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अमीरी-गरीबी:

आजकल अमीर और गरीब की पहचान बहुत आसान हो गयी है, और दोनों की एक दूसरे से दूरियाँ भी काफी बढ़ गयीं हैं। नहीं तो एक ज़माना ऐसा भी था जब अमीरी और गरीब ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा एक साथ गुज़ारा करते थे, उनके बीच फासले इतने ज़्यादा नहीं थे या ये कहा जाये के फासले थे ही नहीं। आज तो अमीरी, गरीबी के के बीच में दीवारें नज़र आती हैं और ना तो कोई इन दीवारों को गिराने की कोशिश ही करता है और ना ही कोई पुल बना रहा है। और तो और ये दीवारें दिन बा दिन ऊँची ही होती जा रही हैं। इन दीवारों को कोई लाँघ न सके इनके ऊपर कांटे भी बिछा दिए गए हैं। इंसानी जिंदगी ने वो दौर भी देखा है जब शाही घरानों के राजकुमार एक ही आश्रम में गरीबों के बीच रहकर ही परवरिश पाया करते थे, तालीम हासिल किया करते थे, गरीबी को समझा करते थे, उनके साथ सुख दुखः में शामिल हुआ करते थे। आने वाले कल में जो उनकी अवाम होगी उसके बारे में दूसरों से पूछने की ज़रुरत पेश नहीं आती थी। उनके दोस्त गरीब भी होते थे,उनकी महफिलों में गरीब बे-झिझक जाया करते थे। आज न कोई अमीर किसी गरीब से दोस्ती करता है और न किसी अमीर की महफ़िल में कोई गरीब नज़र ही आता है, अगर कोई सदा दिल किसी को बुला भी ले तो फासला इतना ज़्यादा है के कोई जाना भी पसंद नहीं करता और कोई चला भी जाये तो दुनिया की भीड़ उसका तमाशा बना देती है।

एक बाज़ार सा लगा है, हर चीज़ बिक रही है, कहने को गुलाम ख़त्म हो गए हैं लेकिन गुलामी आज भी ज़िंदा है। यहाँ गरीबी खाने की तलाश में है और अमीरी भूक की तलाश में। गरीबी अपने हिस्से का भी बोझ ढोती है और दूसरे के हिस्से का भी। अमीरी में एक नशा है, गुस्सा है, नफ़रतें हैं और गरीबी में बर्दाश्त है, इत्मीनान है, सब्र है। अमीरी दूसरे की खुशिओं से होड़ करती है, गरीबी के पास अपनी खुशियाँ तो कम ही हैं बस ये दूसरों की खुशिओं में ही खुशियाँ मन लेती है। गरीबी अपने काम अपने हाथ से करती और अमीरी को अपने होते हुए कामों को देखने की भी फुर्सत नहीं। यहाँ अमीरी की पूजा होती है और गरीबी दूर से मंदिर को देखकर मन्नतें मांगती है।

एक दिन बे-ईरादा एक नादान अमीरी गरीबी से मिलती है और पूछती है के तुम्हारे क्या शोक हैं। ग़रीबी मासूम से लहजे में कहती है कि गरीबी के शोक नहीं होते, जो मिल जाता है, गरीबी उसे ही अपना शोक बना लेती है। गरीबी के शोक नहीं बल्कि मजबूरियाँ होती हैं, बेबसी होती है, लाचारी होती है, और हसरतें होती हैं। नासमझ अमीरी फिर गरीबी से सवाल करती है, फिर तुम अपना वक़्त कैसे गुज़ारते हो। गरीबी बहुत नरमी से जवाब देती है, एक वक़्त ही तो है जो गरीबों के पास अमीरों के बराबर है, फिर भी यहाँ अमीरों के पास वक़्त नहीं है और एक गरीबी है जिसके पास शायद वक़्त के सिवा कुछ और है ही नहीं। गरीबी कहती है के गरीबी नाम ही परेशानी का है और कहते हैं परेशानी में वक़्त मुश्किल से गुजरता है, और शायद अमीरी खुशहाली का नाम है इसीलिए उनका वक़्त तेज़ी से गुज़र जाता है जो पता ही नहीं चलता, शायद इसिलए अमीरी के पास वक़्त रहता ही नहीं है। गरीबी अपना वक़्त जैसे तैसे गुज़ार ही लेती है, कभी धूप में, कभी छाँव में, कभी बरसात में, कभी खुले आसमान में, कभी बादल की गरज में, कभी बिजली की कड़क में, कभी भूख में तो कभी धुंदली उम्मीमदों में। जब अमीरी, गरीबी की ये बातें सुनती है तो उसके आंसू निकल आते हैं, और जब गरीबी अमीरी के आंसू निकलते देखती है तो उसके भी आंसू छलक आते हैं बस फर्क इतना होता है कि अमीरी के ये आंसू गम के आंसू है और गरीबी के ये आंसू ख़ुशी के आंसू हैं। और इस तरह अमीरी गरीबी एक दूसरे को अपना बना लेती हैं।

Ishrat Alig

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