Skip to main content

ख़्वाब और हक़ीक़त:

यूँ तो ख़्वाब अक्सर सोने के बाद आते हैं लेकिन कुछ ख़्वाब हैं जो सोने ही नहीं देते। ख़्वाब वो भी हैं जो खुली आँखों से देखे जाते हैं और ख्वाबों वो भी हैं जो आँख लगने के बाद आते हैं। कुछ ख़्वाब याद ही नहीं रहते तो कुछ ख़्वाब हैं जो भुलाये ही नहीं जाते। कुछ ख़्वाब हक़ीक़त बन जाते हैं तो कुछ ख़्वाब ख़्वाब ही रह जाते हैं। कुछ ख़्वाब साथ चलते रहते हैं तो कुछ ख़्वाब साथ छोड़ जाते हैं। कभी ख़्वाब में कोई ख़्वाब नज़र आता है तो कभी हक़ीक़त ही ख़्वाब बन जाती है। कभी कोई हक़ीक़त ख्वाबों को ख़त्म कर देना चाहती है तो कभी कोई ख़्वाब हक़ीक़त को बदल देना चाहता है। कोई हर रोज़ नए ख़्वाब देखता है तो कोई अपने एक ही ख़्वाब के साथ ज़िन्दगी गुज़ार देना चाहता है। कभी कोई हक़ीक़त किसी से रुठ जाती है तो कभी किसी के ख्वाबों को नज़र लग जाती है। कोई आने वाले कल के ख्वाब देख रहा है तो कोई गुज़रे वक़्त के ख्वाबों में डूबा हुआ है। कोई किसी ख़्वाब से परेशान है तो कोई किसी हक़ीक़त से बेदार हो चूका है। किसी के पास कोई ख़्वाब ही नहीं हैं तो किसी से कोई हक़ीक़त बहुत दूर है।

कभी कोई ख़्वाब आने वाले कल की पेशगोई करता है तो कभी कोई हक़ीक़त किसी ख़्वाब की याद दिलाती है। कभी ख्वाबों की दुनिया एक पुर-असरार दुनिया है तो कभी बिलकुल हक़ीक़त जैसी। कोई अपने किसी ख़्वाब के पूरा होने की दुआ करता है तो कोई अपने किसी ख़्वाब के पूरा होने से डरता है।
किसी को रात के ख़्वाब परेशान करते हैं तो किसी को दिन की हक़ीक़त सताती है। कभी किसी को हक़ीक़त ख़्वाब देखने नहीं देती तो कभी किसी को कोई ख़्वाब उसे हक़ीक़त से दूर कर देता है। कोई ख्वाबों से हक़ीक़त को पहचानता है तो कोई हक़ीक़त को देखकर सारे ख़्वाब भूल जाता है। किसी की ज़िन्दगी में हक़ीक़त के जलवे हैं तो कहीं ख्वाबों की पेश्क़दमी है।

कहने को तो ख़्वाब हक़ीक़त की ख्वाहिशों का नतीजा हैं लेकिन कुछ ख़्वाब तो हक़ीक़त से बिलकुल जुदा हैं।
ये हक़ीक़त कितना शोर करती रहती है और ख़्वाब ख़ामोशी से ही सब कुछ कह जाते हैं। इन सितारों को तो हक़ीक़त भी दिखाती है लेकिन ये ख़्वाब हैं जो इनकी सैर भी कराते हैं, जो एक कहकशाँ से दूसरी कहकशाँ का चक्कर लगवाते हैं। हम सोना शुरू करते हैं और ख़्वाब जागने लगते हैं, कभी कोई हमारे ख्वाबों में आता है तो कभी हम किसी का ख्वाब बन जाते हैं।
कोन कहता है के आँखें बंद करके कुछ दिखाई नहीं देता, आँखों में ख़्वाब होने चाहिएं फिर वो भी दिखाई देता है जो खुली आँखों से भी नज़र नहीं आता। कोई कहता है के ख्वाब देखने वाले हक़ीक़त से दूर रहते हैं, ना जाने क्यों ऐसा लगता है के ख्वाब देखने वाले हक़ीक़त को ज़्यादा नज़दीक से देखते हैं।
इस शहर की एक बस्ती में एक ख़्वाब फरोश रहता है, कोई आए और ख़्वाब ख़रीदे उससे फिर भूल जाए के ज़माने की हक़ीक़त क्या थी। उसके दर्द भरे ख़्वाब भी अजीब सा सुकून देते हैं, कोई दर्दमंद इन्हें देखे तो दर्द भूल जाए अपना और कोई खुशगवार इन्हें देखे तो उस दर्द को अपना ले, कोई लाचार-बेबस इन्हें देखे तो शिकवे छोड़ दे अपने।
रात नींद के एक हिस्से में चुपके से फिर वही ख़्वाब आया। फिर गुज़रा हुआ वक़्त ख़्वाब बनकर आया और दिल ज़िद करने लगा के फिर उसी हक़ीक़त में लोट चल, वो हक़ीक़त जो अब सिर्फ एक ख़्वाब है और शायद ख़्वाब ही रहेगी। कोई तर्जुमान आए और बताए के इस ख़्वाब की हक़ीक़त क्या है, यह ख़्वाब खुद को दोहराता क्यों है, समझाए इस दिल को के बीते हुए दिनों को इतना याद क्या नहीं करते है और बताए इसको गुज़रे दिन लोट कर आया नहीं करते।

