जो बात-बात पे गुस्सा करता है बीमार सा लगता है और जो गलत बात पे भी गुस्सा नहीं करता बुज़दिल सा लगता है और जो अपने गुस्से पे काबू ही नहीं कर पाता वो कमज़ोर सा लगता है।
किसी पे गुस्सा होना और किसी से गुस्सा होने में कितना फर्क होता है, जब कोई किसी पे गुस्सा करता है तो बहुत शोर होता लेकिन जब कोई किसी से गुस्सा हो जाता है तो कितनी ख़ामोशी होती है। किसी पे गुस्सा होने के बाद इंसान बोलता ही जाता है और किसी से गुस्सा होने के बाद कुछ बोलना ही नहीं चाहता।
वैसे तो ख़ामशी अक्सर अच्छी लगती है लेकिन जब ख़ामोशी किसी से गुस्सा हो जाने की वजह से हो तो वो ख़ामोशी भी बहुत शोर करती है।
कहते हैं के गुस्से में अक्ल काम नहीं करती और जो हर वक़्त गुस्से में रहता है वो तो अक्ल से काम ही नहीं करता होगा।
गुस्से में कुछ बोलने से बेहतर है के खामोश रहा जाए क्यों के मुंह से निकली हुई बात बहुत दूर चली जाती है चाहे वो गुस्से में ही क्यों न बोली गयी हो।
किसी पे गुस्सा होना और किसी से गुस्सा होने में कितना फर्क होता है, जब कोई किसी पे गुस्सा करता है तो बहुत शोर होता लेकिन जब कोई किसी से गुस्सा हो जाता है तो कितनी ख़ामोशी होती है। किसी पे गुस्सा होने के बाद इंसान बोलता ही जाता है और किसी से गुस्सा होने के बाद कुछ बोलना ही नहीं चाहता।
वैसे तो ख़ामशी अक्सर अच्छी लगती है लेकिन जब ख़ामोशी किसी से गुस्सा हो जाने की वजह से हो तो वो ख़ामोशी भी बहुत शोर करती है।
कहते हैं के गुस्से में अक्ल काम नहीं करती और जो हर वक़्त गुस्से में रहता है वो तो अक्ल से काम ही नहीं करता होगा।
गुस्से में कुछ बोलने से बेहतर है के खामोश रहा जाए क्यों के मुंह से निकली हुई बात बहुत दूर चली जाती है चाहे वो गुस्से में ही क्यों न बोली गयी हो।
Ishrat Alig
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