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डर:

गर्मिओं की दोपहर थी, निशा घर के आंगन में लेटी हुई किसी सोच में गुम थी। यह उस दौर की बात है जब एक आम से घर का आंगन भी आजकल के मकान के बराबर होता था, घरो में भी खूब जगह होती थी और दिलो में भी। घर के सभी लोग कहीं गए हुए थे और निशा चारपाई पे लेटे हुए अमरुद के पेड़ को इतने गौर से देख रही थी मनो इसके पत्ते गिन रही हो। घर के आंगन में अमरुद,अनार के पेड़ों साथ-साथ फूलों के भी कई पौधे थे। हरा-भरा आंगन गरम हवा की शिद्दत को कुछ कम कर देता था। आंगन ख़त्म होते ही एक बरामदा था और बरामदे के अंदर एक कमरा और उस कमरे के अंदर एक और कमरा था जिसे घर के सब लोग कोठरी कहते थे और उसमें दिन के वक़्त भी अँधेरा रहता था। उस कोठरी में सिर्फ घर का सामान ही रखा जाता था और सामान भी ऐसा जिसकी शायद ही कभी किसी को ज़रुरत पड़ती थी। उस कोठरी में जाने से घर के बच्चे तो बच्चे बड़े भी डरते थे। बस घर में एक ही शख्स था जिसे उस कोठरी से रगवत थी,सभी उसे चाचा कहते थे ,चाचा का उस कमरे में आना-जाना मामूल की बात थी। उस दौर में घरो में लाइट तो क्या चराग भी मुश्किल से जले हुए मिलते थेऔर ऐसे में चाचा का उस अँधेरे कमरे में बेबात पे ही दिन भर में कई चक्कर लगाना सबको हैरान करता था।

निशा अभी अपने खयालो में खोयी हुई ही थी के एक बहुत खूबसूरत औरत बहार से आयी जिसने बहुत क़ीमती गहने पहने हुए थे और वो उस कोठरी की और जाने लगी, निशा उसकी आहट से बेदार हुई और उसको देखा तो देखती ही रह गयी, कभी उसकी खूबसूरती को देखती तो कभी उसके गहनों को, उसने पहले न ऐसी खूबसूरती देखी थी न ऐसे गहने। जब वह अजनबी औरत बरामदा पार करने लगी तो निशा जो पहले ही उसके दिलकश अंदाज़ में खोयी हुई थी बड़ी मुश्किल से संभलकर बोली के तुम कोन हो और अंदर क्यों जा रही हो। औरत ने जवाब देने के वजाए निशा की तरफ गौर से देखा और देखती ही रही। निशा ने जब औरत को नज़दीक से देखा तो उसकी खूबसूरती उसे अजीब सी लगी, गहनों की चकाचौंद से हटकर उसकी निगाह अब उसके चेहरे पर थी और उस चेहरे की बनावट और रंगत उसे परेशान कर रही थी, उसे उसके इस चेहरे में किसी दूसरे चेहरे का अक्स दिखाई दे रहा था, इस उलझन से निकलते हुए उसने फिर पूछा के तुम कोन हो,कहाँ से आयी हो और अंदर क्यों जा रही हो। औरत ने फिर भी कोई जवाब नहीं दिया , निशा ने ज़िद पकड़ते हुए पूछा बताओ कोन हो तुम। औरत ने ख़ामोशी तोड़ते हुए कहा के मुझे जानना चाहती है मैं कोन हूँ तो ले देख-इतना कहकर उसने अपने चेहरे पे हाथ फेरा और उसका चेहरा यकायक बदल गया, निशा ने वो देखा जो उसने सिर्फ कहानिओं में ही सुना था , उसने एक खूबसूरत चेहरे को एक ऐसी डरावनी सूरत में बदलते हुए देखा जो उसने कभी नहीं देखी थी और वो सूरत उसकी आँखों में बस चुकी थी जिसे कोई भी आसानी से देख सकता था, उसके डर को महसूस कर सकता था। वह औरत उस अँधेरी कोठरी में जाकर गायब हो गई लेकिन निशा की आँखों के सामने अब वही चेहरा था, उसे ऐसा लगा जैसे आज उसने सुनी हुई सारी डरावनी कहानिओं के किरदारों को देख लिया है। यह वाक़िया हो चूका था लेकिन निशा को ये यक़ीन नहीं हो रहा था के यह कोई हक़ीक़त थी या महज़ एक सपना। निशा ने जिसको भी ये कहानी सुनाई उसने औरत की उस बदली हुई शक्ल को महसूस किया, बिन देखे भी हर एक के सामने एक चेहरा आ जाता जैसे वो खुद उस जगह मौजूद हो और उसने खुद अपनी आखों से उस डरावने चेहरे को देखा हो।

Ishrat Alig

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