आज मोहल्ले के उसी रास्ते से गुज़र हुआ जहाँ ना-जाने कितने लोगों की दोपहरियाँ कटा करती थीं, बस्ती के रास्तों की तरह यह मकान भी पक्का हो गया है। जब ये मकान कच्चा था तो एक था, अब इसके आंगन में कई दीवारें खिच गयीं हैं, अब इस मकान में इंसानो के साथ परिंदो की भी आवा-जाई ख़त्म सी हो गयी है, अब इसमें ना कोई पेड़ बचा है ना कोई पौधा। मकान तो पक्के होते जा रहे हैं लेकिन रिश्ते कच्चे होते जा रहे हैं, मकानों की ऊंचाईयां बढ़ती जा रही हैं और इंसानो के क़द छोटे होते जा रहे हैं।
इस मकान के शुरू में एक बैठक हुआ करती थी जिसमें कल्वा भाई का टेप और स्पीकर रहता था और कल्वा भाई अक्सर चारपाई पे लेटे हुए बड़ी खमोशी के साथ गाने सुना करते थे, कभी अकेले होते तो कभी यारों के साथ, कभी मोहल्ले का ही कोई रहता तो कभी कोई दूर से बैठने के लिए आता, कोई बजते हुओ गानों को ही सुनता तो कोई अपनी फरमाइश रखता, ना गानों को कोई कमी थी-ना सुनने वालों की और ना वक़्त की ही कोई कमी थी।
इत्मीनान और फुर्सत से भरपूर कल्वा भाई अक्सर खामोश ही रहा करते थे लेकिन बजते हुए गाने यह एहसास कराते के यही कल्वा भाई की ज़बान है-यही इनकी बातें हैं।
पता नहीं कल्वा भाई को उन गानों से मोहब्बत थी या वो गाने किसी की मोहब्बत में थे, जो भी था उन गानों का मोहब्बत से ताल्लुक ज़रूर था, पता नहीं कहाँ दिल लगा बैठे थे या किसी को दिल दे बैठे थे, ख़ामोशी की वह शिद्दत तो यही बताती थी के उन नज़रों में किसी के ख्याल थे। पता ही नहीं चलता था के गानों में ज़िन्दगी गुज़र रही थी या गाने ही ज़िन्दगी थे, कुछ गाने हर रोज़ बजते थे और उसी अंदाज़ में सुने जाते थे-कल्वा भाई की वही ख़ामोशी और गानों की वही गूंज होती थी-और दोनों ही खूब सुनाई देते थे। कभी-कभी शोक और मोहब्बत के दरमियान फर्क करना भी कितना मश्किल हो जाता है, कोई शोक में पीता है तो कोई मोहब्बत में-ये तो बस पीने वाला ही जाने वो पी क्यों रहा है। गली से गुज़रते हुए ना जाने कितने लोग उन गानों को रूककर सुना करते थे, कोई जल्दी या किसी उलझन में भी होता तो कुछ देर के लिए उसको भूल जाता और उन गानों में खो जाता।
इस मकान के शुरू में एक बैठक हुआ करती थी जिसमें कल्वा भाई का टेप और स्पीकर रहता था और कल्वा भाई अक्सर चारपाई पे लेटे हुए बड़ी खमोशी के साथ गाने सुना करते थे, कभी अकेले होते तो कभी यारों के साथ, कभी मोहल्ले का ही कोई रहता तो कभी कोई दूर से बैठने के लिए आता, कोई बजते हुओ गानों को ही सुनता तो कोई अपनी फरमाइश रखता, ना गानों को कोई कमी थी-ना सुनने वालों की और ना वक़्त की ही कोई कमी थी।
इत्मीनान और फुर्सत से भरपूर कल्वा भाई अक्सर खामोश ही रहा करते थे लेकिन बजते हुए गाने यह एहसास कराते के यही कल्वा भाई की ज़बान है-यही इनकी बातें हैं।
