Skip to main content

एक ख्याल:

इस ज़मीन से आसमान नज़र आता है मुझे। इसमें चाँद, सितारे, जुगनू सब थे, कहाँ गए। सूरज की इस रौशनी ने इनको ख़त्म कर दिया है या ये खुद ही इससे शरमा के कहीं छुप गए हैं। क्या इसी बात पे ये सूरज इतना इतरा रहा है। क्या इसको नहीं मालूम के शाम होते ही इसकी रौशनी ख़त्म हो जायेगी और लोग चाँद की तरफ मोहब्बत भरी नज़रों से देखेंगे। चाँद की रौशनी सूरज की तरह दुनिया की हर शय को तो रोशन नहीं करती लेकिन ये क्या कम है लोग चाँद का पीछा करते हैं, इसको टकटकी बांधकर देखते हैं। सितारों भरी रात भी चाँद के बिना सूनी नज़र आती है। एक सितारा जो चाँद के आस पास रहता है ये सोच कर कितना खुश होता है के लोग सब सितारों को छोड़कर इसी की तरफ देख रहे हैं और खुश भी क्यों ना हो इसको चाँद के साथ रहने का शरफ जो हासिल हुआ है। ये कितना उदास था जब चाँद नहीं निकला था और चाँद की तलाश में लोग दूसरे सितारों की तरफ देख रहे थे। ये अनोखा सितारा अनगिनत सितारों में कहीं खो-कर रह गया था और जब चाँद निकला तो ये उन लोगों से भी ज़्यादा खुश था जो चाँद को देख कर ईद मना रहे थे। सितारों भरी इस रात में दिन की कोई कमी तो महसूस नहीं होती लेकिन दिन का उजाला भी ज़रूरी है ज़िन्दगी को आगे बढ़ाने के लिएं।
आज तो चाँद भी अपने उरूज़ पर है कोई चराग जलाने की भी ज़रुरत नहीं। चौदहवीं का ये चाँद कितने अफसानों की याद दिलाता है, कितनी कहानियाँ इसके नाम से शुरू होतीं हैं, इसकी चांदनी में कितनी ठण्डक है।

ये चाँद चल रहा है और रात के मुसाफिर इस मंज़र को रूककर देख रहे हैं, ये मुसाफिर इस खुशगवार मंज़र को देखकर अपनी मंज़िल को ही भूल बैठे हैं। ये चाँद चल रहा है और ना जाने कितनी नज़रें इसके पीछे दौड़ रही हैं।
आज की रात भी अजीब है, ना चाँद है ना सितारे। चारों तरफ घने बादल छाये हुए हैं। ऐसा लगता है जैसे ये तूफ़ान से पहले का मंज़र हो। जैसे इस ख़ामोशी को तूफ़ान के गुज़र जाने का इंतज़ार हो। क्या ये आने वाला तूफ़ान इन जुगनूओं को भी उड़ा ले जायेगा जो सितारों की कमी को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं। क्या ये जुगनू किस हादसे का शिकार हो जायेंगे। ये चराग जो परवानों का दिल बहला रहा है तूफ़ान के आते ही बुझ जाएगा और इन परवानों की ये ज़िद अधूरी ही रह जायेगी की इसकी रौशनी में फ़ना हो जाएं। ये आने वाला तूफ़ान कितने दिलों को तोड़ेगा, कितने बसेरों को उजाड़ेगा। रात के मुसाफिर भी अपना रास्ता भटक जाएंगें। उस बाग़ का माली भी ये सोच कर उलझन में है के तूफ़ान के बाद इसका बाग़ कैसा होगा। इसके फल फकने से पहले ही गिर जाएंगे। ये कलियाँ जो फूल बनने को हैं ऐसे ही झड़ जाएँगी। ना जाने आज कितने परिंदों का बसेरा उजड़ जायेगा। ये परिंदे अपने घोंसलों की तलाश में कहाँ-कहाँ भटकेगें। एक पेड़ से दूसरे पेड़ का चक्कर लगाएंगे। आज की रात कैसे गुज़रेगी और दिन कैसे निकलगे। क्या आने वाला सवेरा उसी तरह चिड़यों की चेचाहहट के साथ शुरू होगा या फिर चारों तरफ बिखरे हुए बिखरे हुए फूल, टूटी हुई डालियाँ, और उदास पंछी होंगे। कितना मुश्किल होगा फिर से एक नयी शुरूआत करना, उजड़े हुए आशियां को फिर से अबाद करना।

Ishrat Alig.

