर जिसे अकेले में भी अकेलापन ना लगे तो वो तन्हा नहीं या जो भीड़ में भी अकेला महसूस करे वो तन्हा है।
यह तन्हाई जहाँ अकेला कर देती है तो वहीं खुद के साथ वक़्त गुज़ारने का मौका भी देती है, यह तन्हाई कभी दिल का सुकून बन जाती है तो कभी दिल की तड़प।
हर एक की तन्हाई की अपनी अलग वजह है, कोई तन्हाई में बैठकर अफ़साने लिखता है तो कोई उनको तन्हाई में पड़ता, कोई तन्हाइयों में किसी के मिलन का इंतेज़ार करता है तो कोई किसी मिलन के बाद बिछड़ कर तन्हा हो गया है, किसी की तन्हाई की वजह कोई हादसा है तो किसी की वजह कोई धोखा। यह तन्हाई किसी की आदत है तो किसी की मज़बूरी,किसी का शोक है तो किसी की बेबसी, किसी के लिए यह महज़ एक पहेली है तो किसी के लिए दर्दनाक हक़ीक़त, यह किसी के लिए यादों का एक सुहाना सफर है तो किसी के लिए एक लम्बे सफर के बाद की मंज़िल, कोई मोहब्बत की वजह से तन्हा है तो कोई इबादत में तन्हा है, यह किसी के लिए क़ैद है तो किसी के लिए आज़ादी, किसी के लिए इम्तिहान है तो किसी के लिए कामयाबी, यह किसी का सुकून है तो किसी की उदासी, तन्हाई किसी के लिए अकेलापन है तो किसी के लिए यादों की सुनहरी महफ़िल।

कहते हैं के दुनिया में क़ुदरत ने हर चीज़ का जोड़ा बनाया है तो फिर कोई तन्हा कैसे रह सकता है, इस क़ायनात का तो हर ज़र्रा एक दूसरे से बात करता है, क्या कोई कह सकता है के यह मुस्कुराता हुआ चाँद तन्हा है, क्या कोई यह साबित कर सकता है के यह सूरज तन्हाई की आग में जल रहा है, क्या यह ज़मीन अकेले यूँ ही घूम रही है, क्या ये आसमान जिसमे अनगिनत शय मौजूद हैं तन्हा है। यह चलती हुई हवा किस्से बातें करती है, यह समंदर की मौजें किसके लिए बेताब हैं, सेहरा के वीराने को किसका इंतेज़ार है।

तो क्या हर एक की तन्हाई उसके लिए किसी मिलन का इंतेज़ार है, लेकिन फिर भी लोग यहाँ अक्सर मिलन के बाद बिछड़ क्यों जाते हैं, तो क्या यह मिलन सिर्फ आरज़ी है, तो क्या यह महज़ जिस्मों का ही मिलन है रूहों का नहीं, तो क्या रूह को उस दिन का इंतेज़ार है जब यह जिस्म मिट्टी में मिल जाएगा और फिर रूह रूह-से मिलेगी और वह ऐसा मिलन होगा जसिके बाद ना कोई जुदाई होगी ना तन्हाई।


Ishrat Alig

Comments

Popular posts from this blog

सवाल-जवाब:

 ~  मैं यह सोचता हूँ कि ये सवाल-जवाब क्या हैं? क्या हर सवाल का जवाब मिल सकता है? क्या हर सवाल का जवाब दे देना चाहिए? क्या किसी को हर सवाल पूछ लेना चाहिए? क्या किसी का सवाल दूसरे का जवाब नहीं हो सकता? क्या किसी के जवाब से सवाल पैदा नहीं होते? क्या कभी किसी सवाल का जवाब न देने में ही उसका जवाब छुपा होता है? क्या कोई जवाब सवाल से भी अच्छा हो सकता है? या ये सवाल ही है जो जवाब को अच्छा बना देता है? अगर सवाल इतना अच्छा है तो इसका जवाब ही क्यों दया जाए? क्यूँ न ऐसे सवाल को ला-जवाब रखा जाए? क्या जवाब के मिल जाने से सवाल की एहमियत कम हो जाती है? या फिर जवाब न देने पर सवाल की क़दर ख़त्म हो जाती है? क्या कोई सवाल ऐसा हो सकता है जिसका कोई जवाब ना हो? क्या कोई जवाब ऐसा दे सकता है जिसपे कोई सवाल न हो? क्या हमारी ज़िंदगी सवालों और जवाबों के सिवा कुछ भी नहीं? क्या यह ज़िंदगी खुद एक सवाल है? क्या मौत ही इस ज़िंदगी का जवाब ह? जब ये ज़िन्दगी-मौत ही सवाल-जवाब हैं तो हम इसे लेकर इतने परेशान क्यों हैं? कोई किसी जवाब की तलाश में है तो कोई किसी सवाल से दूर हो जाना चाहता है, किसी के पास सवाल करने का हुन...

