कभी शिकायत बदली हुई चीज़ों से है तो कभी शिकायत उन चीजों से जो बदली ही नहीं। कभी कोई नया क़ानून परेशान करता है तो कभी कोई पुराना दस्तूर। कभी शिकायत मेहबूब से तो कभी मेहबूब की जुदाई से, कभी खुदा से तो कभी खुदा की ख़ुदाई से, कभी हुक्मरान से तो कभी अवाम से, कभी निकलते हुए सूरज से तो कभी घिरे हुए बादल से, कभी किसी आँख के आँसू से तो कभी किसी आँख के काजल से, कभी ऊँची-ऊँची इमारतों से तो कभी ज़मीन में धँसे हुए मकानों से, कभी हवा में उड़ते हुए इंसानो से तो कभी घुटनों के बल चलते हुए लोगों से।
कभी किसी की मुस्कुराहट परेशान करती है तो कभी किसी की उदासी, कभी किसी की आवाज़ तो कभी किसी की ख़ामोशी, कभी दिन का उजाला तो कभी रात का अँधेरा, कभी रोशनियों की चकाचोंध तो कभी कोई सन्नटा, कभी कोई भीड़ तो कभी वीराना।
कभी किसी की मुस्कुराहट परेशान करती है तो कभी किसी की उदासी, कभी किसी की आवाज़ तो कभी किसी की ख़ामोशी, कभी दिन का उजाला तो कभी रात का अँधेरा, कभी रोशनियों की चकाचोंध तो कभी कोई सन्नटा, कभी कोई भीड़ तो कभी वीराना।
किस-किस की शिकायत करें ओर किस-किस से करें और क्यों करें, अब तो बस यही सोचा है के खुद की ही शिकायत करें और खुदी से करें।
Ishrat Alig
Comments
Post a Comment