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बरसात:

बरसात का मौसम है सभी देवता सो रहे हैं, कोई पुजारी आए और किसी देवता को जगाए और पूछे ये क्या हो रहा- कहीं तो लोग प्यास से तड़प रहे हैं तो कहीं सैलाब हैं, कहीं पानी की कमी से लोग मर रहे हैं तो कहीं पानी में डूब कर मर रहे हैं। कहीं खुश्क झीलें हैं तो कहीं दरया अपने किनारों को तोड़कर आगे ही बढ़ते जा रहे हैं। एक तरफ सूखे की वजह से परिंदो ने अपना ठिकाना बदला है तो दूसरी तरफ किसी तूफ़ान ने इनको बेघर कर कर दिया है।

कहीं बरसात आने से पहले ही ख़त्म हो गयी है तो कहीं ऐसी आयी है के ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही। कहीं का हर मौसम बरसात है तो कहीं बरसात का कोई मौसम ही नहीं। किसी को बरसात के थमने का इन्तेज़ार है तो कोई इसके शुरू होने की दुआ कर रहा है। कोई पहली बारिश में भीगना चाहता है तो कोई इससे बचने के लिए इंतज़ाम कर रहा है। वैसे तो बरसात खुशियां लेकर ही आती है लेकिन दुनिया के दस्तूर ने इसे भी कुछ लोगो के लिए परेशानी का सबब बना दिया है, ये किसी के लिए जीवनदान है तो किसी के लिए तबाही लेकर आती है।
ये बरसात का मौसम कितनी कहानिओं की याद दिलाता है और न जाने कितनी नई कहानियां पैदा करता है। किसी लिखने वाले के लिए ये बरसात की बूंदे लफ़्ज़ों की बारिश की तरह लगती हैं जैसे आसमान से पानी नहीं अलफ़ाज़ बरस रहे हों, हर बारिश के साथ नई कहानी क़लम से निकलती है, बादल की गरज और बिजली की चमक नए-नए मंज़र पैदा करती है, हवाओं का हल्का तेज़ होना उसकी कहानी को नए मोड़ देता है।

ये बदला हुआ मौसम कितनी तब्दीलिओ की याद दिलाता है जो शायद अब सिर्फ कहानिओं में ही मिलती हैं।
अब कोई कागज़ की नाव चलाता नहीं दिखता, सावन के झूले ख़त्म से हो गए हैं और न अब कोई सावन का गीत गाता हुआ ही नज़र आता है। ऐसा लगता है जैसे बहारो के मौसम में बहारें ही नहीं। ज़मीन ने हरे कपड़े पहन लिए हैं लेकिन इंसान का रंग पीला ही नज़र आता है। ज़मीन में छुपी हुई कितनी मखलूक ऊपर आके इस मौसम का लुत्फ़ ले रही हैं, मनो जैसे बरसात ने ही इनको जगाया हो। ये ज़मीन जिसका सीना कल खुश्की से फट रहा था आज पानी से तर हो गयी है जैसे आसमान इसकी पुकार सुनकर रोने लगा हो और इसके आंसू पानी बनकर ज़मीन की प्यास बुझा रहे हों। हवाओं की तपिश ख़त्म हो गयी है, अब इनमे नमी है-ठंडक है। कल जो जगह किसी रेगिस्तान की तरह लगती थी आज किसी वादी की याद दिलाती है।
इस बरसात ने किसी को पानी-पानी कर दिया है तो किसी की ज़िन्दगी में आग लगा दी है, बादल की गरज किसी के लिए उम्मीद है तो किसी का दिल दहला रही है। 

बदलते हुए मौसम से क़ुदरत तो खुश नज़र आती है लेकिन शायद इंसान के लिए खुशिओं के मौसम ख़त्म से हो गए हैं। कल जिस दरया के पानी को रोका था आज उस दरया ने अपना रुख बादल लिया है।
पानी के भी अलग-अलग रूप अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं, यह कभी नीला नज़र आता है कभी हरा तो कभी पीला तो कभी सुर्ख हो जाता है, जिस जगह जाता है उसी का रूप ले-लेता है, कभी लहरें बनकर इतराता है तो कभी सैलाब बनकर डराता है, कभी सुनामी बन जाता है तो कभी ख़ामोशी से किसी झील का हिस्सा बन जाता है, कभी एक क़तरा है तो कभी समंदर बन जाता है। कभी बारिश बनके आसमान से बरसता है तो कभी भाप बनके ज़मीन से उड़ जाता है, यह कभी बर्फ है तो कभी शबनम है, यह कहीं गंगाजल है तो कहीं ज़मज़म है। 

वैसे तो एक मौसम ख़त्म होता है और दूसरा शुरू हो जाता है लेकिन कभी-कभी मौसम भी अपना रुख बदल लेता है और बिन मौसम के बरसात होने लगती है, कभी गर्मिओ में ही बर्फ की बारिश होती है तो कभी धूप में ही बादल बरसने लगते हैं।
एक तरफ तो ज़मीन के आगोश में समन्दर ही समन्दर हैं तो दूसरी तरफ यही ज़मीन प्यासी नज़र आती है, कभी समंदर इसकी प्यास बुझाने के लिए सुनामी बनके आता है तो कभी बादल बनके और इसकी सारी गन्दगी को धो देता है। 

कभी तो ऐसा लगता है जैसे सब कुछ बादल गया हो और कभी ऐसा लगता है जैसे कुछ भी नहीं बदला, सब कुछ वैसे का वैसा ही है। ये मिट्टी, ये पानी, ये हवा और क्या चाहिए जीने के लिए लेकिन फिर भी हर रोज़ इनको बर्बाद होते देखो।
ये मौसम फिर बदलेगा, फिर कोई नई कहानी लिखी जाएगी, ज़िन्दगी फिर किसी मोड़ से गुज़रेगी, फिर कुछ नए सवाल आएंगे कुछ नए जवाब मिलेंगे, ज़माना बदलेगा ज़माने की रफ़्तार बदलेगी, कहीं कोई नई बस्ती आबाद होगी तो कहीं कोई शहर समन्दर में वस्ल हो जाएगा। ज़िन्दगी ये सब बदलाव देखेगी और एक दिन ये मिट्टी का जिस्म इसी मिट्टी में मिल जाएगा।

Ishrat Alig.

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