क़ानून-ऐ-क़ुदरत:

इस दुनिया के ये कैसे क़ानून हैं, के यहाँ जब एक मर्द धोका खाता है तो वो मिलता है किसी मैख़ाने में, वीराने में, किसी मंदिर या किसी मस्जिद में, या फिर किसी आश्रम में। लेकिन जब एक औरत धोखा खाती है तो वो मिलती है किसी तवायफ के कोठे पे, ज़माने की ठोकरों में, या फिर जीतेजी एक जहन्नुम में। कहते हैं सब कुछ बदल गया, दुनिया बदल गयी, ज़माना बदल गया, इंसान के तौर-तरीके बदल गए, इंसानी साज़-ओ-सामान बदल गया। हाँ बदला तो बहुत कुछ है लेकिन क्या इन्साफ बदल सकता है, क्या क़ातिल मज़लूम बन सकता है, क्या राक्षस को देवता कह सकते हैं, क्या जान लेने वाला जान बचाने वाले से बड़ा बन सकता है। ये इंसान के बनाये हुए कानून हैं, जो बदलते रहते हैं। ऐसा हर कानून ख़त्म हो जायेगा जो क़ानून-ए-क़ुदरत के खिलाफ बनेगा। और ऐसे कानून को एक दिन खत्म होना ही होगा। इंसानी तारीख ने न जाने कितने ऐसे क़ानून देखे हैं। कभी चिताओं में जलती हुई ज़िंदा औरतें, सरे-बाज़ार बिकते हुए लोग, पैदा होते ही दफ़न होती हुई मासूम बच्चियाँ,सफ़ेद कपड़ों में लिपटी हुईं ज़िंदा देवियां, इंसान की कमर से बंधी हुई झाड़ूएं, एक ख़ास तबके के लिए इबादतगाह के बंद दरवाजे। ये सब यह...

तस्वीर और अल्फ़ाज़:

जब भी किसी तस्वीर को देखता हूँ तो ज़ेहन में कुछ अल्फ़ाज़ आ जाते हैं, ऐसा महसूस होता है जैसे तस्वीर ने ही कुछ कहा हो, जैसे तस्वीर बात कर रही हो। फिर ये ख्याल आता है कोई और इसको देखेगा तो कुछ और ही सोचेगा। अगर ये तस्वीर बोलती है तो कुछ और ही सुनेगा। कुछ लोग ये दावा करते हैं के वो तस्वीर को पढ़ना जानते हैं, तो हर पड़ने वाला कुछ अलग ही पड़ेगा। कहते हैं के लिखे हुए अल्फ़ाज़ को तो सब पड़ लेते हैं लेकिन तस्वीर पे तो कुछ भी नहीं लिखा फिर लोग इसे कैसे पड़ते हैं। फिर इस बात का ख्याल आता है के लिखे हुए को पड़ तो सब लेते हैं पर ज़रूरी नहीं सब समझ भी लेते हों। तस्वीर को देखते तो सभी हैं पर ज़रूरी नहीं सब इसे पड़ भी लेते हों। हर तस्वीर बनाने वाला यही सोचता होगा के उसकी तस्वीर यादगार बन जाए और इससे भी ज़्यादा ये सोचता होगा के कोई इसको समझे और बताये यह तस्वीर क्या कहती है, क्या दास्तान बयां करती है। तस्वीर पे ना कुछ लिखा होता है न इसकी कोई ज़ुबाँ होती है फिर भी हर पड़ने वाला इसको पड़ लेता है। यहाँ कोई चेहरे को तस्वीर की शक्ल देना चाहता है तो कोई तस्वीर को लफ़्ज़ों में उतारना चाहता है, कोई नयी तस्वीर बनाना चाहता है त...