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दर्द:

किसी ने कहा था के मर्द को दर्द नहीं होता, मर्द को दर्द तो होता है लेकिन वो उसको बर्दाश्त कर लेता है, दर्द बर्दाश्त तो औरत को भी करना पड़ता है चाहें रो-कर करे या ख़ामोशी से। दर्द जब हद से गुज़र-जाता है तो उसका एहसास ही ख़त्म हो जाता है और दर्द जब बहुत पुराना हो जाता है तो फिर वो दर्द दर्द-नहीं रहता वो ज़िन्दगी का साथी बन जाता है और वो दर्द जीने की एक वजह बन जाता है, फिर ऐसे दर्द की कोई क्यों दवा करे जो जीने की एक वजह बन चूका हो।
मैं नहीं जनता के दर्द को नापने का कोई पैमाना है या नहीं लेकिन किसी के दर्द की शिद्दत का एहसास उसकी आवाज़ से हो ही जाता है, दर्द को कभी बातें बयान कर देतीं हैं तो कभी ख़ामोशी बयान कर देती है, कभी ऑंखें बयान कर देतीं हैं तो कभी लरज़ते हुए क़दम बता देते हैं के कोई किसी उलझन मैं है।

किसी दर्दमंद इंसान की आवाज़ सुनकर लगता है के अगर ज़िन्दगी में दर्द का एहसास ना हो तो ना-जाने कितने गीत संगीत जो किसी के दर्द की पहचान बन चुके हैं, कहीं खो कर रह जाते। वही अलफ़ाज़ होते हैं लेकिन बस किसी का दर्द है जो इनमें जान डाल देता है, गीत वही होता है बस किसी की दर्द भरी आवाज़ इसमें कशिश पैदा कर-देती है।
इस बेदर्द ज़माने में दर्द तो मिलते रहते हैं लेकिन तकलीफ तो जब होती है जब कोई हमदर्द ना हो।
कोई दर्द की दवा बेचता और दर्द की वजह भी नहीं पूछता, बस कोई किसी के दर्द को अपना बना ले और अपना दर्द किसी से बाँट ले, शायद दो दर्द आपस में मिलकर कोई ख़ुशी ही बन जाएँ ।

Ishrat Alig

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