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नया साल:

गुज़रे हुए तमाम सालों की तरह यह साल भी तारीख का हिस्सा बन जाएगा और फिर इसमें दर्ज हुए वाक़िओं और हादसों को क़िस्से और कहानिओं की शक्ल में इसको याद किया जाएगा।
जब ये साल शुरू हुआ था तो कुछ नए इरादे थे, कुछ कस्मे, कुछ वादे, कुछ कर-गुज़रने की जुस्तजू, कुछ आरज़ू और जब ये गुज़र चूका है तो इसको किताब के पन्नो की तरह पलट का देखते हैं के इसमें क्या पाया और क्या खोया, कोन आया कोन गया।
किसी के लिए ये साल कुछ नया लेकर आएगा तो किस के लिए इसमें कुछ भी नया नहीं होगा- वही सुबह, वही शाम, उन्ही पुराने सांचों में ढली हुई वही पुरानी ज़िन्दगी।
कोई अपनी ज़िन्दगी को बदलने में लगा हुआ है तो कोई बदली हुई ज़िन्दगी को दुबारा हासिल करना चाहता है। ना जाने कितने साल बदल जाते हैं और किसी की ज़िन्दगी के दिन हैं जो बदलते ही नहीं और वहीं कोई ये आरज़ू करता है के काश बदले हुए पुराने दिन वापस आ जाएं।
किसी ने हर साल की तरह इस साल को भी डायरी के पन्नो में समेट लिया है जब भी इनकी याद आएगी तो वो इनको पलट कर देखेंगे तो किसी ने इनके लम्हों को तस्वीरों में क़ैद कर लिया है जो कभी हंसाएंगी कभी रुलाएंगी। कोई इस आने वाले साल का बेसब्री से इन्तेज़ार कर रहा है तो कोई गुज़रते हुए साल को और बड़ा करना चाहता है तो कोई कहता है ज़िन्दगी के लिखे हुए सालों में से एक और साल कट गया।।
वैसे तो एक पल में ही साल की तारीख बदल जाती है लेकिन सोचो तो पूरा साल लगता है इसको बदलने के लिए।

ये दिन महीने साल गुज़रते जाते हैं, हम इनको कभी दशकों में गिनते हैं तो कभी सदियों में और इनकी गिनती बढ़ती ही जाती है, गुज़रते हुए ये साल जिनको हम कैलेंडर में दर्ज करते जाते हैं कभी-कभी ऐसा महसूस होता है के जैसे आने वाली सारी सदियां सारे साल किसी एक कैलेंडर में पहले से ही दर्ज हैं और उसमें से हर बार एक साल कम हो जाता है, जैसे ये गिनती उलटी चली हो। ऐसा लगता है जैसे सारी कहानियां किसी किताब में लिखी होंऔर हम महज़ उनके किरदारों को निभा रहे हैं।
इस नए साल में भी नयापन कुछ नहीं, वही पुराने लोग, वही दिन वही रात, वही सुबह वही शाम, अँधेरे वही रौशनी के रंग भी वही, वही मौसम हैं, यह ज़मीन-आसमान भी वही, सितारे वही चाँद सूरज वही, ये सब तो बदले नहीं ऐ साल तू क्यों बदल जाता है लेकिन तेरी तो हर बात पुरानी है, फिर मैं तुझे नया क्यों कहूं। इस बार अगर तेरे पास कोई दिन नया हो तो फिर से दिन गिनू तेरे, कोई महीना अगर नया हो तो तुझे नया जानूं मैं भी।


आने वाला साल कैसा होगा इसकी फ़िक्र है तो गुज़रा हुआ साल कैसा था इसकी चर्चा, ये जाने वाला साल ना जाने कितने लोगो के लिए पहला था और ना-जाने कितनो के लिए आखरी।
आने वाला साल जाने वाले साल से पूछता है के तू मेरे लिए क्या छोड़ कर जा रहा है, ये बेनूर फ़ज़ाएँ, ये उजड़े हुए चमन ये बिखरी हुई कलियाँ, ये उदास पंछी, ये तड़पते हुए लोग, ये भूक, ये प्यास, एक बेचैनी का आलम।
लोग नज़रें लगाए मुझे देख रहे हैं जैसे मैं एक पल में ही सब बदल दुंगा।