पिंजरे में क़ैद एक परिंदा हर रोज़ ख्वाबों की उड़ान भरता है और ख़्वाब देखता है के वो एक दिन आज़ाद हो जाएगा और फिर से खुले आसमान में उड़ेगा, वो सोचता है के वो सब परिंदों को पीछे छोड़ देगा और आसमानों से आगे निकल जायेगा। एक दिन यह परिंदा हक़ीक़त के सामने उदास हो जाता है और अपने सारे ख़्वाब छोड़ देता है, अब इसकी हालत उस परिंदे की मानिंद है जिसके पर काट दिए गए हों जो कभी उड़ नहीं पाएगा। अब इसने ख्वाबों में जीना छोड़ दिया है और इसी हक़ीक़त में मरने का फैसला कर लिया है।अब यह ना आज़ाद परिंदो को देखता है और ना आसमान की तरफ नज़र उठाता है। हक़ीक़त तो आज भी वही है लेकिन कितना फ़र्क़ है जब इस हक़ीक़त में ख़्वाब नहीं।

यूँ तो ज़िन्दगी में हम हक़ीक़त के हर मोड़ पर ख़्वाब देखते रहते हैं और कभी-कभी ख़्वाब और हक़ीक़त के दरमियान फर्क करना भी मुश्किल हो जाता है। लेकिन जब ये ज़िन्दगी गुज़र जाती है तो एहसास होता है के ये ज़िन्दगी महज़ एक ख़्वाब थी जो एक पल ठहरी और ख़त्म हो गयी, जैसे नींद से जागे हों और अब असल हक़ीक़त की शुरुआत होनी है।

Ishrat Alig

Comments

Popular posts from this blog

सवाल-जवाब:

 ~  मैं यह सोचता हूँ कि ये सवाल-जवाब क्या हैं? क्या हर सवाल का जवाब मिल सकता है? क्या हर सवाल का जवाब दे देना चाहिए? क्या किसी को हर सवाल पूछ लेना चाहिए? क्या किसी का सवाल दूसरे का जवाब नहीं हो सकता? क्या किसी के जवाब से सवाल पैदा नहीं होते? क्या कभी किसी सवाल का जवाब न देने में ही उसका जवाब छुपा होता है? क्या कोई जवाब सवाल से भी अच्छा हो सकता है? या ये सवाल ही है जो जवाब को अच्छा बना देता है? अगर सवाल इतना अच्छा है तो इसका जवाब ही क्यों दया जाए? क्यूँ न ऐसे सवाल को ला-जवाब रखा जाए? क्या जवाब के मिल जाने से सवाल की एहमियत कम हो जाती है? या फिर जवाब न देने पर सवाल की क़दर ख़त्म हो जाती है? क्या कोई सवाल ऐसा हो सकता है जिसका कोई जवाब ना हो? क्या कोई जवाब ऐसा दे सकता है जिसपे कोई सवाल न हो? क्या हमारी ज़िंदगी सवालों और जवाबों के सिवा कुछ भी नहीं? क्या यह ज़िंदगी खुद एक सवाल है? क्या मौत ही इस ज़िंदगी का जवाब ह? जब ये ज़िन्दगी-मौत ही सवाल-जवाब हैं तो हम इसे लेकर इतने परेशान क्यों हैं? कोई किसी जवाब की तलाश में है तो कोई किसी सवाल से दूर हो जाना चाहता है, किसी के पास सवाल करने का हुन...

