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Showing posts from January, 2020

नया साल:

गुज़रे हुए तमाम सालों की तरह यह साल भी तारीख का हिस्सा बन जाएगा और फिर इसमें दर्ज हुए वाक़िओं और हादसों को क़िस्से और कहानिओं की शक्ल में इसको याद किया जाएगा। जब ये साल शुरू हुआ था तो कुछ नए इरादे थे, कुछ कस्मे, कुछ वादे, कुछ कर-गुज़रने की जुस्तजू, कुछ आरज़ू और जब ये गुज़र चूका है तो इसको किताब के पन्नो की तरह पलट का देखते हैं के इसमें क्या पाया और क्या खोया, कोन आया कोन गया। किसी के लिए ये साल कुछ नया लेकर आएगा तो किस के लिए इसमें कुछ भी नया नहीं होगा- वही सुबह, वही शाम, उन्ही पुराने सांचों में ढली हुई वही पुरानी ज़िन्दगी। कोई अपनी ज़िन्दगी को बदलने में लगा हुआ है तो कोई बदली हुई ज़िन्दगी को दुबारा हासिल करना चाहता है। ना जाने कितने साल बदल जाते हैं और किसी की ज़िन्दगी के दिन हैं जो बदलते ही नहीं और वहीं कोई ये आरज़ू करता है के काश बदले हुए पुराने दिन वापस आ जाएं। किसी ने हर साल की तरह इस साल को भी डायरी के पन्नो में समेट लिया है जब भी इनकी याद आएगी तो वो इनको पलट कर देखेंगे तो किसी ने इनके लम्हों को तस्वीरों में क़ैद कर लिया है जो कभी हंसाएंगी कभी रुलाएंगी। कोई इस आने वाले ...

शिकायत:

कभी शिकायत बदली हुई चीज़ों से है तो कभी शिकायत उन चीजों से जो बदली ही नहीं। कभी कोई नया क़ानून परेशान करता है तो कभी कोई पुराना दस्तूर। कभी शिकायत मेहबूब से तो कभी मेहबूब की जुदाई से, कभी खुदा से तो कभी खुदा की ख़ुदाई से, कभी हुक्मरान से तो कभी अवाम से, कभी निकलते हुए सूरज से तो कभी घिरे हुए बादल से, कभी किसी आँख के आँसू से तो कभी किसी आँख के काजल से, कभी ऊँची-ऊँची इमारतों से तो कभी ज़मीन में धँसे हुए मकानों से, कभी हवा में उड़ते हुए इंसानो से तो कभी घुटनों के बल चलते हुए  लोगों से। कभी किसी की मुस्कुराहट परेशान करती है तो कभी किसी की उदासी, कभी किसी की आवाज़ तो कभी किसी की ख़ामोशी, कभी दिन का उजाला तो कभी रात का अँधेरा, कभी रोशनियों की चकाचोंध तो कभी कोई सन्नटा, कभी कोई भीड़ तो कभी वीराना। किस-किस की शिकायत करें ओर किस-किस से करें और क्यों करें, अब तो बस यही सोचा है के खुद की ही शिकायत करें और खुदी से करें। Ishrat Alig

#ज़िन्दगी:

जो ज़िन्दगी में आज है वो कल ना था लेकिन ज़िन्दगी में कल भी कुछ कमी सी लगती थी और आज भी यह ज़िन्दगी अधूरी सी लगती है। ऐसा महसूस होता है जैसे थोड़ा सा पाने की कोशिश में बहुत कुछ खो दिया है। जो रास्ते यहाँ तक लाए थे उनपे वापसी का सफ़र नज़र नहीं आता, एक भीड़ चली आ रही है, अगर कोई मुड़के जाने की कोशिश करे भी तो यह भीड़ उसे कुचल कर निकल जाए। बज़ाहिर तो यूँ लगता है के बहुत आगे निकल आए हैं लेकिन पीछे मुड़के देखने पर एहसास होता है के यह ज़िन्दगी आज भी वहीं ठहरी हुई है, बस वक़्त ही आगे नि कल गया है, जगहें वहीं हैं नक्शे बदल गए हैं, हलात वही हैं लोग बदल गए हैं, काम वही हैं तरीके बदल गए हैं, नाम वही हैं बस चेहरे बदल गए हैं, इंसान वही हैं उसूल ही बदल गए हैं। कहते हैं के ज़माना बदल गया लेकिन ऐसा लगता है जैसे कुछ भी नही बदला, वही मसले वही मसाईल और ज़िन्दगी की वही जिद्दोजहद। यह ठहरी हुई सी ज़िन्दगी कभी आगे बढ़ना चाहती है तो कभी पीछे लौट जाना चाहती है, कभी जीतना चाहती है तो कभी सब कुछ हार-जाना चाहती है, कभी ज़मीन में सोना चाहती है तो कभी आसमानो में उड़ना चाहती है, कभी बेबात पे मुस्कुराती है तो कभी हर बात पे र...

ख़बर:

ख़बर वो नहीं जो अखबार में छपी है, ख़बर वो है जो नज़रों के सामने है। खबर वो नहीं जो हमें सुनाई जा रही है, खबर वो है जो हम देख रहे हैं। ख़बर रईस के घर का शोर नहीं बल्के गरीब के घर की ख़ामोशी है जहाँ भूक की शिद्दत से किसी की आवाज़ नहीं निकलती। बोझा ढोता हुआ मजदूर जिसका चेहरा बताता है के दिनभर की मजदूरी के बाद भी उसे भरपेट खाना मिलेगा या नहीं, वो ख़बर है। ख़बर ये नहीं के साहब ने क्या खाया क्या पहना है, ख़बर ये है के आज भी कितने लोग भूके सो जाते हैं। ख़बर महलों की शहनाई नहीं बल्के गरीबो के घर का मातम है। ख़बर शहरों का शोर नहीं बल्के गाँव की वो ख़ामोशी है जहाँ हर रोज़ किसान क़र्ज़ के बोझ तले दबकर मर जाते हैं। ख़बर बाजार में बिकता हुआ सामान नहीं बल्के वहां से गुज़रते हुए लोगो की आँखों की बेबसी है। ख़बर जंग का एलान ही नहीं बल्के उसके बाद के हालात भी हैं, ऐसी जंग जिसकी जीत के बाद शायद कोई जश्‍न भी न हो। ख़बर सरहद पर गिरी लाशों की गिनती ही नहीं बल्के सिपाही के उजड़े हुए घरो की अधूरी कहानियां भी हैं जो शायद किसी को याद नहीं। ख़बर नेताओं के वादे नहीं बल्के इनके फरेब हैं जो मुसलसल चले आ रहे हैं। ख़बर एक हुकुमरान के ...