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दिल और दिमाग़ :

~ ऐ दिल तु क्यों उदास है, किसी की याद आयी है या किसी ने याद किया है। चंद ही नाम तो हैं तेरे पास फिर क्यों इतना परेशान है, दिमाग को देख हज़ारों-लाखों नाम रखे हुए है फिर भी अराम में है, और यह एक नाम किसका है जिसे तु याद करते नहीं थकता, तुझे इतना यकीन क्यों है के कभी वह भी तुझे याद करेगा। एक ही बार तो नाम लिया है तेरा उसने और तु इसी पे फ़िदा है, हो सकता है तेरी जगह सिर्फ उसके दिमाग में ही हो, जहाँ अनगिनत नाम होंगे और कभी तेरा ज़िक्र भी ना आता होगा।
यह दिल भी अजीब शय है जो दिमाग के अनगिनत नामों को देखकर भी कभी परेशान नहीं होता और एक दिमाग है जो दिल के चंद नामों से ही बेचैन रहता है, और इसके एक नाम को देखकर तो इस पर वहशत तारी हो जाती है।
इस दिल की एक ही आरज़ू है और दिमाग की ख़्वाहिशें कम होने का नाम ही नहीं लेतीं। परेशान तो ये दोनों ही हो जाते हैं, जब दिमाग परेशान होता है तो यह सिर्फ जिस्म को परेशान करता है लेकिन जब दिल परेशान होता है तो रूह तक को बेचैन कर देता है, ऐसा महसूस होता है जैसे रूह का रिश्ता जिस्म से कम और दिल से ज़्यादा हो, एक परेशान हो तो दूसरे को चैन ना आए।
दिल की दुनिया छोटी सी है लेकिन इसकी खूबसूरती में कोई कमी तो नहीं।

यह दिमाग हर रोज़ कितनी चोटें खाता है, कितने दर्द सेहत है लेकिन ऐसे भूल जाता है जैसे कभी कुछ हुआ ही ना हो लेकिन दिल पे कोई ज़ख्म लग जाए तो भरता ही नहीं-इसपे कोई चोट लग जाए तो उसे भूलता ही नहीं।
कभी-कभी किसी जिद्दो-जिहाद में दिल कुछ कहता है और दिमाग कुछ तो फिर बात किसकी मानी जाए, फैसला तो लेना ही पड़ता है, व्यापार के मामले में दिल बहुत कच्चा होता है लेकिन प्यार-मोहब्बत के फैसले तो दिल से ही  लेने चाहिएं।
यह दिल जोड़ना-घटाना नहीं जानता बस कोई दो-मीठे बोल बोल ले उसी से खुश हो जाता है , ये दिमाग बिना देखे कुछ मानता ही नहीं और इस दिल को कोई मीलों दूर से भी पुकारे तो भी उसकी आवाज़ सुन लेता है के किसी अज़ीज़ ने आवाज़ दी है।
यह ख़्वाबों की दुनिया भी अजीब है इसमें दिल और दिमाग कितने नज़दीक आ जाते हैं मानो जैसे एक ही हों, जो दिल कहता है वही दिमाग, ना कोई कश्मकश ना कोई तकरार, एक खुश तो दूसरा भी मगन-एक ग़मज़दा तो दूसरा भी दुखी। ख़्वाबों में दिमाग कुछ बदला बदला सा नज़र आता है जैसे इसपे दिल का असर हो गया हो लेकिन दिल अपने उसी रिवायती अंदाज़ में दिखाई देता है, ख़्वाबों की दुनिया हो या हक़ीक़ी दुनिया यह दिल नहीं बदलता।

इस ज़माने की भाग-दौड़ को देखकर ऐसा लगता है के यहाँ किसी के पास दिल नहीं बल्के एक पम्पिंग मशीन है जो सांस लेने का काम करती है, हर रिश्ते में हिसाब-किताब चल रहा है, शायद दिल है भी तो कोई इसकी आवाज़ ही सुन्ना नहीं चाहता, बड़े-बड़े कारोबार की मिसालें तो हैं लेकिन अब कोई मोहब्बत की मिसाल नहीं मिलती।
किसने कहा के दिमाग की मत सुनो, हिसाब-किताब ना लगाओ लेकिन दिल भी तो कोई चीज़ है यह क्या कहता है इसका भी तो ख्याल होना चाहिए , अगर दिल से रिश्ता ख़त्म हो गया तो फिर कोई रिश्ता ही नहीं बचेगा।
दिमाग इस उलझन में है के कल यह काम करना है और काम होने के बाद शायद यह उसके बारे में सोचेगा भी नहीं और इस दिल को जिसका इंतज़ार है उसके चले जाने के बाद यह कितना बेचैन रहेगा, खुद तो परेशान होगा ही आँखों को-पलकों को-जिस्म के हर हिस्से को परेशान करेगा यहाँ तक के रूह को भी तकलीफ देगा, खुद भी रोयेगा और दूसरों को भी रुलाएगा।

एक दिन दिमाग परेशान होकर दिल से कहता है के देख मैं कितने सारे नामों को समेटे हुए हूँ, कितना कुछ समाया हुआ है मेरे अंदर। दिल बस दिमाग से इतना कहता है कि हाँ तू याद तो बहुत कुछ कर लेता है लेकिन भूल भी जाता है और मैं जिसे याद कर लेता हूँ उसे चाह कर भी नहीं भूल पाता। दिल की ये बात सुनकर दिमाग तड़प जाता है, दिल कहता है तुझे किसी को याद करने के लिए कितना सोचना पड़ता है, मुझे देख मैं बिन सोचे ही याद करता हूँ बस याद करता ही जाता हूँ। दिल दिमाग से कहता है तु तो याद करते करते थक जाता है, क्या तूने मुझे किसी की याद से थकते देखा है, दिमाग दिल की इस बात पर खामोश हो जाता है। आज दिल की धड़कनें काबू से बाहर हो रहीं हैं जैसे आज फिर किसी ने इसे पुकारा हो जैसे आज फिर किसी ने इसका नाम लिया हो।

इंसानी सीने में धड़कता हुआ दिल यह बताता है के वह ज़िंदा है और दिमाग की कश्मकश यह साबित करती है के वह बेदारी के आलम में है। कहने को तो ये दोनों एक ही जिस्म के अनासिर हैं फिर दोनों में इतना फर्क क्यों है। दिमाग पड़ता है और दिल गाता है, यह दिल हमेशा नुक्सान उठाना चाहता है और दिमाग है के अगर फायदा  कुछ कम भी हो जाए तो उससे ही खफा रहता है, यह दिमाग इसी दुनिया की बात करता है इसी दुनिया में रहना चाहता है और दिल है के नए नए ख़्वाब देखता है नयी दुनिया में जाना चाहता है, यह दिमाग हाँ-ना में उलझा रहता है और दिल या तो हाँ कहता है या ना कहता है, दिमाग को यह नाज़ के वह सबसे ऊपर है तो दिल को यह फख्र के वह मर्क़ज़ में है।
क्यों दिल दूट जाता है दिमाग नहीं, क्यों दिल रोता है दिमाग नहीं, क्यों दिल पछताता है दिमाग नहीं, क्यों दिल को ख़ुशी मिलती है दिमाग को नहीं, क्यों दिल के सुकून और दिमाग के सुकून में इतना फर्क है, क्यों दिमाग सो जाता है दिल नहीं, क्यों ये दिमाग दुनिया के इतने हिसाब किताब लगाता रहता है, क्या इसिलए खुदा ने अपना बसेरा दिल में बनाया है दिमाग में नहीं।

Ishrat Alig

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