क़ानून-ऐ-क़ुदरत:

इस दुनिया के ये कैसे क़ानून हैं, के यहाँ जब एक मर्द धोका खाता है तो वो मिलता है किसी मैख़ाने में, वीराने में, किसी मंदिर या किसी मस्जिद में, या फिर किसी आश्रम में। लेकिन जब एक औरत धोखा खाती है तो वो मिलती है किसी तवायफ के कोठे पे, ज़माने की ठोकरों में, या फिर जीतेजी एक जहन्नुम में। कहते हैं सब कुछ बदल गया, दुनिया बदल गयी, ज़माना बदल गया, इंसान के तौर-तरीके बदल गए, इंसानी साज़-ओ-सामान बदल गया। हाँ बदला तो बहुत कुछ है लेकिन क्या इन्साफ बदल सकता है, क्या क़ातिल मज़लूम बन सकता है, क्या राक्षस को देवता कह सकते हैं, क्या जान लेने वाला जान बचाने वाले से बड़ा बन सकता है। ये इंसान के बनाये हुए कानून हैं, जो बदलते रहते हैं। ऐसा हर कानून ख़त्म हो जायेगा जो क़ानून-ए-क़ुदरत के खिलाफ बनेगा। और ऐसे कानून को एक दिन खत्म होना ही होगा। इंसानी तारीख ने न जाने कितने ऐसे क़ानून देखे हैं। कभी चिताओं में जलती हुई ज़िंदा औरतें, सरे-बाज़ार बिकते हुए लोग, पैदा होते ही दफ़न होती हुई मासूम बच्चियाँ,सफ़ेद कपड़ों में लिपटी हुईं ज़िंदा देवियां, इंसान की कमर से बंधी हुई झाड़ूएं, एक ख़ास तबके के लिए इबादतगाह के बंद दरवाजे। ये सब यह...

तस्वीर और अल्फ़ाज़:

जब भी किसी तस्वीर को देखता हूँ तो ज़ेहन में कुछ अल्फ़ाज़ आ जाते हैं, ऐसा महसूस होता है जैसे तस्वीर ने ही कुछ कहा हो, जैसे तस्वीर बात कर रही हो। फिर ये ख्याल आता है कोई और इसको देखेगा तो कुछ और ही सोचेगा। अगर ये तस्वीर बोलती है तो कुछ और ही सुनेगा। कुछ लोग ये दावा करते हैं के वो तस्वीर को पढ़ना जानते हैं, तो हर पड़ने वाला कुछ अलग ही पड़ेगा। कहते हैं के लिखे हुए अल्फ़ाज़ को तो सब पड़ लेते हैं लेकिन तस्वीर पे तो कुछ भी नहीं लिखा फिर लोग इसे कैसे पड़ते हैं। फिर इस बात का ख्याल आता है के लिखे हुए को पड़ तो सब लेते हैं पर ज़रूरी नहीं सब समझ भी लेते हों। तस्वीर को देखते तो सभी हैं पर ज़रूरी नहीं सब इसे पड़ भी लेते हों। हर तस्वीर बनाने वाला यही सोचता होगा के उसकी तस्वीर यादगार बन जाए और इससे भी ज़्यादा ये सोचता होगा के कोई इसको समझे और बताये यह तस्वीर क्या कहती है, क्या दास्तान बयां करती है। तस्वीर पे ना कुछ लिखा होता है न इसकी कोई ज़ुबाँ होती है फिर भी हर पड़ने वाला इसको पड़ लेता है। यहाँ कोई चेहरे को तस्वीर की शक्ल देना चाहता है तो कोई तस्वीर को लफ़्ज़ों में उतारना चाहता है, कोई नयी तस्वीर बनाना चाहता है त...