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मंज़िल और मुसाफिर:

कहते हैं के ज़िन्दगी एक सफर है, हर सफर की एक मंज़िल होती है, अगर ज़िन्दगी सफर है तो इसकी भी कोई मंज़िल होगी? अगर हम सब मुसाफिर हैं तो फिर हमारी मंज़िल क्या है?
किसी के सामने कोई मंज़िल है तो किसी के सामने सिर्फ रस्ते ही रास्ते हैं। कोई किसी मंज़िल की तलाश में है तो कोई नया रास्ता ढूंढ़ता है l
किसी रास्ते पर क़दमों के निशान मिलते हैं तो किसी रास्ते पर पहली बार चलना पड़ता है। कभी कोई पुल बनाना पड़ता है तो कभी कोई कश्ती बनानी पड़ती है। कभी रास्ते के पत्थर हटाने पड़ते हैं तो कभी कोई मकान बनाना पड़ता है तो कभी कोई दीवार गिरनी पड़ती है। कभी लहरों से झूझना तो कभी किनारों की तलाश करना। कभी किसी तूफान का सामना तो कभी रास्तों की भूलभुलैया में खो-जाना।
कभी किसी काफले के साथ तो कभी अकेले ही चलना। कभी किसी रहबर की तलाश तो कभी किसी रेहज़न का डर। कभी सख्त धूप तो कभी अँधेरी रातों के सन्नाटे, कभी प्यास की शिद्दत तो कभी खाने की तलब, कभी पैरों की थकन तो कभी किसी की याद में उदासी।
यहाँ कोई रास्तों से अंजान है तो कोई मंज़िल से बेख़बर। कोई रास्ते बदलता है तो कोई मंज़िल ही बदल लेता है। किसी को ठहरना अच्छा नहीं लगता तो किसी को चलना गवारा नहीं। किसी के लिए मंज़िल एहम है तो किसी के लिए रास्ता। किसी के सामने मंज़िल तो है पर कोई रास्ता नहीं।

ज़िन्दगी का ये सफर कितना कुछ सिखाता है, अपनों से दूर रहना सिखाता है तो गैरों को अपना बनाना सिखाता है, आँसुओं को छुपाना सिखाता है और गम में मुस्कुराना सिखाता है, गिरना सिखाता है और गिरकर उठना सिखाता है। वक़्त के सांचे में ढलना सिखाता है तो वक़्त के सांचे बनाना सिखाता है। सरे राह आ जाए गर याद किसी की तो यादों को याद बनाना सिखाता है। रास्ते के पत्थर उठाना सिखाता है और मील का पत्थर बनाना सिखाता है। कुछ पाना सिखाता है तो खोना भी सिखाता है।   ----------------- >आगे जारी
वैसे तो अक्सर रास्ते मंज़िल का पता बताते हैं लेकिन कुछ रास्तों को देखकर किसी मुसाफिर की याद आती है, जो पहली बार इससे गुज़रा था।
हर चीज़ सफर में है और अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रही है। कभी-कभी मुसाफिरों के रास्ते एक होते हुए भी मंज़िले अलग होती हैं। किसी ने कहीं पड़ाव डाला और वहीँ का हो गया तो किसी ने सिर्फ क़याम किया और आगे बढ़ गया। कभी-कभी कोई जाता कहीं ओर है और पहुँच कहीं ओर ही जाता है। हर एक को मंज़िल नहीं मिलती, न जाने कितने मुसाफिर रास्ते में ही खो कर रह जाते हैं। कभी कोई सफर किसी को किसी के पास ले आता है तो कभी किसी को किसी से दूर ले जाता है, किसी को मंज़िल की ओर ले जाता है तो किसी को मंज़िल से दूर ले जाता है। रास्ते गलत नहीं होते बस मक़सद सही होना चाहिए, एक ही रास्ते से लुटरे भी जाते हैं और सिपाही भी बस फर्क है तो मक़सद का। कोई किसी की मोहब्बत में कोई सफर करता है तो कोई किसी की नफरत में।
वैसे तो मुसाफिर की पहचान उसका रास्ता होता है लेकिन यह भी कम नहीं के वो पहुंचा कसी मंज़िल पे। कुछ रास्ते सिर्फ चलने के लिए होते हैं वो किसी मंज़िल की ओर नहीं जाते।
कभी कभी ऐसा लगता है के ये ज़िन्दगी का सफर कैसा सफर है, सफर कहीं ओर तो मंज़िल कहीं ओर, तामीर कहीं ओर तो घर कहीं ओर, ख्याब कहीं ओर तो हक़ीक़त कहीं ओर, हसरत कहीं ओर तो दीदार कहीं ओर, खता कहीं ओर तो सज़ा कहीं ओर, दुआ कहीं तो जज़ा कहीं ओर, दर्द कहीं ओर तो मरहम कहीं ओर, जुदाई कहीं ओर तो मिलन कहीं ओर, बन्दग़ी कहीं ओर तो रब कहीं ओर।

