~ ज़िन्दगी में अगर कभी ज़िन्दगी मिली तो ज़िन्दगी से पूछेगें.. ऐ ज़िन्दगी तूने ज़िन्दगी के साथ क्या किया? अगर ज़िन्दगी कहेगी के हर क़दम पर मौत का डर था मुझे, में क्या करती। और ऊपर से उम्र का तंग पैमाना, वैसे तो परवरदिगार ने मौत का दिन मुक़र्रर कर दिया है लेकिन ज़िन्दगी को उसका इल्म ही कहाँ। ज़िन्दगी कहती है काश वो दिन पता होता- थोड़ी तकलीफ तो होती लेकिन बहुत से गमो से बच जाती, ज़िन्दगी हर रोज़ मौत को याद करती। कभी ज़िन्दगी मौत से मिलने को बेताब रहती है तो कभी इससे दूर भागना च ाहती है और यह नहीं जानती के जितना दूर भागती है उतना ही नज़दीक होती जाती है। मौत के बादल हमेशा इसके ऊपर मंडराते रहते हैं और जब ये बादल बरसने लगते हैं तो इसे एहसास होता है के शायद वो दिन आ पहुंचा- ऐसा लगता है के बिजली कड़केगी और ये बादल फट जायेगा और ज़िन्दगी का ये खेल ख़त्म हो जाएगा। लेकिन जब बारिश रुक जाती है और ज़िन्दगी खिलती हुई धूप को देखकर उन बादलों को भूल जाती है। जब ठंडी हवा के झोके चलते हैं तो यह इतराने लगती है, इठलाती है और ज़िन्दगी ज़िन्दगी में खो जाती है, ज़मीन पर उछलने लगती है और आसमानों में उड़ने लगती है; और जब फिर उन बादल...
Life is what you think. Someone is smiling in pain and someone is worry in pleasure. Someone is happy on footpath and someone is moaning in palace. Life stops when you stop, it starts when you walk, and it runs when you enjoy. People say books are best friends of human because they never abandon you unless you abandon them.