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गुफ़्तगू:

~ क्या लफ्ज़ो की बारिश का नाम ही गुफ़्तगू है या फिर बरसते हुए लफ्ज़ो को पकड़ना गुफ़्तगू है। वैसे तो अक्सर गुफ़्तगू में आवाज़ का होना लाज़िम समझा जाता है लेकिन कभी-कभी कोई आवाज़ किसी गिफ्तगु को खराब भी कर देती है, कभी आवाज़ के ना होने पर कोई गुफ़्तगू समझ में नहीं आती तो कभी कोई आवाज़ किसी गुफ़्तगू में खलल पैदा कर देती है। वैसे तो बोल-चाल का नाम ही गुफ़्तगू है लेकिन कभी यह बोल-चाल ही किसी खामोश गुफ़्तगू को तोड़ देती है। यह गुफ़्तगू किसी के लिए कोई पैग़ाम है तो किसी के लिए इनाम। कभी कोई गुफ़्तगू किसी का दिल बहलाती है तो कभी किसी की दिलाज़ारी करती है, कहीं दिलों को जोड़ती है तो कहीं दिलों को तोड़ देती है, यह कभी मोहब्बत है तो कभी नफ़रत है।

अगर कोई पूछे के गुफ़्तगू क्या है तो कहूं-चेहरे की मुस्कुराहट गुफ़्तगू है, हाथ का इशारा गुफ़्तगू है, नज़र का शर्माना गुफ़्तगू है, कभी आँख के आंसू गुफ़्तगू हैं तो कभी खामोश रहना गुफ़्तगू है, कभी किसी के नज़दीक बैठना गुफ़्तगू है तो कभी किसी से दूर हो जाना गुफ़्तगू है, कभी ख़त लिखना गुफ़्तगू तो कभी ख़त पड़ना गुफ़्तगू, कभी किसी से बात करना गुफ़्तगू है तो कभी कोई बात ना करना ही गुफ़्तगू है, कभी कोई तस्वीर कुछ गुफ़्तगू करती है तो कभी बिखरे हुए अलफ़ाज़ कुछ कह जाते हैं।
गुफ़्तगू करने का हर एक का अपना अलग अंदाज़ होता है, कोई अपने लबो की हरकत के लिए जाना जाता है तो कोई अपने इशारों के लिए, कोई शर्म की वजह से गुफ़्तगू नहीं कर पाता तो किसी की गुफ़्तगू में शर्मो-हया नाम की कोई चीज़ ही नहीं। कोई किसी के पास है तो गुफ़्तगू करता है तो कोई किसी से दूर उसकी गुफ़्तगू को याद करता है, कोई अपनी गुफ़्तगू से किसी का दिल जीत लेता है तो कोई गुफ़्तगू के कारन ही जीती हुई बाज़ी हार जाता है। किसी को अपनी गुफ़्तगू पे नाज़ है तो किसी को उसकी इस गुफ़्तगू से शिकायत, कभी दलीलों की कमी गुफ़्तगू को रोकती है तो कभी अलफ़ाज़ की कमी इसे अधूरा कर देती है, कोई बात कहने में माहिर है तो लिखने में दिग्गज है।

किसी की गुफ़्तगू के बोल इतने मीठे हैं के वो ख़ुशी के नगमें बन जाते हैं तो किसी के बोल इतने कड़वे हैं के वो जंग का बिगुल बजा देते हैं।
वह गुफ़्तगू ही क्या जहाँ बोलने वाला तो बहुत अच्छा हो लेकिन सुनने वाला कोई नहीं, जहाँ लिखने वाला तो हो लेकिन पड़ने वाला कोई नहीं, वह गुफ़्तगू ही क्या जहाँ कहा तो बहुत कुछ जाए लेकिन समझा कुछ भी ना जाए। कभी हज़ारों अलफ़ाज़ भी किसी गुफ़्तगू को मुकम्मल नहीं कर पाते और कभी किसी की नज़र का एक इशारा भर ही पूरी दास्ताँ बयां कर देता है।


Ishrat Alig

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