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Showing posts from November, 2019

ख़ुशी और ग़म:

ख़ुशी और ग़म दो ऐसे लफ्ज़ हैं जो हर एक की ज़िन्दगी से जुड़े हैं-चाहें कोई कितना भी दौलतमंद हो कोई ना कोई  ग़म उसकी ज़िन्दगी में मिल ही जाएगा और गरीबो के पास भी कोई ना कोई ख़ुशी मिल जाती है। खुशियाँ किसी दूकान पर नहीं मिलतीं और ना इनको तोलने का कोई पैमाना होता है, अगर खुशियाँ बिकतीं तो महंगाई के इस दौर में इनकी क़ीमत भी खूब होती -इनके भी अपने अलग तराज़ू होते, रईसों के घर खुशियों से भरे होते और गरीबी शायद इससे महरूम ही रहती। किसी का हंसना या मुस्कुराना  ख़ुशी की दलील नहीं और ऑंख के आंसू ग़म की पहचान नहीं तो फिर ये ख़ुशी और ग़म क्या हैं। क्या ख़ुशी और ग़म महज़ एक एहसास हैं जो मिलने को किसी की एक बात से ही मिल जाते  हैं और ना मिलने को कोई दुनिया की दौलत भी क़दमों में डाल दे तो नहीं मिलते। यक़ीनन इनकी कोई तराज़ू नहीं लेकिन फिर भी किसी का चेहरा किसी की ऑंखें इनको बयान कर ही देतीं हैं। वैसे तो ऑंख के आंसू अक्सर ग़म की पहचान होते हैं लेकिन कहते हैं ऑंख में ख़ुशी के आंसू भी होते हैं। जब कोई किसी से मिलकर खुश होता है तो हंसता है-मुस्कुराता है लेकिन जब कोई किसी से मिलकर रो देता है तो समझो के उसे सच्ची...

गुस्सा:

जो बात-बात पे गुस्सा करता है बीमार सा लगता है और जो गलत बात पे भी गुस्सा नहीं करता बुज़दिल सा लगता है और जो अपने गुस्से पे काबू ही नहीं कर पाता वो कमज़ोर सा लगता है। किसी पे गुस्सा होना और किसी से गुस्सा होने में कितना फर्क होता है, जब कोई किसी पे गुस्सा करता है तो बहुत शोर होता लेकिन जब कोई किसी से गुस्सा हो जाता है तो कितनी ख़ामोशी होती है। किसी पे गुस्सा होने के बाद इंसान बोलता ही जाता है और किसी से गुस्सा होने के बाद कुछ बोलना ही नहीं चाहता। वैसे तो ख़ामशी अक्सर अच्छी  लगती है लेकिन जब ख़ामोशी किसी से गुस्सा हो जाने की वजह से हो तो वो ख़ामोशी भी बहुत शोर करती है। कहते हैं के गुस्से में अक्ल काम नहीं करती और जो हर वक़्त गुस्से में रहता है वो तो अक्ल से काम ही नहीं करता होगा। गुस्से में कुछ बोलने से बेहतर है के खामोश रहा जाए क्यों के मुंह से निकली हुई बात बहुत दूर चली जाती है चाहे वो गुस्से में ही क्यों न बोली गयी हो। Ishrat Alig

जुनून:

किसी से दिलचस्पी कब प्यार में बदल जाए पता ही नही चलता ओर प्यार कब मोहब्बत बन जाए कोन जाने, मोहब्बत बढ़ जाए तो दीवानगी बन जाए और दीवानगी हद से गुज़र जाए तो इश्क़ बन जाए लेकिन जब इश्क़ हद से गुजरता है तो जुनून बन जाता है। इश्क़ अपने आपमें एक बगावत है, ये रस्मों को तोड़ता है, नई कहानियां लिखता है, नए रास्ते बनाता है, नई मंज़िलें क़ायम करता है, खुद को भूल जाता है बस अपनी चाहत को याद रखता है। लोग कहते हैं जिसे इश्क़ हो जाता है वो किसी काम का नही रहता, ये तो बस कोई दीवानों से पूछे के  मोहब्बत से बड़ा काम और क्या होता है। ये कमाल तो इश्क़ का ही है वरना इतना आसान नही है किसी की चाहत में अपनी हस्ती को फना कर देना। Ishrat Alig