ये जाने वाला साल कुछ सवाल छोड़ कर जा रहा है तो वहीं आने वाला साल खुद एक सवाल बन कर आ रहा है।
यहाँ हर एक बदलाव की बात करता है, कोई आज को बदलना चाहता है तो कोई आने वाले कल को बदलने की जुस्तुजू में है लेकिन कुछ नासमझ लोग ऐसे भी हैं जो इतिहास बदलने की बात करते हैं, नादान ये भी नहीं जानते के तुम इतिहास तो बदल सकते हो लेकिन गुज़रे हुए वक़्त को कैसे बदलोगे। अगर आने वाली नस्लों ने कोई ऐसी चीज़ ईजाद कर ली के वो गुज़रे हुए वक़्त को देख सकें तो वो तुम्हारे इस झूठे इतिहास पर हँसेगीं, तुम्हारा मज़ाक बनाएंगी फिर वो इस इतिहास को उसी तरह लिखेंगी जिस तरह ये गुज़रा था।
जो आज हमारे पास है वो गुज़रे हुए ज़माने के पास नहीं था लेकिन हमारे इस आज को बनने में ज़माने लगे हैं, कहीं ऐसा ना हो के हम अपने आज को तो जी लें लेकिन आने वाले कल को ख़त्म कर दें। हमे अपने आज को इस तरह जीना होगा के आने वाले लोग हमसे शिकायत नहीं बल्कि हमपे नाज़ करें।


हर साल की तरह इस साल भी इस बदलाव के मंज़र को देखने के लिए एक महफ़िल सजी हुई है जिसमे शहर भर के लोग इकट्ठा हुए हैं, कुछ चेहरे नए हैं तो कुछ चेहरे ऐसे भी जो पिछले कई सालों से मुसलसल दिखाई देते हैं। सभी मौजूदा साल के खत्म होने की घड़ियाँ गिन रहे हैं और इन्तेज़ार कर रहे हैं आने वाले साल की जो शुरू होने वाला है जो अब सबके साथ रहेगा, कभी दिन की शक्ल में तो कभी हफ्ता तो कभी महीना बनके लिखा जाएगा, पूरे साल सारे काम इसी की तारीखों से किये जाएंगे, कभी कोई छुट्टी कभी त्यौहार तो कभी कोई इम्तिहान। सभी की निगाहें आने वाले साल की तरफ लगी हुई हैं, सबको बेसब्री से इंतेज़ार है घड़ी की दस्तक का के कब घड़ी की आवाज़ आये और खुशिओं में डूब जाएं । एक ख़ामोशी सी है जैसे वक़्त थम सा गया हो और सब इसके शुरू होने का इन्तेज़ार कर रहे हैं, घड़ी की आवाज़ के साथ एक धमाका होगा और जैसे वक़्त शुरू हो जाएगा और इस आवाज़ के साथ ही नयी रौशनी होगी, नए साज़ और नयी खुशियां। लोगो को देखकर लगता है जैसे सबके पर निकल आये हों और बस सबको उड़ान भरने का इन्तेज़ार है। खुशिओं की इस महफ़िल में इक नौजवान की नज़र एक आदमी पर पड़ती है जो ऐसे खुशगवार समां में भी उदास सा दिखाई देता है, उसकी आँखों में नमी है जैसे वो आने वाले साल का ख़ैरमक़दम करने नहीं बल्के गुज़रते हुए साल को बिदा करने आया है, उसके चेहरे पर अफ़्सुर्दगी साफ़ झलक रही है, उसकी आँखों में एक खलिश सी है और उसकी आँखें आने वाले साल को नहीं बल्के गुज़रते हुए साल को मुड़-मुड़ कर देख रही हैं जैसे किसी का मेहबूब उससे हमेशा के लिए बिछड़ रह हो, जैसे यह जाने वाला साल उसका सब कुछ ले जा रहा हो और आने वाले साल में उसके लिए कुछ भी ना हो। उस आदमी की यह खलिश उस लड़के को उसके नज़दीक ले आती है और वो उससे पूछता है के आप इस माहौल में भी उदास हैं, आदमी थोड़ी देर खामोश रहता है फिर आहिस्ता से जवाब देता है के कभी-कभी उदासी कुछ छिन जाने पर नहीं कुछ मिल जाने पर भी होती है और मेरी ये नुम आँखें बस इस जाते हुए साल का बड़ी क़ुरबत के साथ शुक्र अदा कर रही हैं, ये आने वाला साल मुझे कुछ ना भी दे तो भी मुझे कोई शिकवा नहीं। नौजवान ये बात सुन कर खुश हो जाता है और फिर घड़े की आवाज़ आती है और महफ़िल की ख़ामोशी शोर में बदल जाती है और फ़ज़ाओं के अँधेरे में रोशनियां फ़ैल जाती हैं।




Ishrat Alig

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