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तलब:

अगर किसी को कुछ खाने की तलब हुई है तो ज़रूरी नहीं के उसे भूख लगी है, हो सकता है के खाना तो उसने वक़्त पे खा लिया हो लेकिन बस बेवक़्त कुछ खाने को दिल चा-रहा हो। भूख लगे और कुछ न मिले तो इंसान बर्दाश्त कर सकता है लेकिन अगर खाने की तलब हो तब कुछ ना मिले तो बर्दाश्त करना मुश्किल होता है।
वैसे तो अक्सर कुछ खाने की ही तलब होती है लेकिन कभी-कभी खाने को तो बहुत कुछ होता है लेकिन भूख नहीं होती तो ऐसे में भूख की तलब होती है।
कभी कोई किसी को तलब कर लेता है तो कभी खुद तलब हो जाता, कभी हमें तलब तो कभी हम-तलब तो कभी गौर-तलब।

क्या तलब का कोई पैमाना है, अगर तलब सिर्फ एहसास है तो क्या लफ्ज़ एहसास को बयान कर सकते हैं या फिर लफ्ज़ एहसास पैदा करते हैं।
अब तो यह पीने वाला ही बता सकता है के वह जाम देखता है या पैमाना देखता है या साक़ी को देखता है या फिर मैयखाना देखकर पीता है या फिर बस पीने की तलब होने पे सब कुछ भूल जाता है।

Ishrat Alig

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