शाहीन बाग़… जो कल तक महज़ दिल्ली की एक छोटी सी जगह का नाम था, आज यह नाम एक तहरीक बन चूका है, शहर दर शहर शाहीन बाग़ बनते जा रहे हैं। यह तहरीक पूरे देश में जितनी तेज़ी से फ़ैल रही है के वह दिन दूर नहीं जब हर शहर में एक शाहीन बाग़ होगा। तारीकी के इस आलम में यहाँ से जो शमा रोशन हुई है उसने ना सिर्फ पूरे मुल्क बल्कि दुनिया भर को रौशन किया है। इसकी रोशनी से नफरतों के सौदागर घबराने लगे हैं और जल्द ही इसकी रौशनी नफरतो के अंधेरो को मिटा कर रख देगी।
इस मुहिम की मशाल उन पर्दा नशीं औरतों ने थामी है जो कल तक सिर्फ बच्चो की परवरिश करतीं, घरो को सजातीं और हर रोज़ नए ख्वाब बुनती। लोग यह देख कर हैरत में हैं के ये घरेलु औरतें ऐसा काम कैसे कर सकती हैं तो उनको यह समझ लेना चाहिए के एक औरत जब माँ बन सकती है तो वह कुछ भी कर सकती है, क्यूंकि माँ बनने से ज़्यादा तकलीफ-दे कोईऔर काम हो ही नहीं सकता और जो औरत यह काम कर सकती है वो दुनिया का कोई भी काम कर सकती है।
इस मुहिम की मशाल उन पर्दा नशीं औरतों ने थामी है जो कल तक सिर्फ बच्चो की परवरिश करतीं, घरो को सजातीं और हर रोज़ नए ख्वाब बुनती। लोग यह देख कर हैरत में हैं के ये घरेलु औरतें ऐसा काम कैसे कर सकती हैं तो उनको यह समझ लेना चाहिए के एक औरत जब माँ बन सकती है तो वह कुछ भी कर सकती है, क्यूंकि माँ बनने से ज़्यादा तकलीफ-दे कोईऔर काम हो ही नहीं सकता और जो औरत यह काम कर सकती है वो दुनिया का कोई भी काम कर सकती है।
इन घरों की माँ-बहने और दादियों ने जब पानी सर से ऊपर होते देखा तो ये जाड़ो की सर्द रातों में ही अपने घरो के बिस्तरों को छोड़ कर सड़को पे आ गयीं। इनके एक हाथ में तिरंगा परचम है तो दूसरे में नन्ने-नन्ने बच्चे और लबो पे आज़ादी और संविधान के नारे। यहाँ की अज़ीम माँ-बहनो, बहादुर और बेबाक दादियों और पुरजोश नौजवान लड़कियों ने उनको भी बोलने का हौसला दिया है जो कल तक डर के इस माहोल में कुछ कहते हुए भी कई बार सोचते थे के कहीं उनकी कोई बात हकूमत को बुरी ना लग जाए।
शाहीन बाग़ आज़ादी का आंदोलन नहीं बल्कि आज़ादी का जश्न है और यह जश्न यहाँ हर रोज़ होता है, यहाँ बेखौफ लगते हुए आज़ादी के नारे हिन्दुस्तान के लोगो को यह एहसास कराते हैं के हम आज़ाद हैं और यह आज़ादी हमसे कोई नहीं छीन सकता, ना कोई अपना और ना कोई बाहर का।
शाहीन बाग़ कोई बग़ावत नहीं बल्कि संविधान की हिफाज़त की मुहिम है, देश को तोड़ने की नहीं बल्कि देश को जोड़ने की तहरीक है। यहाँ सिर्फ संविधान के नारे ही नहीं लगते बल्कि इसे पड़ा जाता और पढ़ाया भी जाता है और यही वजह है के जब से संविधान वजूद में आया है शायद ही यहाँ के नागरिको ने देश भर में इस तरह से इसकी प्रस्तावना को पड़ा हो और इसको समझा हो।
शाहीन बाग़ आज़ादी का आंदोलन नहीं बल्कि आज़ादी का जश्न है और यह जश्न यहाँ हर रोज़ होता है, यहाँ बेखौफ लगते हुए आज़ादी के नारे हिन्दुस्तान के लोगो को यह एहसास कराते हैं के हम आज़ाद हैं और यह आज़ादी हमसे कोई नहीं छीन सकता, ना कोई अपना और ना कोई बाहर का।
शाहीन बाग़ कोई बग़ावत नहीं बल्कि संविधान की हिफाज़त की मुहिम है, देश को तोड़ने की नहीं बल्कि देश को जोड़ने की तहरीक है। यहाँ सिर्फ संविधान के नारे ही नहीं लगते बल्कि इसे पड़ा जाता और पढ़ाया भी जाता है और यही वजह है के जब से संविधान वजूद में आया है शायद ही यहाँ के नागरिको ने देश भर में इस तरह से इसकी प्रस्तावना को पड़ा हो और इसको समझा हो।