पता नहीं कल्वा भाई को उन गानों से मोहब्बत थी या वो गाने किसी की मोहब्बत में थे, जो भी था उन गानों का मोहब्बत से ताल्लुक ज़रूर था, पता नहीं कहाँ दिल लगा बैठे थे या किसी को दिल दे बैठे थे, ख़ामोशी की वह शिद्दत तो यही बताती थी के उन नज़रों में किसी के ख्याल थे। पता ही नहीं चलता था के गानों में ज़िन्दगी गुज़र रही थी या गाने ही ज़िन्दगी थे, कुछ गाने हर रोज़ बजते थे और उसी अंदाज़ में सुने जाते थे-कल्वा भाई की वही ख़ामोशी और गानों की वही गूंज होती थी-और दोनों ही खूब सुनाई देते थे। कभी-कभी शोक और मोहब्बत के दरमियान फर्क करना भी कितना मश्किल हो जाता है, कोई शोक में पीता है तो कोई मोहब्बत में-ये तो बस पीने वाला ही जाने वो पी क्यों रहा है। गली से गुज़रते हुए ना जाने कितने लोग उन गानों को रूककर सुना करते थे, कोई जल्दी या किसी उलझन में भी होता तो कुछ देर के लिए उसको भूल जाता और उन गानों में खो जाता।
वो मोहब्बत का दौर था, गानों में भी और फिल्मों में भी खूब मोहब्बत दिखा करती थी, हर-एक मोहब्बत करना चाहता था। एक बार बहुत दिनों बाद एक दोस्त से मिलने जाना हुआ, देखा तो सब कुछ बदला-बदला सा लग रहा था, शेव और सर के बाल बढ़ गए हैं, जो बंदा कभी कपड़ों पे सिलवट नहीं पड़ने देता था-आज पता ही नहीं के कपड़ों की क्या हालत है, कमरे का सारा सामान इधर-उधर है, कोई चीज़ अपनी जगह पर नहीं और ग़ज़लें सुन रहा है। मुझे देखकर भी खुशी का इज़हार नहीं किया नहीं तो हमेशा गर्मजोशी से मिलता था। मैंने पूछा भाई क्या हो गया है-बोला के तेरे भाई को मोहब्बत हो गयी है, मुझे हंसी आ गई, कहता है के सब हंसी उड़ा रहे हैं तू भी उड़ा ले भाई। मैंने कहा तुम्हे मोहब्बत हुई नहीं है तुम दिखाने की कोशिश कर रहे हो के तुम्हे मोहब्बत हो गई है। जिस दिन तुम्हे मोहब्बत हो गई-ना तो तुम पूछते फिरोगे के मुझे क्या हो गया है और लोग कहेंगे के इसे मोहब्बत हो गई है , अपने ही घर को कहोगे के यह कौन सी जगह है-वीराने में कहोगे यहाँ इतना शोर क्यों है-भीड़ में कहोगे के मैं अकेला क्यों हूँ और लोग कहेंगे यह दीवाना है। खुशी में रोओगे-गम में मुस्कुराओगे-कभी अपनों को गैर समझोगे तो कभी अजनबी को अपना-दिन को रात कहोगे और रात को दिन-ना तुम्हे दिन याद रहेगा ना तारीख ना सालों की कोई गिनती-ना भूक लगेगी ना प्यास -सब तुम्हारा नाम पुकारेंगे और तुम अपना ही नाम भूल जाओगे, जब कोई तुम्हारा नाम लेगा तो लोग सोचेंगे के यह मोहब्बत की बात कर रहा है, मोहब्बत को एक नया नाम मिल जाएगा जैसे कभी रोमियो राँझा मजनू नामों के भी कुछ मायने हुआ करते थे लेकिन अब ये सब मोहब्बत के ही नाम बन चुके हैं वैसे ही तुम्हारा नाम भी मोहब्बत का हमनाम बन जायेगा। जब भी किसी आशिक़ की बारात निकलेगी तो तुम्हारे नाम के नारे भी लगाए जायेंगे, अभी तो ग़ज़लें सुन रहे हो जब मोहब्बत होगी तो नयी ग़ज़लें लिखोगे जिनको हर कोई गुनगुनाएगा।
इसके बाद फिर उसने मोहब्बत की बात नहीं की, शायद मोहब्बत की इस तारीफ ने उसको उलझन में डाल दिया था के उसको मोहब्बत हुई है या कुछ और।