एक मिसफिर जो एक अरसे से सफर में है, आज मायूसी के आलम में पीछे मुड़कर देखता है और सोचता है के वो क्यों अपनों से दूर जा रहा है, पता नहीं उसे मंज़िल मिलेगी भी या नहीं, वो वापस लोट सकेगा या नहीं, फिर अपनों से मिल सकेगा या नहीं, एक बार को सोचता है के चल वापस लौट चल। जब गोर से पीछे मुड़कर कर देखता है तो एहसास होता के उसके लिएं वापसी का रास्ता बंद हो चूका है, आगे बढ़ना उसकी ज़रूरत भी है और मज़बूरी भी। वो देखता है के ये रास्ता कभी किसी मुसाफिर से शिकायत नहीं करता, हर एक के क़दमों को खुशामदीद कहता है, फिर क्यों हम मुसाफिर रास्ते की ज़रा सी तकलीफ से ही परेशान हो जाते हैं। फिर वो बदलते मौसमों के साथ आगे बढ़ता चला जाता है। काफिले बदले, हमराह बदले, कई मोड़ आए लेकिन उसने अपना रास्ता नहीं बदला। जब वो मंज़िल को हासिल करता है तो वो पाता है के हर कोई उसकी मंज़िल की ही बात करता रहा है, कोई सफर की परेशानियों तकलीफों को नहीं पूछ रहा। जिस मंज़िल के लिए उसने बहुत लंबा सफर तय किया, वहां पहुँच कर वो सोचता है तो गुज़रे हुए सफर के बारे में, शायद वो तो किसी रास्ते को भूल भी गया हो लेकिन उसके क़दम सारा हिसाब रखे हुए हैं। आज उसके पास रास्ता भी है, मंज़िल भी है, हमसफ़र भी है और एक सुहाना सफर भी। अब उसको रास्तों से शिकायत नहीं अब वो फिर से एक नयी मंज़िल की तलाश में है, वो एक नया कारवां बनाना चाहता है, जहाँ हर एक मुसाफिर रहबरी करे, जो बहुत से मुसाफिरों की मंज़िल हो, जो वक़्त के साथ चलता ही जाए, जिसकी कोई मंज़िल न हो जो खुद एक मंज़िल हो।

ज़िन्दगी चलने का नाम है अगर रुक जाये तो ज़िन्दगी ज़िन्दगी नहीं। सफर में ज़िन्दगी गुज़रती है और सफर में ही जी जाती है। ज़िन्दगी भर मंज़िल की तलाश करते रहे बड़ी देर से जाना के ज़िन्दगी की मंज़िल तो सफर ही है। कभी तो ये सफर कटता नहीं था अब पलट के देखा तो ऐसा लगता है जैसे पलक झपकते ही गुज़र गया।
ज़िन्दगी सफर है और सफर में झटके तो लगते ही हैं, बर्दाश्त कर लेने चाहिएं, क्या हर एक बात पे शिकायत करना।

Ishrat Alig

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