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ज़मीन और आसमान:

~ वो दूर ज़मीन के किनारे आसमान से मिल रहे हैं जैसे इस ज़मीन को आसमान ने अपने आगोश में ले-लिया हो। कभी तो ऐसा लगता है जैसे ज़मीन और आसमान के बीच कभी न ख़त्म होने वाला एक फासला है और कभी ऐसा लगता है जैसे ये ज़मीन और आसमान एक दूसरे के लिए बनाये गए हैं, जैसे इनका जन्म-जन्म का साथ है, जैसे ये ज़मीन एक दुल्हन है और आसमान इसका हमसाया। जो भी इस मिलन को देखने के लिए आगे बढ़ता है उसकी नज़रों से यह नज़ारा दूर होता जाता है, ज़मीन करीब होती जाती है और आसमान ऊपर उठता जाता है। कभी तो ऐसा लगता है जैसे ये महज़ आँखों का एक धोका है और कभी ये लगता है के आसमान शर्मा के अलग  हो जाता है। समझ नहीं आता ये मिलन है या मिलन से पहले की जुदाई, जैसे ये मिलन शाम के ढल जाने का इंतज़ार कर रहा है, जैसे रात की तारीकी में ये फिर मिलेंगे-सबसे छुप कर बातें करेंगे। क्या इसी ख़ुशी में ये ज़मीन घूम रही है- क्या इसिलए ये आसमान झूम रहा है।
आसमान अपनी दुल्हन के लिए क्या-क्या सौगात लाया है-कभी सूरज से इसको रोशन करता है तो कभी चाँद से इसका दिल बहलाता है-इसके दामन में मुस्कुराते हुए सितारे हैं-कभी इसके पास परिओ का मेला सा लगता है तो कभी फ़रिश्तो की बरात नज़र आती है। जब कभी कोई आवारा बादल इनके बीच आता है तो ज़मीन से चलने वाली हवाएं इनको उड़ा-कर ले जाती हैं और फिर वही ज़मीन वही आसमान। इस ज़मीन को बदलते हुए मौसम अच्छे लगते हैं लेकिन जब आसमान बरसता है तो ये ज़मीन मुस्कुराती बहुत है।
वैसे तो ज़मीन पर किसी चीज़ की कमी नज़र नहीं आती लेकिन कभी-कभी ना-जाने क्यों ऐसा लगता है जैसे ज़मीन की कोई चीज़ आसमान पर चली गयी हो, जैसे अनगिनत सितारों में से कोई सितारा इस ज़मीन का हो।
जब पहले आसमान का मंज़र ऐसा है तो सातवें आसमान का आलम क्या होगा।


ना जाने कितने लोग इसे धरती माँ कहते हैं और कहें भी क्यों नहीं ये ज़मीन इंसान को बिलकुल एक माँ की तरह पालती है, उसे खिलाती है-पिलाती है-अपने सीने पे सुलाती है और जब वो थक कर गिर जाता है तो उसे अपनी गोद में समेट लेती है।
कोई इसकी पाक मिटटी से अपने देवताओं को बनाता है तो कोई इसपे खुदा के नाम के सजदे करता है। यह कितनी खुश होती है जब इसका कोई बेटा मोहब्बत का पैगाम देता है, इसको बाग़-बागीचो खेत-खलियानो से सजाता है इसपे सर झुका कर चलता है और इसको कितना दुःख होता है जब इसके अपने ही बेटे इसके टुकड़ो के लिए एक दूसरे का खून बहाते हैं नफ़रतें फैलाते हैं, इस फूल सी ज़मीं को गोला-बारूद का ढेर बनाते हैं इसके चमन को उजाड़ते हैं और जब यह ज़रा-सा झटका देती है तो हमारे होश ठिकाने आ जाते है लेकिन जल्द ही भूल जाते हैं, लेकिन फिर भी एक माँ माँ होती है, जब वही बेटे उसी बारूद की ज़द में आकर गिरते हैं तो उन्हें ये अपने सीने से लगा लेती हैं और हमेशा-हमेशा के लिए अपनी गोद में सुला लेती है।
हमने इस ज़मीन को अच्छाई के लिए इतना तंग कर दिया है के अगर आज कोई सूफी-संत यहाँ किसी आबादी में तो क्या किसी जंगल-किसी गुफा में जाकर भी ज़िन्दगी गुज़ारे तो हम इंसान उसे जीने ना-दें।


अगर आसमान के पास पुर-असरार नज़ारे हैं तो ज़मीन भी ना-जाने कितने राज़ ख़ामोशी से समेटे हुए है, ना-जाने कितनी अनसुनी कहानियां इसको मालूम हैं, ना-जाने कितनी अनकही दास्तानों से यह आगाह है फिर भी हमेशा खामोश रहती है। यह ज़मीन अलग-अलग रंगो में दिखाई देती है- कहीं पीली नज़र आती है तो कहीं काली तो कहीं सुर्ख दिखती है लेकिन इस ज़मीन पे हरा रंग जचता बहुत है।
यहाँ कोई मोहब्बत की कहानी परवान चढ़ रही है तो कहीं जंग का मैदान सजा हुआ है, कहीं खुशिओ की महफ़िल लगी हुई है तो कहीं गम का मातम है, कहीं रौनकें हैं तो कहीं वीराना सा है।
इस ज़मीन पे हर रोज़ तमाशे होते हैं और ये आसमान यूँ ही मुस्कुराता रहता है।
यह ज़मीन एक हक़ीक़त लगती है और आसमान एक अफसाना, जो नज़र तो आता है लेकिन करीब नहीं आता जिसको देख तो सकते हैं लेकिन छू नहीं सकते , ये ज़मीन सर झुकाने को कहती है और आसमान सर उठाने को, ये आसमान ख़्वाब दिखाता है और ये ज़मीन उनको पूरा कराती है।
ये नीला आसमान भी अपना रंग बदलता रहता है, कभी कला दिखाई देता है तो सूरज के साथ लाल हो जाता है।
आदमी ज़मीन के लिए लड़ता है और छोटा सा टुकड़ा हासिल करके कहता है के ये ज़मीन मेरी हो गयी और ये ज़मीन इस इंतज़ार में रहती है शायद कोई इसमें मिलने से पहले ये कहे के मैं तेरा हो गया।
ये इंसान, ये दुनिया यहाँ की हर शय फानी है लेकिन इंसान जिस बेदर्दी से  इसे बर्बाद कर रहा है कहीं ये दुनिया अपने वक़्त से पहले ही फ़ना ना हो जाये।

Ishrat Alig

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