ख़ुशी और ग़म दो ऐसे लफ्ज़ हैं जो हर एक की ज़िन्दगी से जुड़े हैं-चाहें कोई कितना भी दौलतमंद हो कोई ना कोई ग़म उसकी ज़िन्दगी में मिल ही जाएगा और गरीबो के पास भी कोई ना कोई ख़ुशी मिल जाती है। खुशियाँ किसी दूकान पर नहीं मिलतीं और ना इनको तोलने का कोई पैमाना होता है, अगर खुशियाँ बिकतीं तो महंगाई के इस दौर में इनकी क़ीमत भी खूब होती -इनके भी अपने अलग तराज़ू होते, रईसों के घर खुशियों से भरे होते और गरीबी शायद इससे महरूम ही रहती। किसी का हंसना या मुस्कुराना ख़ुशी की दलील नहीं और ऑंख के आंसू ग़म की पहचान नहीं तो फिर ये ख़ुशी और ग़म क्या हैं। क्या ख़ुशी और ग़म महज़ एक एहसास हैं जो मिलने को किसी की एक बात से ही मिल जाते हैं और ना मिलने को कोई दुनिया की दौलत भी क़दमों में डाल दे तो नहीं मिलते। यक़ीनन इनकी कोई तराज़ू नहीं लेकिन फिर भी किसी का चेहरा किसी की ऑंखें इनको बयान कर ही देतीं हैं। वैसे तो ऑंख के आंसू अक्सर ग़म की पहचान होते हैं लेकिन कहते हैं ऑंख में ख़ुशी के आंसू भी होते हैं। जब कोई किसी से मिलकर खुश होता है तो हंसता है-मुस्कुराता है लेकिन जब कोई किसी से मिलकर रो देता है तो समझो के उसे सच्ची...
Life is what you think. Someone is smiling in pain and someone is worry in pleasure. Someone is happy on footpath and someone is moaning in palace. Life stops when you stop, it starts when you walk, and it runs when you enjoy. People say books are best friends of human because they never abandon you unless you abandon them.