यह सवाल कितना आसान होता है जब कोई अजनबी यह पूछे के मैं कौन हूँ लेकिन जब कोई अपना यह कहता है के तुम हो कौन तो थोड़ी तकलीफ होती है लेकिन जब यही सवाल मैं खुद अपने आप से पूछता हूँ के मैं कौन हूँ तो यह आसान सा सवाल मुझे परेशान कर देता है। किसी अजनबी को बताने के लिए कितना कुछ था मेरे पास के मैं कौन हूँ और क्या हूँ और किसी अपने से भी कुछ कह ही सका था के मैं उसका कौन हूँ या वो मेरा कौन है लेकिन जब यही सवाल मैंने अपने आप से पूछा तो मैं कुछ कह ही नहीं पाया जैसे मैं कुछ हूँ ही नहीं, जैसे जो दुनिया को बताता आया था वो सब एक धोका था एक झूट था। आज यूँ लगा जैसे मेरा कुछ वजूद ही नहीं, या तो मैं कुछ हूँ ही नहीं या मैं अपने बारे मैं कुछ जानता ही नहीं। यह अब तक मैंने क्या किया, दुनिया के बारे मैं जानने की कोशिश करता रहा लेकिन कभी खुद को जानना ही नहीं चाहा, बस वही सबको बताता रहा जो दूसरे मुझे मेरे बारे में बताते रहे, जैसे मैं कोई लिखी हुई किताब था और जो मुझको याद करा दी गयी हो फिर सबको वही पढ़कर सुनाता रहा।
कभी अपने-आप से कहता हूँ के मैं कुछ भी नहीं तो कभी यह ग़ुमान होता है के मैं ही सब कुछ हूँ, कभी अपने ही बारे मैं दुसरो से पूछता हूँ तो कभी अपने बारे मैं सबको बताता हूँ, कभी यह लगता है के मैं बस एक क़िरदार हूँ तो कभी लगता है के शायद कोई कहानी हूँ मैं, कभी तो लगता है के जैसे हर कहानी मेरी है तो कभी लगता है के मेरी कोई कहानी ही नहीं। कभी तो यह ख़याल के एक समन्दर हूँ मैं तो कभी यह एहसास के महज़ एक क़तरा हूँ, कभी तो यह ख्याल के सब अपने हैं तो कभी यह बद-ख्याली के सब पराए हैं। कभी यह महसूस होता है के मैं नशे में हूँ तो कभी यह बदगुमानी के खुद एक नशा हूँ मैं, कभी लगता के सिर्फ एक लम्हा हूँ तो कभी लगता है के पूरी एक सदी हूँ मैं, कभी लगता है के मैं इसी दुनिया में हूँ तो कभी लगता है के खुद एक दुनिया हूँ मैं, कभी लगता है के किसी धोके में हूँ तो कभी लगता है के खुद एक धोका हूँ मैं, कभी जीत तो कभी हार हूँ, मैं ही पतझड़ मैं ही बहार हूँ, मैं ही बेक़रारी मैं खुद ही क़रार हूँ, कभी ज़मीन तो कभी आसमान हूँ, कभी रौशनी तो कभी अँधेरा हूँ, कभी जलता हुआ सूरज तो कभी जमी हुई बर्फ, कभी बरसता हुआ पानी तो बादल का इक खामोश सा टुकड़ा, कभी सुबह कभी शाम, कभी दिन कभी रात, कभी कोई मौसम कभी कोई पैग़ाम, कभी किसी की याद तो किसी की दुआ, किसी की सज़ा तो किसी का इनाम, कभी खाहिशों का एक मुजस्समा तो कभी किसी की ख़ाहिश हूँ मैं। कभी यह लगता है के एक ज़र्रा हूँ तो कभी लगता है के पूरी क़ायनात हूँ, कभी मुसाफिर तो कभी मंज़िल हूँ मैं।
ये मैं किस जगह आ-गया हूँ, मेरी आवाज़ क्यों गूंज रही है, इस जगह को लोग वादी क्यों कहते हैं, इन पहाड़ो में कौन छुप कर बैठा है जो मेरी आवाज़ दोहरा रहा है, ये कौन है जो मेरी आवाज़ को मुझसे भी अच्छा बोल रहा है, ये कौन है जो मेरे सादे से बोलो को मधुर संगीत बना रहा है, यह आवाज़ सुनकर हवाएं अपना रुख क्यों बदल रही हैं, क्यों परिंदे अपने घोसलों से निकलकर हवाओं मैं लहरा रहे हैं, क्या यह हक़ीक़त है या फिर कोई खूबसूरत ख़याल, क्या यही मेरी तलाश थी, क्या यही मेरी मंज़िल थी।
Ishrat Alig
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