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#ज़िन्दगी:

जो ज़िन्दगी में आज है वो कल ना था लेकिन ज़िन्दगी में कल भी कुछ कमी सी लगती थी और आज भी यह ज़िन्दगी अधूरी सी लगती है। ऐसा महसूस होता है जैसे थोड़ा सा पाने की कोशिश में बहुत कुछ खो दिया है। जो रास्ते यहाँ तक लाए थे उनपे वापसी का सफ़र नज़र नहीं आता, एक भीड़ चली आ रही है, अगर कोई मुड़के जाने की कोशिश करे भी तो यह भीड़ उसे कुचल कर निकल जाए।

बज़ाहिर तो यूँ लगता है के बहुत आगे निकल आए हैं लेकिन पीछे मुड़के देखने पर एहसास होता है के यह ज़िन्दगी आज भी वहीं ठहरी हुई है, बस वक़्त ही आगे निकल गया है, जगहें वहीं हैं नक्शे बदल गए हैं, हलात वही हैं लोग बदल गए हैं, काम वही हैं तरीके बदल गए हैं, नाम वही हैं बस चेहरे बदल गए हैं, इंसान वही हैं उसूल ही बदल गए हैं।
कहते हैं के ज़माना बदल गया लेकिन ऐसा लगता है जैसे कुछ भी नही बदला, वही मसले वही मसाईल और ज़िन्दगी की वही जिद्दोजहद।

यह ठहरी हुई सी ज़िन्दगी कभी आगे बढ़ना चाहती है तो कभी पीछे लौट जाना चाहती है, कभी जीतना चाहती है तो कभी सब कुछ हार-जाना चाहती है, कभी ज़मीन में सोना चाहती है तो कभी आसमानो में उड़ना चाहती है, कभी बेबात पे मुस्कुराती है तो कभी हर बात पे रोती है, कभी खुशी से शर्माती है तो कभी उदासी से डर जाती है, कभी अपनो से दूर भागती है तो कभी अकेलेपन से घबराती है।

ऐसा लगता है जैसे यह ज़िन्दगी किसी की क़ैद में गिरफ्तार हो, जैसे ज़िन्दगी में ज़िन्दगी न हो, जैसे ये ज़िन्दगी किसी ऒर के इशारो पे चल रही हो, जैसे किसी ने निशान लगे रखे हैं और हम बस क़दम रखते जा रहे हैं, जैसे किसी ने जाल बिछा रखा है और हम फंसते जा रहे हैं।
किसी को ज़िन्दगी की तलाश है तो किसी के लिए ज़िन्दगी खुद एक तलाश है, कभी कोई ज़िन्दगी को कुछ समझाता है तो कभी ज़िन्दगी किसी को कुछ बताती है। कभी कोई ज़िन्दगी किसी दूसरी ज़िन्दगी के बिना अधूरी सी लगती है तो कभी कोई ज़िन्दगी दूसरी ज़िन्दगी पे बोझ बन जाती है, कभी ज़िन्दगी ज़िन्दगी-की ज़रुरत है तो कभी यह ज़िन्दगी मौत को पुकारती है।

कभी-कभी यह ज़िन्दगी एक दिन की मानिंद लगती है, जैसे दिन की सुबह इस ज़िन्दगी का बचपन हो-दोपहर इसकी जवानी और शाम बुढ़ापा और फिर रात के अंधेरों में यह ज़िन्दगी हमेशा के लिए कहीं खो जाए।

Ishrat Alig

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