इन औरतों को बिकाऊ कहने वालों को एक बार अपनी माँ से पूछना चाहिए के क्या एक औरत पाँच-सौ रूपए या बिरयानी के लिए अपने दूध पीते बच्चे को लेकर ऐसी सर्दी में फुटपाथ पे रात गुज़ार सकती है। मुझे यक़ीन है कोई भी औरत किसी दूसरी औरत को बिकाऊ कहलवाना पसंद नहीं करेगी चाहे उसका धर्म या जाती कोई भी हो और जब बात एक माँ की हो तो हरगिज़ नहीं। हाँ ये औरतें कभी बिरयानी खाती हैं तो कभी भूखी ही सो जाती हैं, लोगो ने इनको खाते हुए तो देखा लेकिन उन्होंने इनको भूखे सोता हुआ नहीं देखा, इनकी आँखों में बेचैनी किसी को नज़र नहीं आयी।
आप इन्हें कपड़ो से पहचानते हैं जो हर रोज़ बदल दिए जाते हैं-कभी इनके घरो में आकर देखो-इनके दिलो में झाँक कर देखो, धर्म के जिस चश्मे से इन्हें देखते हो कभी उसे उतार कर देखो तो तुम्हे यह एहसास होगा के ये बिलकुल हमारे घरो की औरतों की तरह हैं-बिलकुल हमारी माँ बहनो की तरह हैं।
इनमें से एक औरत कहती है के उसने तुम्हे वोट नहीं दिया, शायद वो तुम्हें वोट दे भी देती लेकिन तुमने माँगा ही नहीं लेकिन उसने उस सिस्टम को वोट किया है जिसने एक चाय वाले को प्रधानमंत्री बनाया है और वह यह चाहती है के यह सिस्टम क़ायम रहे ताके फिर किसी चाय वाले का बच्चा प्रधानमंत्री बन सके।
आप इन्हें कपड़ो से पहचानते हैं जो हर रोज़ बदल दिए जाते हैं-कभी इनके घरो में आकर देखो-इनके दिलो में झाँक कर देखो, धर्म के जिस चश्मे से इन्हें देखते हो कभी उसे उतार कर देखो तो तुम्हे यह एहसास होगा के ये बिलकुल हमारे घरो की औरतों की तरह हैं-बिलकुल हमारी माँ बहनो की तरह हैं।
इनमें से एक औरत कहती है के उसने तुम्हे वोट नहीं दिया, शायद वो तुम्हें वोट दे भी देती लेकिन तुमने माँगा ही नहीं लेकिन उसने उस सिस्टम को वोट किया है जिसने एक चाय वाले को प्रधानमंत्री बनाया है और वह यह चाहती है के यह सिस्टम क़ायम रहे ताके फिर किसी चाय वाले का बच्चा प्रधानमंत्री बन सके।
कल तुमने तो इनकी चौकीदारी की बात की थी लेकिन आज तुम इन्हें इनके घरो से निकलने की बात करते हो, आज वही चौकीदार इनसे इनके घरो के कागज़ मांग रहा है। कल तक जो इनको अपनी माँ-बहन कहता था और आज जब इनको बिकाऊ कहा जाता है तो वही मुल्क के सबसे ताक़तवर ओहदे पे बैठ-कर यह सब ख़ामोशी से सुनता है, एक लफ्ज़ उनके खिलाफ अपने मुँह से नहीं निकालता।
तुम भले से ही इन्हें अपना ना समझो लेकिन ये तुम्हें अपना मानती हैं और चाहतीं हैं के तुम इनसे मिलने आओ, इनसे बात करो और बताओ जो बात दूर-दूर से कहते हो और यक़ीन दिलाओ के ये सब झूट है।
इंसान तुम भी हो और इंसान हम भी हैं, फैसले गलत हो जाते हैं लेकिन यह कहना के एक-इंच भी ना हटेंगे, तुम्हारी इन बातों से चौकीदारी की नहीं बल्कि आमरियत की बू आती है।
आप सबको डराने की कोशिश करते थे और लोग डर भी रहे थे लेकिन इन औरतों ने उस डर को शाहीन बाग़ के नारे के साथ हवा में उड़ा दिया है। इन्होने यह फैसला लिया है के जब तक ये काले क़ानून वापस नहीं लिए जाएंगे ये पीछे नहीं हटेंगी और शाहीन बाग़ का नारा बुलंद करती रहेंगी।
तुम भले से ही इन्हें अपना ना समझो लेकिन ये तुम्हें अपना मानती हैं और चाहतीं हैं के तुम इनसे मिलने आओ, इनसे बात करो और बताओ जो बात दूर-दूर से कहते हो और यक़ीन दिलाओ के ये सब झूट है।
इंसान तुम भी हो और इंसान हम भी हैं, फैसले गलत हो जाते हैं लेकिन यह कहना के एक-इंच भी ना हटेंगे, तुम्हारी इन बातों से चौकीदारी की नहीं बल्कि आमरियत की बू आती है।
आप सबको डराने की कोशिश करते थे और लोग डर भी रहे थे लेकिन इन औरतों ने उस डर को शाहीन बाग़ के नारे के साथ हवा में उड़ा दिया है। इन्होने यह फैसला लिया है के जब तक ये काले क़ानून वापस नहीं लिए जाएंगे ये पीछे नहीं हटेंगी और शाहीन बाग़ का नारा बुलंद करती रहेंगी।
Ishrat Alig
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