Comments

Popular posts from this blog

सवाल-जवाब:

 ~  मैं यह सोचता हूँ कि ये सवाल-जवाब क्या हैं? क्या हर सवाल का जवाब मिल सकता है? क्या हर सवाल का जवाब दे देना चाहिए? क्या किसी को हर सवाल पूछ लेना चाहिए? क्या किसी का सवाल दूसरे का जवाब नहीं हो सकता? क्या किसी के जवाब से सवाल पैदा नहीं होते? क्या कभी किसी सवाल का जवाब न देने में ही उसका जवाब छुपा होता है? क्या कोई जवाब सवाल से भी अच्छा हो सकता है? या ये सवाल ही है जो जवाब को अच्छा बना देता है? अगर सवाल इतना अच्छा है तो इसका जवाब ही क्यों दया जाए? क्यूँ न ऐसे सवाल को ला-जवाब रखा जाए? क्या जवाब के मिल जाने से सवाल की एहमियत कम हो जाती है? या फिर जवाब न देने पर सवाल की क़दर ख़त्म हो जाती है? क्या कोई सवाल ऐसा हो सकता है जिसका कोई जवाब ना हो? क्या कोई जवाब ऐसा दे सकता है जिसपे कोई सवाल न हो? क्या हमारी ज़िंदगी सवालों और जवाबों के सिवा कुछ भी नहीं? क्या यह ज़िंदगी खुद एक सवाल है? क्या मौत ही इस ज़िंदगी का जवाब ह? जब ये ज़िन्दगी-मौत ही सवाल-जवाब हैं तो हम इसे लेकर इतने परेशान क्यों हैं? कोई किसी जवाब की तलाश में है तो कोई किसी सवाल से दूर हो जाना चाहता है, किसी के पास सवाल करने का हुन...

क़ानून-ऐ-क़ुदरत:

इस दुनिया के ये कैसे क़ानून हैं, के यहाँ जब एक मर्द धोका खाता है तो वो मिलता है किसी मैख़ाने में, वीराने में, किसी मंदिर या किसी मस्जिद में, या फिर किसी आश्रम में। लेकिन जब एक औरत धोखा खाती है तो वो मिलती है किसी तवायफ के कोठे पे, ज़माने की ठोकरों में, या फिर जीतेजी एक जहन्नुम में। कहते हैं सब कुछ बदल गया, दुनिया बदल गयी, ज़माना बदल गया, इंसान के तौर-तरीके बदल गए, इंसानी साज़-ओ-सामान बदल गया। हाँ बदला तो बहुत कुछ है लेकिन क्या इन्साफ बदल सकता है, क्या क़ातिल मज़लूम बन सकता है, क्या राक्षस को देवता कह सकते हैं, क्या जान लेने वाला जान बचाने वाले से बड़ा बन सकता है। ये इंसान के बनाये हुए कानून हैं, जो बदलते रहते हैं। ऐसा हर कानून ख़त्म हो जायेगा जो क़ानून-ए-क़ुदरत के खिलाफ बनेगा। और ऐसे कानून को एक दिन खत्म होना ही होगा। इंसानी तारीख ने न जाने कितने ऐसे क़ानून देखे हैं। कभी चिताओं में जलती हुई ज़िंदा औरतें, सरे-बाज़ार बिकते हुए लोग, पैदा होते ही दफ़न होती हुई मासूम बच्चियाँ,सफ़ेद कपड़ों में लिपटी हुईं ज़िंदा देवियां, इंसान की कमर से बंधी हुई झाड़ूएं, एक ख़ास तबके के लिए इबादतगाह के बंद दरवाजे। ये सब यह...

तस्वीर और अल्फ़ाज़:

जब भी किसी तस्वीर को देखता हूँ तो ज़ेहन में कुछ अल्फ़ाज़ आ जाते हैं, ऐसा महसूस होता है जैसे तस्वीर ने ही कुछ कहा हो, जैसे तस्वीर बात कर रही हो। फिर ये ख्याल आता है कोई और इसको देखेगा तो कुछ और ही सोचेगा। अगर ये तस्वीर बोलती है तो कुछ और ही सुनेगा। कुछ लोग ये दावा करते हैं के वो तस्वीर को पढ़ना जानते हैं, तो हर पड़ने वाला कुछ अलग ही पड़ेगा। कहते हैं के लिखे हुए अल्फ़ाज़ को तो सब पड़ लेते हैं लेकिन तस्वीर पे तो कुछ भी नहीं लिखा फिर लोग इसे कैसे पड़ते हैं। फिर इस बात का ख्याल आता है के लिखे हुए को पड़ तो सब लेते हैं पर ज़रूरी नहीं सब समझ भी लेते हों। तस्वीर को देखते तो सभी हैं पर ज़रूरी नहीं सब इसे पड़ भी लेते हों। हर तस्वीर बनाने वाला यही सोचता होगा के उसकी तस्वीर यादगार बन जाए और इससे भी ज़्यादा ये सोचता होगा के कोई इसको समझे और बताये यह तस्वीर क्या कहती है, क्या दास्तान बयां करती है। तस्वीर पे ना कुछ लिखा होता है न इसकी कोई ज़ुबाँ होती है फिर भी हर पड़ने वाला इसको पड़ लेता है। यहाँ कोई चेहरे को तस्वीर की शक्ल देना चाहता है तो कोई तस्वीर को लफ़्ज़ों में उतारना चाहता है, कोई नयी तस्वीर बनाना चाहता है त...