Skip to main content

Posts

Showing posts from August, 2019

ज़िन्दगी और मौत:

~ ज़िन्दगी में अगर कभी ज़िन्दगी मिली तो ज़िन्दगी से पूछेगें.. ऐ ज़िन्दगी तूने ज़िन्दगी के साथ क्या किया? अगर ज़िन्दगी कहेगी के हर क़दम पर मौत का डर था मुझे, में क्या करती। और ऊपर से उम्र का तंग पैमाना, वैसे तो परवरदिगार ने मौत का दिन मुक़र्रर कर दिया है लेकिन ज़िन्दगी को उसका इल्म ही कहाँ। ज़िन्दगी कहती है काश वो दिन पता होता- थोड़ी तकलीफ तो होती लेकिन बहुत से गमो से बच जाती, ज़िन्दगी हर रोज़ मौत को याद करती। कभी ज़िन्दगी मौत से मिलने को बेताब रहती है तो कभी इससे दूर भागना च ाहती है और यह नहीं जानती के जितना दूर भागती है उतना ही नज़दीक होती जाती है। मौत के बादल हमेशा इसके ऊपर मंडराते रहते हैं और जब ये बादल बरसने लगते हैं तो इसे एहसास होता है के शायद वो दिन आ पहुंचा- ऐसा लगता है के बिजली कड़केगी और ये बादल फट जायेगा और ज़िन्दगी का ये खेल ख़त्म हो जाएगा। लेकिन जब बारिश रुक जाती है और ज़िन्दगी खिलती हुई धूप को देखकर उन बादलों को भूल जाती है। जब ठंडी हवा के झोके चलते हैं तो यह इतराने लगती है, इठलाती है और ज़िन्दगी ज़िन्दगी में खो जाती है, ज़मीन पर उछलने लगती है और आसमानों में उड़ने लगती है; और जब फिर उन बादल...

दिल और दिमाग़ :

~ ऐ दिल तु क्यों उदास है, किसी की याद आयी है या किसी ने याद किया है। चंद ही नाम तो हैं तेरे पास फिर क्यों इतना परेशान है, दिमाग को देख हज़ारों-लाखों नाम रखे हुए है फिर भी अराम में है, और यह एक नाम किसका है जिसे तु याद करते नहीं थकता, तुझे इतना यकीन क्यों है के कभी वह भी तुझे याद करेगा। एक ही बार तो नाम लिया है तेरा उसने और तु इसी पे फ़िदा है, हो सकता है तेरी जगह सिर्फ उसके दिमाग में ही हो, जहाँ अनगिनत नाम होंगे और कभी तेरा ज़िक्र भी ना आता होगा। यह दिल भी अजीब शय है जो दिमाग के अनगिनत नामों को देखकर भी कभी परेशान नहीं होता और एक दिमाग है जो दिल के चंद नामों से ही बेचैन रहता है, और इसके एक नाम को देखकर तो इस पर वहशत तारी हो जाती है। इस दिल की एक ही आरज़ू है और दिमाग की ख़्वाहिशें कम होने का नाम ही नहीं लेतीं। परेशान तो ये दोनों ही हो जाते हैं, जब दिमाग परेशान होता है तो यह सिर्फ जिस्म को परेशान करता है लेकिन जब दिल परेशान होता है तो रूह तक को बेचैन कर देता है, ऐसा महसूस होता है जैसे रूह का रिश्ता जिस्म से कम और दिल से ज़्यादा हो, एक परेशान हो तो दूसरे को चैन ना आए। दिल की दुनिया छोटी सी ह...

मोहल्ले के कल्वा भाई:

आज मोहल्ले के उसी रास्ते से गुज़र हुआ जहाँ ना-जाने कितने लोगों की दोपहरियाँ कटा करती थीं, बस्ती के रास्तों की तरह यह मकान भी पक्का हो गया है। जब ये मकान कच्चा था तो एक था, अब इसके आंगन में कई दीवारें खिच गयीं हैं, अब इस मकान में इंसानो के साथ परिंदो की भी आवा-जाई ख़त्म सी हो गयी है, अब इसमें ना कोई पेड़ बचा है ना कोई पौधा। मकान तो पक्के होते जा रहे हैं लेकिन रिश्ते कच्चे होते जा रहे हैं, मकानों की ऊंचाईयां बढ़ती जा रही हैं और इंसानो के क़द छोटे होते जा रहे हैं। इस मकान के शुरू में एक बैठक हुआ करती थी जिसमें कल्वा भाई का टेप और स्पीकर रहता था और कल्वा भाई अक्सर चारपाई पे लेटे हुए बड़ी खमोशी के साथ गाने सुना करते थे, कभी अकेले होते तो कभी यारों के साथ, कभी मोहल्ले का ही कोई रहता तो कभी कोई दूर से बैठने के लिए आता, कोई बजते हुओ गानों को ही सुनता तो कोई अपनी फरमाइश रखता, ना गानों को कोई कमी थी-ना सुनने वालों की और ना वक़्त की ही कोई कमी थी। इत्मीनान और फुर्सत से भरपूर कल्वा भाई अक्सर खामोश ही रहा करते थे लेकिन बजते हुए गाने यह एहसास कराते के यही कल्वा भाई की ज़बान है-यही इनकी बातें हैं। पता नहीं...