इसके बाद फिर उसने मोहब्बत की बात नहीं की, शायद मोहब्बत की इस तारीफ ने उसको उलझन में डाल दिया था के उसको मोहब्बत हुई है या कुछ और।
वक़्त के साथ-साथ बहुत कुछ बदला, फिल्में बदलीं, फिल्मों के गाने भी बदले, हीरो भी विलेन होने लगे और विलेन हीरो बनने लगे और कल्वा भाई की ज़िन्दगी में भी एक बदलाव आया-कल्वा भाई की शादी हो गई। वैसे तो बदलाव क़ुदरत का दस्तूर है और इंसान भी एक मुद्दत से तबदीली के लिए जिद्दोजहद करता आ रहा है फिर भी कुछ बदली हुई चीज़ें बड़ा परेशान करतीं हैं, उनको सोच कर दिल भर आता है-आंख नम हो जाती है-एक बेदारी सी छा जाती है-दिल यह कहता है के फिर से उन्ही दिनों में लोट चल या उन दिनों को फिर वापस ले आ लेकिन हक़ीक़त यही है के दोनों में से कोई भी नहीं हो सकता बस किसी तरह से दिल को समझाएं के हम आज इस चलते वक़्त हिस्सा हैं और कल गुज़रे वक़्त का हिस्सा बन जायेंगे।
पता नहीं शादी के बदलाव ने या दुनिया के बदलते हुए तोर-तरीकों ने कल्वा भाई को बदल दिया, वह कल्वा भाई जो कभी तन्हाई में भी तन्हा नहीं लगते थे अब मजमे में भी बैठते हैं तो अकेले से नज़र आते हैं, ना अब वो गाने बजते हैं-ना यारों के आने जाने हैं, कुछ होश ही नहीं कब सुबह शुरू हुई कब शाम ख़त्म हो गई, जो लब कभी गाने गुनगुनाया करते थे पता नहीं अब कौन से हिसाब-किताब लगाते रहते हैं, घर होते हैं तो काम की फ़िक्र और काम पे होते हैं तो घर का ख्याल, ये कैसी फिक्रें हैं जो कभी ख़त्म ही नहीं होतीं ये कैसे काम हैं जो सुकून नहीं लेने देते, कभी गाने ही ज़िन्दगी थे अब तो ज़िन्दगी खुद एक गाना बन गई है बस इसे ही गाते रहो।
पता नहीं शादी के बदलाव ने या दुनिया के बदलते हुए तोर-तरीकों ने कल्वा भाई को बदल दिया, वह कल्वा भाई जो कभी तन्हाई में भी तन्हा नहीं लगते थे अब मजमे में भी बैठते हैं तो अकेले से नज़र आते हैं, ना अब वो गाने बजते हैं-ना यारों के आने जाने हैं, कुछ होश ही नहीं कब सुबह शुरू हुई कब शाम ख़त्म हो गई, जो लब कभी गाने गुनगुनाया करते थे पता नहीं अब कौन से हिसाब-किताब लगाते रहते हैं, घर होते हैं तो काम की फ़िक्र और काम पे होते हैं तो घर का ख्याल, ये कैसी फिक्रें हैं जो कभी ख़त्म ही नहीं होतीं ये कैसे काम हैं जो सुकून नहीं लेने देते, कभी गाने ही ज़िन्दगी थे अब तो ज़िन्दगी खुद एक गाना बन गई है बस इसे ही गाते रहो।
यह कैसी दस्तूर-ए-दुनिया है जो एक आज़ाद इंसान को गुलाम बना देती है, और हमें यह एहसास ही नहीं हो पता कब हम इस आज़ाद ज़िन्दगी के गुलाम हो गए, जो कभी कच्चे घरों में खुशहाल रहा करते थे अब वो पक्के घरों में उस कच्चे दौर के लम्हों को बड़े शोक से याद करते हैं। ये क्या हो रहा है ज़रुरत की चीज़ों को मक़सद बना लिया है और जो मक़सद होना चाहिए वो ज़रुरत भी नहीं।
Ishrat Alig
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