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फ़लसफ़ा:

अगर चीज़ों को समझने का नाम ही फ़लसफ़ा है तो दुनिया का हर वह इन्सान जो चीज़ों को समझने की थोड़ी बहुत समझ रखता है फ़लसफ़ी होगा, अगर ऐसा नहीं तो फिर फ़लसफ़ा क्या है?
हर किसी की अपनी एक फिलोसॉफी होती है-ज़िन्दगी जीने की,चीज़ों को देखने की, सोचने समझने की लेकिन क्या इतने भर से कोई फिलॉस्फर बन जाता है? या फिर फिलॉस्फर बनने के लिए बहुत सी नॉलेज और ढेर सारी डिग्रियां होनी चाहियें जैसे मास्टर, पीएचडी बगैरह-बगैरह। लेकिन देश के जाने माने इतिहाकार शशि थरूर, जिनकी नॉलेज पर किसी को कोई शक नहीं और न डिग्रीयों में कोई कमी है, वह खुद एक किताब में लिखते हैं के वह फिलॉस्फर नहीं बस घटनाओं को सिलसिलेवार तरीक़े से लिखते हैं।
तो क्या फिलॉस्फर कोई ऐसा शख्स हो सकता है जो पड़ा लिखा ना हो, जिसने कोई किताब लिखना तो दूर एक किताब पड़ी भी ना हो? यक़ीनन ऐसा हो सकता है, और ना होने को कोई चाहे फिलोसॉफी में कितनी भी डिग्री क्यों ना ले ले अगर वह फिलॉस्फर नहीं तो नहीं।

ये फ़लसफ़ी अजीब से लोग होते हैं अक्सर लोग इनको बात करते हुए बेवक़ूफ़ समझ लेते हैं लेकिन कुछ देर बात करने के बाद सोचते हैं के यह बेवक़ूफ़ बना रहा है , बहुत पेचीदा सी बात को बड़ी आसानी से कह जाते हैंऔर कभी-कभी असान बात को ऐसे घुमा देते हैं के लोग समझी हुई बात को भी भूल जाते हैं। उनके सवाल भी जवाब से लगते हैं और जब जवाब देते हैं तो कोई सवाल ही नहीं बचता, यूँ लगता है जैसे उनके नज़दीक सवाल-जवाब एक ही चीज़ हों, कभी सवाल को जवाब बना देते हैं तो कभी जवाब को सवाल में बदल देते हैं, जब वो अपनी बात करते हैं तो लगता है के हमारी बात हो रही है, उनकी शिकायत हर एक की शिकायत होती है, सबकी ख़ुशी में ही उनकी ख़ुशी होती है। ना रोटी उनकी भूक मिटाती है और ना पानी उनकी प्यास बुझाता है वो तो बस एक बात की तलाश में रहते हैं के कोई ऐसी बात कहे जिससे भूख और प्यास दोनों मिट जाएं।

किसी फ़लसफ़ी से मिलोगे तो लगेगा के किसी बच्चे से मिल रहे हो और जब बात करोगे तो महसूस होगा के शायद यह शख्स सदियों से यहाँ रह रहा है, कभी सदिओं पहले की कोई बात बताएगा तो कभी सदिओं बाद की कोई पेशगोई करेगा। लोग अक्सर उसकी बातों का यक़ीन नहीं करते लेकिन फिर भी सुनते दिलचस्पी से हैं।

Ishrat Alig

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